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Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.कोरोना से लड़ेगी खुराक

अंततः मुबारक घड़ी और खुशखबरी आ ही गई। लंबी प्रतीक्षा और महामारी का दंश झेलने के बाद अब टीकाकरण का आग़ाज हो रहा है। कोरोना वायरस के खिलाफ  यह लड़ाई 16 जनवरी से शंखनाद करेगी। जो टीका दिया जाएगा, वह नई जिंदगी और नई उम्मीद की खुराक से कमतर नहीं होगा। टीकाकरण का हमारा पुराना इतिहास और अनुभव साबित है कि उन व्यापक प्रयासों से असंख्य जिंदगियां बचाई जा चुकी हैं। कोरोना के खिलाफ  टीकाकरण अभियान भी विश्व का सबसे व्यापक स्वास्थ्य कार्यक्रम होगा। बेशक उसमें एक लंबा वक्त लगेगा, क्योंकि हमारे देश की आबादी करीब 139 करोड़ है। कोरोना टीके का अनुसंधान किसी भी देश में किया गया हो, यकीनन वह इनसानी जिंदगी के लिए ‘संजीवनी’ है। कोरोना काल के बीते करीब 10 माह किसी यंत्रणा-काल से कम नहीं थे। इनसान मानसिक तौर पर ‘जिंदा लाश’ महसूस करने लगा था। हाथ खाली थे, अवसर शून्य हो रहे थे और उस पर घर की चारदीवारी में ही कैद रहने की सामाजिक-राष्ट्रीय विवशता थी। कमोबेश उस दौर में उम्मीद भी नहीं कर सकते थे कि ऐसी वैश्विक महामारी का इलाज इतनी जल्दी खोजा जा सकेगा और अंततः मानवीय आबादी को इलाज उपलब्ध भी होगा। आज ऐसा संभव हो रहा है, तो खोजी वैज्ञानिकों और चिकित्सकों को कोटि-कोटि नमन्…।

  बहरहाल देश में प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली उच्चस्तरीय समिति ने निर्णय लिया है कि टीकाकरण की सीमित प्रक्रिया 16 जनवरी से शुरू होगी। ‘सीमित’ के मायने साफ  हैं कि पहली प्राथमिकता के तौर पर चिकित्सकों, नर्सों, अन्य स्वास्थ्यकर्मियों और अग्रिम पंक्ति के ‘योद्धाओं’ में ही टीकाकरण किया जाएगा। इनकी संख्या 3 करोड़ बताई गई है। यह जमात ऐसी है, जिसने कोरोना महामारी के खिलाफ  सामने से जंग लड़ी है। वायरस के जानलेवा प्रभावों को देखा और महसूस किया है। करीब 400 डॉक्टरों को असमय ही प्राण गंवाने पड़े हैं, लेकिन उन्होंने पराजय स्वीकार नहीं की और मोर्चेबंदी को ढहने नहीं दिया। कई विरोधाभास और दुष्प्रचार भी देश ने सुने और देखे होंगे, लेकिन ऐसे ‘योद्धाओं’ के प्रयासों ने आज कोरोना को लगभग बेदम और निष्क्रिय-सा कर दिया है। आज भारत के 15 राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों में संक्रमण-दर 5 फीसदी तक सिमट गई है। देश ने महामारी की दो अथवा तीन ‘लहरों’ का तांडव देखा है, लेकिन आज संक्रमण के साथ-साथ मौत की औसत दर भी विश्व में सबसे कम है। संक्रमित मरीजों की रोजाना की संख्या भी लगातार 20,000 से कम हो गई है। मौतें भी 200 के दायरे में सिमटती जा रही हैं। यह स्थिति ‘स्वास्थ्य योद्धाओं’ की सेवाओं की ही देन है। टीकाकरण की तो शुरुआत अब होनी है। बेशक इस घड़ी का आनंद महसूस करें, लेकिन आग्रह है कि दहशत न फैलाएं, हड़बड़ी न मचाएं, टीका लगवाने के लिए हथकंडे न अपनाएं।

