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Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.वित्तीय कालीन पर शीर्षासन

पांचवें वित्तायोग की सिफारिशों में अगले कदमों का जिक्र और हिमाचली उम्मीदों का सफर किस तरह रेखांकित होगा, यह बजट अनुमान के फासले हैं। सीढि़यां हैं, मंजिलें नहीं-जारी सफर की अब कीमत तय होगी। कहीं तो कान पकड़े हैं और कर्ज को त्योहार बनाने की हिमाचली कोशिशों में कुछ तो खोट रहा। पांचवें वित्तायोग की कालीन पर शीर्षासन को समझिए और उन दस्तावेजों को देखिए जहां हर तरह की आय के आगे पहाड़ सरीखा साठ हजार करोड़ का कर्ज खड़ा है। सलाह स्पष्ट तौर पर कर्ज पर नियंत्रण पाने के लिए है और यह भी कि जो 81977 करोड़ आ रहे हैं, उनमें लकीरें और प्रश्नवाचक चिन्ह भी हैं। प्रश्न उस गुंबद की तरह जो उतरने का भयावह मंजर है। प्रदेश ने रोजगार को सरकारी नौकरी बना दिया और अब जबकि सारी पाजेबें ढीली होने लगीं, तो युवाओं से किए वादे कैसे पूरे होंगे। 2001 में 4.5 फीसदी सरकारी नौकरियों के मुकाबले 2017 आते-आते यह दर घट कर 3.7 प्रतिशत रह गई है।

 सरकारी नौकरी के अवसर निरंतर घट रहे हैं, तो यह देखना होगा कि रोजगार या स्वरोजगार की अधोसंरचना पर आगामी बजट किस तरह वित्तायोग के फूलों से अपनी राह के कांटे हटा पाता है। स्वरोजगार या निजी क्षेत्र के रोजगार के लिए ग्रामीण सड़क योजनाओं में इस साल आ रहे 246 करोड़, बजट की लाज बचाएंगे। शहरी विकास के पैमानों में 3049 करोड़ का आबंटन अगर सुनियोजित ढंग से होगा, तो निश्चित रूप से एक बड़ी संभावना का क्षितिज सामने है। शिमला, धर्मशाला के साथ-साथ पालमपुर, मंडी व सोलन जैसे शहरों का नगर निगम की व्यवस्था में आना अगर आर्थिकी में चरितार्थ होता है, तो नए निवेश के संगम पैदा हो सकते हैं। वित्तायोग पहली बार हिमाचल में हवाई सेवाओं का आकाश देख रहा है या सरकार का नजरिया पुरस्कृत हो रहा है, इस पर साधुवाद जरूर मिलेगा। मंडी एयरपोर्ट की शक्ल में तआरू़फ से तवज्जो तक संभावना दिखाई दे रही है, तो अपने पंख खोलने के इरादे से कांगड़ा हवाई अड्डे के साथ-साथ कुल्लू को भी अधिमान मिल रहा है। भले ही यह शुरुआत हो, लेकिन खाका बनना भी तो एक उपलब्धि सरीखा है। प्रदेश में टेंपल टूरिज्म की दिशा में ज्वालामुखी में फिर से रोशनी हुई है। बीस करोड़ के प्रावधान से मंदिर व्यवस्था अगर दक्षिण भारत सरीखी हो जाए, तो यह निवेश धार्मिक पर्यटन के जरिए रोजगार को बढ़ावा दे सकता है।