यह तय है कि जिसे कोरोना टीके की जरूरत होगी, उसे निश्चित तौर पर टीका दिया जाएगा, लेकिन प्राथमिकता वालों की जिंदगी बचाने के बाद ही आम आदमी का नंबर आएगा। आग्रह यह भी है कि टीका चिकित्सीय है। उसका धर्म, मजहब, जाति, लिंग, नस्ल से कोई संबंध नहीं है, लिहाजा हराम या हलाल सरीखे दुष्प्रचारों से भी गुमराह न हों। टीकाकरण स्वैच्छिक है, लेकिन प्रख्यात चिकित्सकों का सुझाव है कि देश और परिवार को संक्रमण से बचाए रखने के लिए टीके की दो खुराकें जरूर लें। फिलहाल टीकाकरण निःशुल्क है, लेकिन इतने बड़े देश की पूरी आबादी के लिए यह संभव नहीं होगा। वैसे भी सरकार को अभी अंतिम निर्णय लेना है। सोमवार 11 जनवरी को प्रधानमंत्री मोदी सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से वर्चुअल संवाद करेंगे। संभवतः उसके बाद कोई नीति सामने आएगी। बहरहाल टीकाकरण की प्रक्रिया बहुत लंबी और पेचीदा भी है। भारत शहरों में ही नहीं, गांवों में बसता है। दूरदराज के कई इलाके ऐसे भी हैं, जहां आज भी पक्की सड़क नहीं है, परिवहन के साधन वहां तक नहीं जा सकते, लिहाजा कोल्ड चेन के बंदोबस्त के साथ ऐसे इलाकों में टीका पहुंचाना वाकई बड़ी चुनौती होगी। भारत अभी तकनीकी या इंटरनेट-विशेषज्ञ देश नहीं हुआ है, सॉफ्टवेयर, ऐप और पंजीकरण सरीखी कई समस्याएं सामने आएंगी। इस आधार पर ही किसी को टीका देने से वंचित नहीं रखा जा सकता। सरकार ने चुनाव जैसी व्यवस्था स्थानीय स्तर पर जरूर की होगी। बहरहाल एक ऐतिहासिक शुरुआत होने जा रही है, लिहाजा कुछ अनहोनियां भी संभव हैं, लेकिन उनके आधार पर पूरी व्यवस्था को ही नकारा करार नहीं दिया जा सकता। अपने चिकित्सकों और वैज्ञानिकों पर भरोसा कीजिए और टीके का स्वागत कीजिए।

2.रेस्ट हाउस स्टे योजना बनाएं

दिल्ली में हिमाचल की इमारतों में एक और बढ़ोतरी नए अतिथि गृह से होने जा रही है और इस तरह हिमाचल भवन और सदन के अलावा राज्य की छत के नीचे विश्राम करने की सुविधा बढ़ जाएगी। हिमाचल में विश्राम गृहों की सुविधा देश में अव्वल आंकी जा सकती है, लेकिन इनके उपयोग की व्यवस्था को सही करने की जरूरत है। प्रदेशभर में डेढ़ हजार से भी अधिक रेस्ट हाउस व सर्किट हाउस स्थापित हैं, जबकि इनकी व्यवस्था बिखरी हुई तथा किसी भी जवाबदेही के अभाव में माकूल नहीं मानी जा सकती। कमोबेश हर विभाग, बोर्ड, निगम तथा प्रशासन अपनी जरूरतों व सियासी ख्वाहिशों से रू-ब-रू होकर विश्राम गृहों की शिनाख्त करता है, जबकि इनका सही संचालन राज्य की उपयोगिता में साबित हो सकता है। भले ही वन विभाग ने ईको टूरिज्म की दृष्टि से अपने कई डाकबंगलों को नए लक्ष्यों से जोड़ने का संकल्प पाला है, लेकिन कोई स्पष्ट नीति सामने नहीं आई है।