दरअसल हिमाचल को अगला सफर अगर वित्तायोग के मार्फत तय करना है, तो इसके भीतर की हिदायतों को समझते हुए योजनाओं के खाके और परियोजनाओं के प्रारूप कुछ इस तरह बनाने होंगे कि सरकार का कद छोटा नजर आए, लेकिन परिणामों की फेहरिस्त में रोजगार के अवसर पैदा हों। प्रदेश में शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्रों में माकूल अधोसंरचना को देखते हुए आगामी योजनाओं का रुख गुणवत्ता आधारित करना होगा ताकि अब प्रदेश देश के सामने अपने आदर्श कायम करे। केंद्र पर आधारित वित्तीय व्यवस्था के 67 फीसदी हिस्से में हिमाचली उत्पादन के कई नकारात्मक बिंदु है। प्रयास यह होना चाहिए कि अपने योगदान के वर्तमान 37 प्रतिशत हिस्से की बढ़ोतरी करते हुए हिमाचल अपने संसाधनों को कम से कम पचास फीसदी करे। राजस्व घाटे की आपूर्ति के लिए हमेशा से निर्भर रहे हिमाचल के लिए इस बार की वित्तीय वसंत कमजोर है। पिछले वित्तायोग की सिफारिशों के मुकाबले इस बार राजस्व घाटे की आपूर्ति के लिए 3426 करोड़ कम मिल रहे हैं, लिहाजा सरकार को ‘आमदनी अठन्नी-खर्चा रुपया’ के  बजाय ‘आमदनी रुपया-खर्चा अठन्नी’ करने के नए मार्ग प्रशस्त करने होंगे।

2.आंदोलन के विदेशी साजिशकार!

अमरीकी प्रशासन के एक बयान ने पूरी बाजी ही पलट दी। अमरीका ने कृषि कानूनों और सुधारों का समर्थन किया है। उसका आकलन है कि उनसे भारत में किसानी का बाज़ार मजबूत होगा और निवेश भी बढ़ेगा। इस समर्थन के जरिए अमरीका ने भारत के साथ ‘रणनीतिक दोस्ती’ निभाई है। अमरीका की ही प्रख्यात पॉप सिंगर और हॉलीवुड अभिनेत्री रिहाना, उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की भांजी मीना हैरिस, स्वीडिश पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग आदि ने ट्वीट कर जिस तरह किसान आंदोलन का समर्थन किया, उसे मानवाधिकार का मुद्दा बनाया, वह दावानल की तरह भड़का और फैला। रिहाना के ट्वीट को हटाने से पहले 70,000 बार देखा-पढ़ा गया। जाहिर है कि यह भारत के खिलाफ दुष्प्रचार किया गया। विदेशियों की सूची में पॉर्न स्टार और कथित खालिस्तानी आतंकियों के नाम भी हैं। यह सतही मामला नहीं है। हमारी विख्यात हस्तियों ने पलटजवाब दिया है कि भारत की संप्रभुता, एकता, अखंडता अक्षुण्ण रहेगी, लेकिन मौजूदा दौर के ‘जयचंदों’ ने रिहाना के ट्वीट को व्यापक स्तर पर री-ट्वीट किया। रिहाना को ही किसान नेता और स्वामीनाथन की गुरू मान लिया गया। हमेशा याद रखें कि भारत में ‘जयचंदों’ अर्थात देशद्रोहियों की पुरानी परंपरा रही है। तब हम गुलाम होते थे-कभी मुग़लों के, तो 15 अगस्त,1947 तक ब्रिटिश साम्राज्य के। लेकिन आज हम स्वतंत्र और लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं।

 उसके मायने ये नहीं कि विदेशी हस्तक्षेप और निरंकुशता को ही ‘लोकतंत्र’ स्वीकार कर लें। अच्छा हुआ कि विदेश मंत्रालय ने अविलंब ही सटीक और करारा जवाब दिया। पैसा वसूल कर ट्वीट करने वाली जमात को आगाह किया कि कृषि कानून और किसानों के एक वर्ग की आपत्ति भारत का अंदरूनी मामला है। हम आपस में निपटा लेंगे। भारतीय संसद में बहस के बाद बिल बहुमत से पारित किए गए और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद कानून बने। ऐसी बेमानी टिप्पणियां करने से पहले कमोबेश तथ्यों और विषय की जानकारी जरूर होनी चाहिए। अलबत्ता हमारा मानना है कि ये बेहद खतरनाक और साजि़शाना ट्वीट हैं, लिहाजा ऐसी जमात के भारत-प्रवेश  पर तुरंत प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए और ट्विटर के खिलाफ  भी दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। भारत में ट्विटर के अलावा, व्हाट्स एप, फेसबुक और इंस्टाग्राम आदि सोशल मीडिया बिल्कुल बेलगाम हैं। दरअसल ये साम्राज्यवाद के आधुनिक हथियार हैं, जो आंतरिक तौर पर भारत को तोड़ना चाहते हैं। फिर भी उन्हें करोड़ों रुपए का व्यापार करने दिया जा रहा है। इस सवाल का जवाब केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी एवं कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को देना होगा। ये कंपनियां संसदीय स्थायी समितियों के सामने भी तलब की गई हैं, लेकिन ट्विटर पर ग्रेटा का वह ट््वीट क्यों दिया गया, जिसमें भारत को बदनाम करने की साजि़शाना योजना का खुलासा था? सिर्फ  19 साल की ग्रेटा, जिसे नोबेल पुरस्कार के लिए नामित भी किया गया है, ने उस ट्वीट को आईएमएफ, विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन समेत प्रधानमंत्री दफ्तर और कृषि मंत्री को भी हैशटैग करने का आग्रह किया था।

बेशक 4-5 फरवरी को थोक में किए जाने वाले ट्वीट को डिलीट कर दिया गया, लेकिन तब तक करोड़ों लोग देख-पढ़ चुके होंगे! यह अंतरराष्ट्रीय साजि़श का हिस्सा नहीं, तो क्या है। भारत में किसान आंदोलन कोई अंतरराष्ट्रीय सरोकार का विषय नहीं है, जिसमें ग्रेटा जैसी जमात अपनी टांग अड़ाए, लिहाजा यह एजेंडा ऐसा हो सकता है, जिसमें भारत-विरोधी भारत की ही कुछ ताकतें शामिल हो सकती हैं। इसकी जांच अनिवार्य है। इन विदेशी हस्तियों के करोड़ों फॉलोअर्स हैं। रिहाना के ट्वीट के बाद उनके 10 लाख फॉलोअर्स और बढ़ गए। ऐसे ट्वीट की कीमत भी तय होती है। इस दुष्प्रचार के कारण ही ब्रिटेन में एक प्रस्ताव पर एक लाख से अधिक लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं, नतीजतन अब वहां की संसद में इस विषय पर चर्चा करना संवैधानिक बाध्यता है। क्या उससे दोनों देशों के आपसी संबंधों में खटास नहीं आएगी? बेशक उस बहस से भारत की मौजूदा स्थिति और ताकत पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन बदनामी का एक अध्याय तो खुल जाएगा। दरअसल अब किसान आंदोलन और इंटरनेट बंदी का रिमोट अंतरराष्ट्रीय हाथों में आ गया है। वे अपनी तरह से स्थितियों और समस्याओं को नियंत्रित करेंगे, भारत के खिलाफ  दुष्प्रचार यहीं थमने वाला नहीं है, लिहाजा सरकार और एजेंसियों को कड़ा रुख अख्तियार करना पड़ेगा। रिहाना का विवादों से पुराना नाता रहा है। शायद वे भी प्रचार और मार्केटिंग के हथकंडे होंगे, लेकिन हमें ये कबूल नहीं हैं, यह संदेश स्पष्ट तौर पर दिया जाना चाहिए।