 पूर्व में धूमल सरकार  ने विश्राम गृहों तथा सर्किट हाउसों को पर्यटकों के लिए उपलब्ध कराने का निर्णय तो लिया, लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से यह नहीं हुआ। हमारा मानना है कि जिस तरह होम स्टे योजना के तहत नागरिक अपने घरों में पर्यटक सुविधा जुटा कर इस प्रदेश को नए आयाम से जोड़ रहे हैं, उसी तर्ज पर ‘रेस्ट हाउस स्टे’ जैसी योजना को पारंगत करना होगा। इसके लिए रेस्ट हाउस संपत्तियों की देखरेख तथा व्यावसायिक प्रबंधन के लिए सारी व्यवस्था किसी एक एजेंसी के तहत लानी चाहिए। इसी एजेंसी के तहत तमाम सरकारी इमारतों के निर्माण तथा प्रबंधन करें, तो सार्वजनिक भूमि का सही-सही इस्तेमाल भी होगा। प्रशासनिक तथा विभागीय विस्तार के कारण यह एक अनिवार्य विषय है कि सरकारी संपत्तियों को सूचीबद्ध करके इनका कुशल संचालन करें। ऐसे में राज्य एस्टेट प्रबंधन तथा विकास बोर्ड या प्राधिकरण का गठन करके यह सुनिश्चित करना होगा कि सरकारी संपत्तियों का बेहतर इस्तेमाल तथा आवश्यक विस्तार कैसे किया जाए। एस्टेट विकास प्राधिकरण के तहत सरकारी इमारतों के अलावा विश्राम गृहों का निर्माण, विस्तार तथा प्रबंधन इस आधार पर  किया जाए कि शहरी जमीन बचाई जा सके। वर्तमान में कमोबेश हर विभाग जरूरत व इस्तेमाल से कहीं अधिक जमीन पर अनुपयोगी संपत्तियों पर काबिज है, जबकि शहरी विकास योजनाओं से इनके तहत जमीन का भविष्य के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

अतीत में संयुक्त कार्यालय भवनों का निर्माण शुरू हुआ था या कहीं-कहीं मिनी सचिवालय बने, लेकिन इन्हें योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया नहीं जा सका। अगर गांवों से शहरों तक कार्यालयों को एक ही छत के नीचे लाने के लिए बजट आबंटन हो तो व्यय, निर्माण गुणवत्ता व इनके इस्तेमाल में पारदर्शिता आएगी। इसी तरह विभागीय रेस्ट हाउसों के बजाय बड़े शहरों में पचास से सौ या शिमला व धर्मशाला में दो सौ कमरों से युक्त संयुक्त विश्राम गृह बनाए जाएं। इससे जमीन, धन और प्रबंधन का सदुपयोग होने के अलावा इनका उपयोग भी बढ़ेगा। इस सारे कार्य की दक्षता में एस्टेट विकास प्राधिकरण न केवल सरकारी संपत्तियों की उपयोगिता बढ़ा पाएगा, बल्कि बेहतर प्रबंधन से ये शहरी विकास को सुनियोजित व विश्राम गृहों के आकार में पर्यटक सुविधाएं भी बढ़ा पाएगा। शिमला व धर्मशाला में दो सौ कमरों तक सुसज्जित विश्राम गृहों का निर्माण हो तो विधानसभा सत्र के दौरान न केवल विभागीय गतिविधियों को आसरा मिलेगा, बल्कि जनता को भी आश्रम उपलब्ध होगा। तपोवन विधानसभा परिसर के साथ ऐसे विश्राम गृह का निर्माण, शीतकालीन सत्र के अनावश्यक खर्चे का स्थायी हल होगा और साथ ही साल भर पर्यटकों के लिए सुविधाजनक आवासीय व्यवस्था उपलब्ध करेगा।

  1. कौओं-परिंदों की चिंता

देश के सात से अधिक राज्यों में बर्ड फ्लू के कारण सैकड़ों पक्षियों का मरना या मारा जाना दुखद तो है ही, मानवता पर प्रश्नचिह्न भी है। बेजुबान पक्षियों में भी कौओं की बड़ी संख्या में मौत झकझोर रही है। कौओं की चिंता इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि अव्वल तो शहरों में उनकी संख्या बहुत घट चुकी है, गांवों में भी वे पहले की तरह नजर नहीं आते हैं। ऐसे में, उनकी मौत बाकी बचे हुए कौओं को मानव बस्तियों से बहुत दूर कर देगी। कौओं के साथ मानव बस्तियों का रिश्ता पुराना है। वे सदियों से सफाईकर्ता के रूप में हमारे आसपास से नाना प्रकार के जहरीले या अवांछित कीड़े-मकोड़ों को हटाते आए हैं। उनका हमारे पास न होना, हमारी सेहत के लिए भी खतरनाक है। कौओं की मौत की सूचना राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, केरल, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश से विशेष रूप से आ रही है। विशेषज्ञ जांच में लगे हैं, लेकिन सामान्य रूप से कौओं में बर्ड फ्लू का संक्रमण दूसरे पक्षियों से ही हुआ होगा। आमतौर पर कौओं को दूसरे पक्षियों, जंतुओं के शव खाते-उठाते देखा जाता है, इसी वजह से उनमें संक्रमण की गुंजाइश ज्यादा रहती है। इस बार ज्यादा आशंका यह है कि विदेशी पक्षियों के जरिए ही बर्ड फ्लू का देश में संक्रमण हुआ है। सर्दियों में बड़ी संख्या में विदेशी पक्षी भारत के ताल, तालाबों, खेतों में समय बिताने आते हैं। कुछ पक्षी तो यहां सर्दियों के समय चार से पांच महीने तक रहते हैं। ऐसे में, यह बहुत जरूरी है कि विदेशी पक्षियों की खास तौर पर निगरानी की जाए। ताल-तालाबों के आसपास नजर रखने के साथ ही साफ-सफाई के काम को मुस्तैदी से अंजाम देना होगा। यह वही मौसम है, जब किसी न किसी राज्य से बड़ी संख्या में पक्षियों की मौत की खबर आती है, अत: संबंधित महकमों और विशेषज्ञों को सचेत हो जाना चाहिए। बर्ड फ्लू अत्यधिक गंभीर संक्रामक और श्वसन रोग है, जो मनुष्यों में फैला, तो बहुत घातक स्वरूप में सामने आएगा। 
इस साल बर्ड फ्लू की ज्यादा चिंता करने की जरूरत है, क्योंकि कोरोना से तबाह अर्थव्यवस्था और झटके झेलने की स्थिति में नहीं है।  प्रशासन को वाकई हाई अलर्ट पर रहना होगा। बर्ड फ्लू अर्थात एवियन इन्फ्लूएंजा के प्रकोप को रोकने के लिए अधिकारियों को प्रभावित क्षेत्रों के दो-तीन किलोमीटर के दायरे में बत्तखों, मुर्गियों, पक्षियों आदि पर निगाह रखनी पडे़गी। देश में जहां से भी बर्ड फ्लू की सूचना मिले, वहां सावधानी से उतने ही पक्षियों को मारना चाहिए, जितना बहुत जरूरी हो। जहां बर्ड फ्लू का संक्रमण नहीं हुआ है, वहां घबराने की जरूरत नहीं, पर सतर्क रहकर पक्षियों और उनकी गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए। जहां कौए हैं, वहां उनके लिए दाना-पानी की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि उन्हें अन्य पक्षियों-कीड़ों के शव के पीछे घात न लगाना पडे़। हमें पक्षियों के स्वास्थ्य के प्रति भी सजग होना चाहिए। भारत एक ऐसा देश है, जहां सदियों से मेहमान पक्षी आते रहे हैं, अत: भारत में प्रवासी पक्षियों के स्वास्थ्य के अलावा स्वदेशी पक्षियों की भी चिंता जरूरी है। विशेष रूप से मानव व मानव आबादी को पसंद करने वाले कौओं को बचाने के लिए हरसंभव प्रयास जरूरी हैं। कौओं में भी कुछ प्रजातियां विरल हो चली हैं, बर्ड फ्लू के बहाने ही सही, उनके लिए संवेदना बढे़, तो हम मनुष्यों का ही भला होगा।