3.हिंसा पर लगाम

हिंसक विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के खिलाफ जारी बिहार सरकार के नए दिशा-निर्देश की चर्चा न केवल महत्वपूर्ण, बल्कि विचारणीय भी है। बिहार सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देश में कहा गया है कि अगर कोई हिंसक विरोध प्रदर्शन में भाग लेता है, तो वह सरकारी नौकरी और अनुबंध के लिए पात्र नहीं होगा। आदेश में कहा गया है कि पुलिस एक व्यक्ति के आचरण प्रमाण पत्र में उसके ऐसे अपराध को सूचीबद्ध कर सकती है। सरकार के इस निर्देश से युवाओं को संदेश देने की कोशिश है कि वे किसी तरह के विरोध प्रदर्शन में उलझकर किसी भी आपराधिक कृत्य में शामिल न हों। इसमें कोई शक नहीं कि सरकार का यह फैसला बहुत कड़ा है और युवाओं की ऊर्जावान अभिव्यक्ति को भी बाधित कर सकता है। अनेक बार किसी सामान्य मांग के लिए होने वाले धरना-प्रदर्शन को भी अचानक उग्र होते देखा गया है। किसी भी आंदोलन में तरह-तरह के लोग आ शामिल होते हैं और उसमें शामिल होने से पहले हर एक का चरित्र सत्यापन कठिन है, लेकिन जब मुकदमे दर्ज होते हैं, तब पूरे समूह का नाम दर्ज कराने की कोशिश आम है। इस निर्देश पर चिंता यहीं शुरू होती है।
बिहार सरकार द्वारा जारी निर्देश में पूरी कड़ाई से कहा गया है कि हिंसा करने वाले लोगों को गंभीर परिणामों के लिए तैयार रहना होगा, इस निर्देश के विरोध की मूल वजह भी यही है। वैसे किसी अपराधी या आपराधिक कृत्य करने वालों को सरकारी नौकरी में आने से रोकने के लिए पहले से ही व्यवस्था है, पर पहली बार विरोध प्रदर्शन में होने वाली हिंसा को निशाना बनाया गया है। आम तौर पर हमने विरोध प्रदर्शन के दौरान होने वार्ली ंहसा को राजनीतिक स्तर पर माफ होते देखा है। एक परंपरा-सी बन गई है। दिल्ली के किसान आंदोलन में भी हम देख रहे हैं कि किसानों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की मांग हो रही है। इसमें एक पक्ष यह भी है कि पुलिस ने मनमाने ढंग से मामले दर्ज किए हैं। देश गवाह है, संपूर्ण क्रांति से उपजे अनेक नेताओं को हमने प्रदेश-देश में उच्च पदों पर जाते देखा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हिंसक विरोध प्रदर्शन में भाग लेने के बाद राजनीति में जाना तो संभव है, पर सरकारी नौकरी मिलना असंभव? इस दिशा-निर्देश की भावना भले गलत न हो, लेकिन इसे लागू करने वाली एजेंसी की जमीनी निष्पक्षता, क्षमता और पारदर्शिता पर गौर कर लेना चाहिए। यह कोई नहीं चाहेगा कि कोई हिंसक तत्व सरकारी नौकरी में आए, लेकिन हर कोई यह जरूर चाहेगा कि इस निर्देश का किसी भी युवा के खिलाफ दुरुपयोग न हो। समाज में बढ़ती हिंसा चिंता का कारण है, लेकिन उसे रोकने के लिए अन्य उपाय ज्यादा जरूरी हैं। सरकारी नौकरियों का बहुत आकर्षण है, लेकिन बमुश्किल दो से तीन प्रतिशत युवाओं को ही यह नसीब होती है। ऐसे में, अगर समाज में बढ़ती हिंसा को रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है, तो निस्संदेह अपर्याप्त है। बिहार जैसे राज्यों में सबसे पहले राजनीति में बढ़ती हिंसा को रोकना होगा। पुलिस को न्यायपूर्ण और संवेदनशील बनाकर समाज के आपराधिक तत्वों को काबू में करना होगा, सामाजिक संगठनों को भी हिंसा के खिलाफ सशक्त और सक्रिय करना होगा। साथ ही, शासन-प्रशासन से यह उम्मीद गलत नहीं कि राज्य में किसी हिंसक विरोध प्रदर्शन की नौबत ही न आने पाए।