  1. पाक की नूरा कुश्ती

दिखावे के लिए आतंकियों पर शिकंजा

ऐसे वक्त में जब पाकिस्तान की आतंकवाद पोषण की नीतियों पर निगाह रखने वाली अंतर्राष्ट्रीय नियामक संस्था की फरवरी में बैठक होने जा रही है, पाक कुख्यात आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई का नाटक कर रहा है। मुंबई हमले के मास्टर माइंड और जम्मू-कश्मीर में आतंक फैलाने वाले संगठन लश्कर-ए-तैयबा के अगु‍आ जकी-उर-रहमान लखवी को हाल ही में गिरफ्तार किया गया है। उसे संयुक्त राष्ट्र ने 2008 में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किया था। लखवी पर आतंकियों को धन-सहायता उपलब्ध कराने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। पाक की एक अदालत ने आतंकवाद के वित्तपोषण के मामले में लखवी को पंद्रह साल जेल की सजा सुनायी है। यह विडंबना ही है कि एफएटीएफ जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की बैठकों से पहले पाक इसी तरह के प्रपंच आंख में धूल झोंकने के लिए करता है। इसी तरह एक अन्य कुख्यात आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर के खिलाफ भी आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप में गिरफ्तारी वारंट जारी किये गये हैं। निस्संदेह पाक सरकार फरवरी में वित्तीय कार्रवाई कार्यबल यानी एफएटीएफ तथा इससे पहले इसकी एशिया प्रशांत संयुक्त समूह इकाई की बैठक के मद्देनजर यह कार्रवाई का नाटक कर रहा है, जिसकी भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी कड़े शब्दों में आलोचना करते हुए इसे नाटक बताते हुए कहा है कि महत्वपूर्ण बैठकों से पहले पाक ऐसी ही हरकत करता रहा है।

दरअसल, पाक सरकार ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकवादियों के खिलाफ कभी भी ठोस कार्रवाई नहीं की है। प्रतिबंधित आतंकी संगठन गाहे-बगाहे भारत के खिलाफ सार्वजनिक मंचों से विषवमन करके अपने मंसूबों को अंजाम देते रहते हैं। पाक के सरकारी प्रतिष्ठान भी भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए इनका इस्तेमाल करते हैं। विश्व बिरादरी का दायित्व बनता है कि पाक की जवाबदेही तय की जाये ताकि पाक में सक्रिय सभी आतंकी संगठनों, उनके बुनियादी ढांचे तथा आतंकी सरगनाओं के खिलाफ ठोस कार्रवाई हो सके। दरअसल, पाक एफएटीएफ द्वारा घोषित ग्रे लिस्ट से बाहर आने के लिये छटपटा रहा है, जिसमें चीन उसकी खुली मदद कर रहा है। उसी कड़ी में लखवी की गिरफ्तारी का यह ढोंग सामने आ रहा है। दरअसल, पाक को यह डर भी सता रहा है कि एफएटीएफ द्वारा निर्धारित सूची पूरी न कर पाने से कहीं वह काली सूची में न दर्ज हो जाये। यदि ऐसा होता है तो पहले से चरमराई पाक की अर्थव्यवस्था चौपट हो जायेगी। पाक में विदेशी निवेश और मदद के सभी रास्ते बंद हो जायेंगे। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2019 में भी एफएटीएफ की बैठक से ठीक पहले कुख्यात आतंकवादी सरगना हाफिज सईद को गिरफ्तार किया गया था। बीते वर्ष अक्तूबर में एफएटीएफ की बैठक में कार्रवाई योजना को अंतिम रूप देने के लिये पाक को तीन माह का समय दिया गया था और यह निर्धारित अवधि का तीसरा महीना है, जिसमें से छह लक्ष्य अभी बाकी हैं।

 

 

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