4.डिग्रियों का गोरखधंधा

चौंकाने वाली है बिक्री और मांग

हिमाचल प्रदेश के एक निजी विश्वविद्यालय द्वारा चलाया जा रहा फर्जी डिग्रियों का गोरखधंधा उजागर होने से शिक्षा में निजी क्षेत्र की भूमिका पर फिर सवाल खड़े हुए हैं। फर्जी डिग्री की बिक्री और खरीद की उत्कंठा हमारे समाज में नैतिक मूल्यों के पराभव की भी दास्तान बताती है। यद्यपि जांच के प्रथम चरण में विश्वविद्यालय के जरिये 17 राज्यों में 36000 फर्जी डिग्रियों का पता चला है, लेकिन जब पूरा सच सामने आयेगा तो तस्वीर और डराने वाली होगी। जांचकर्ताओं ने  इस संख्या को भ्रष्टाचार के सागर में तैरते हिमखंड की संज्ञा दी है जो पानी के ऊपर कम दिखायी देता है मगर पानी के नीचे लंबा-चौड़ा विस्तार लिये होता है जो घोटाले के व्यापक दायरे की ही पुष्टि करता है। दरअसल, हिमाचल के सोलन स्थित इस निजी विश्वविद्यालय से घोटाले का खुलासा होने के बाद विशेष जांच दल ने बरामद 55 हार्ड डिस्क में से अब तक केवल 14 को ही स्कैन किया है। निस्संदेह जब सभी हार्ड डिस्क जांच ली जायेंगी तो घोटाले के वास्तविक आकार का स्पष्ट खुलासा हो सकेगा। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को गुमनाम शिकायत करने पर इस घोटाले के खुलासे से राज्य के निजी विश्वविद्यालयों की कार्य संस्कृति पर सवाल उठे हैं। यह खुलासा कई सवालों को भी जन्म देता है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि विश्वविद्यालय परिसर में एक दशक से अधिक समय से गैरकानूनी गतिविधियों को चलाया जा रहा था। सवाल उठता है कि आखिर वह निगरानी व नियामक तंत्र इतने समय तक क्यों सोया रहा, जिसकी जिम्मेदारी निजी विश्वविद्यालयों की कारगुजारियों की निगरानी करना और अनुचित पर रोकथाम लगाना होता है। निस्संदेह, ऐसे मामलों में शिक्षा विभाग के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों की ओर भी उंगलियां उठेंगी कि उनकी नाक के नीचे शिक्षा के नाम पर एक दशक तक गोरखधंधा कैसे चलता रहा। क्यों नहीं समय रहते कार्रवाई की गई। क्यों शिक्षा की विश्वसनीयता से खिलवाड़ का खतरनाक खेल एक दशक तक चलता रहा।

निस्संदेह सरस्वती के मंदिर में अवैध कारोबार का यह घोटाला विचलित करने वाला है। कुछ मेहनती विद्यार्थी अपना जीवन होम करके तथा माता-पिता की खून-पसीने की कमाई खर्च करके जो डिग्री हासिल करते हैं, उसे समाज में आपराधिक सोच के लोग चंद रुपयों से चुटकियों में जुटा लेते हैं। सवाल उन संस्थानों और विभागों का भी है जहां इन फर्जी डिग्री हासिल करने वाले लोगों ने नियुक्तियां पायी हैं। यह सवाल भी व्यथित करता है कि क्यों समाज में फर्जी डिग्रियों की मांग में लगातार वृद्धि हुई है। बिना प्रामाणिक शिक्षा और मूल्यांकन के ऐसी डिग्रियां हासिल करना उन क्षेत्रों के लिये घातक है जहां विषय की विशेषज्ञता की प्राथमिकता होती है। जिसके लिये राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं। निस्संदेह इस घाटाले का खुलासा हमारी शिक्षा प्रणाली की विसंगतियों और विद्रूपताओं को ही उजागर करता है। सख्त और बिना किसी राजनीतिक दबाव के जांच करने पर कई अन्य निजी विश्वविद्यालयों में ऐसे खुलासे हो सकते हैं, जिनको लेकर गाहे-बगाहे मीडिया में खबरें तैरती भी रहती हैं। यह अच्छी बात है कि विश्वविद्यालय के कर्ताधर्ताओं की 192 करोड़ रुपये की संपत्ति अटैच की गई है जो कि घोटाले के दायरे में आती है। मनी लांड्रिंग के आरोपों के बीच इस घोटाले में हुई कार्रवाई को देश में किसी भी निजी शैक्षणिक संस्थान के विरुद्ध उठाये गये सबसे बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है। निस्संदेह इस पर्वतीय राज्य में ही नहीं, आसपास के राज्यों में भी उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्रों की विश्वसनीयता को बहाल करने में लंबा वक्त लगेगा। उन पर पारदर्शी व्यवस्था के लिये दबाव बढ़ेगा। इसके बावजूद इस विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों, विभिन्न संकायों के शिक्षकों और कर्मचारियों के हितों की भी अनदेखी न हो, क्योंकि सभी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इस बाबत पूरे देश में निगरानी तंत्र विकसित करने की जरूरत है ताकि मेहनतकश व प्रतिभाओं के भविष्य से खिलवाड़ रोका जा सके। सख्ती से ही भारतीय शिक्षातंत्र की विश्वसनीयता बहाल की जा सकती है।

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