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Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.शहरी आय बढ़ाने के तर्क

शहरी निकायों की आय पर राज्य योजना बोर्ड उपाध्यक्ष  रमेश धवाला के सुझाव कितना प्रेरित करेंगे, लेकिन इनकी अनिवार्यता को नजरअंदाज नहीं कर सकते। आय के अतिरिक्त संसाधन पैदा करने की नसीहत के साथ-साथ यह भी सोचना होगा कि हिमाचल का शहरी ढांचा किस तरह प्रदेश की जीडीपी में सहयोगी भूमिका में भविष्य रेखांकित कर सकता है। प्रदेश के शहरों का वर्गीकरण करके देखें तो धार्मिक, प्रशासनिक, व्यापारिक, पर्यटन, औद्योगिक तथा शिक्षा के हब को रुपांतरित करते कई नगर आगे बढ़ रहे हैं। कमोबेश हर शहर की परिधि में व्यवसाय बढ़ रहा है, लेकिन इसे व्यवस्थित परिभाषा में आगे नहीं देखा जा रहा। प्रदेश के करीब आधा दर्जन धार्मिक स्थल अपनी भूमिका तथा आस्था के प्रारूप के कारण समाज के एक बड़े वर्ग को रोजगार देते आए हैं। ज्वालाजी, चिंतपूर्णी, दियोटसिद्ध, नयनादेवी, चामुंडा, बालासुंदरी या कांगड़ा जैसे शहरों से जुड़ी आस्था के कारण आर्थिकी विकसित हुई है।

 धार्मिक पर्यटन की अपनी क्षमता है, लेकिन हिमाचल ने इसे आर्थिक बढ़ोतरी के नजरिए से पनपने का मौका ही नहीं दिया। अगर देवी स्थलों के आठ से दस किलोमीटर इलाके को मंदिर परिसर के साथ जोड़कर विकसित किया जाए, तो मंदिर आय के सदुपयोग से रोजगार, आर्थिक व व्यापारिक गतिविधियां नए आयाम तक नहीं पहुंचेंगी, बल्कि दक्षिण भारत की तर्ज पर अगले कुछ सालों में इन्हें पांच हजार करोड़ तक की आमदनी का जरिया बनाया जा सकता है। इसी तरह प्रदेश के स्वास्थ्य संस्थानों के साथ कुछ शहरों को हैल्थ टूरिज्म तथा उच्च स्तरीय खेल ढांचे के साथ खेल पर्यटन के लाभ से जोड़ा जा सकता है। प्रदेश के हर छोटे-बड़े शहर को अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए अपने तौर पर बस स्टैंड, माल, व्यापारिक केंद्र तथा सैरगाहें विकसित करनी होंगी। शहर की शिनाख्त में आधुनिक सब्जी तथा फल मंडियां, मनोरंजन के साधन, सांस्कृतिक-व्यापारिक मेले तथा कांवेंशन अधोसंरचना पैदा करके आय पैदा होगी। आय बढ़ाने के लिए नगर निगमों का खाका स्पष्ट होना चाहिए, क्योंकि पैंतीस हजार की आबादी पर केंद्रित शहर को स्पष्ट आर्थिक दिशा चाहिए। नगर निगमों के तहत सर्वप्रथम भूमि बैंक स्थापित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे तथा इसके साथ बैंकिंग व कारपोरेट सेक्टर का सहयोग सुनिश्चित करना होगा। शहरों की सरकारी संपत्तियों तथा सार्वजनिक भूमि का सदुपयोग कुछ इस तरह करना होगा ताकि अतिरिक्त जमीन पर निरंतर आय के स्रोत पैदा किए जा सकें। हर शहर अपनी क्षमता व जरूरतों के हिसाब से पीपीपी मोड पर सिटी हास्पिटल का संचालन करे, तो सुविधा व संसाधन पैदा होंगे।

 हर शहर की आय बढ़ाने के लिए आवासीय अपार्टमेंट्स का निर्माण करना होगा। तुलनात्मक दृष्टि से हिमाचल के शहरों की परिधि में आबादी का घनत्व कम है, लिहाजा दो-तीन नगरों के क्लस्टर बनाकर खर्चा कम किया जा सकता है। शहरी प्रबंधन की लागत घटा कर भी आय की उपयोगिता बढ़ाने की दिशा में प्रयास करने होंगे। सारे प्रदेश की जनता को शहरी एवं ग्राम योजना के तहत लाने के लिए एक नई चेतना की जरूरत है। यह आश्चर्य का विषय है कि किन्नौर का जिला मुख्यालय रिकांगपिओ अभी भी पंचायत क्षेत्र है, जबकि इसके आधुनिक विकास के लिए कम से कम आधा दर्जन गांव जोड़कर नगर पंचायत या परिषद का दर्जा मिलना चाहिए। गगल (कांगड़ा) जैसे गांव को भी इसके आर्थिक कारणों व गैर कृषि के आधार के कारण शहरी घोषित करना चाहिए क्योंकि ऐसे कस्बे ऑटो व्यापार के प्रमुख केंद्र हैं। अमूमन यह देखा गया है कि हिमाचल की जनता कर अदायगी के बजाय ऐसी व्यवस्था में रहना चाहती है, जहां हर खर्च सरकार वहन करे। दूसरी ओर राजनीतिक कारणों से सत्ता व नगर व्यवस्था में पक्ष-विपक्ष चुना जाता है, तो आय के स्रोत तहस-नहस हो जाएंगे। उदाहरण के लिए धर्मशाला नगर निगम ने अपनी आय बढ़ाने के लिए जो प्रस्ताव सरकार की अनुमति के लिए भेजे थे, वे आज तक स्वीकृत नहीं हुए। दरअसल शहरी आबादी को अब नए संबोधनों की जरूरत है और इनके प्रबंधन के लिए निजी निवेश की व्यापकता तथा आर्थिकी बढ़ाने का नवाचार चाहिए।

2.क्या सेना-वापसी स्थायी?

पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग झील के तटों से भारत-चीन सेनाओं की वापसी शुरू हो गई है। यह दोनों देशों के बीच समझौते और सहमति का फलितार्थ है। अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिक चरणबद्ध, समन्वय और सत्यापन के साथ लौटेंगे। टैंक और बख्तरबंद वाहन भी लौट रहे हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद के दोनों सदनों में सेना-वापसी और समझौते का खुलासा करते हुए दावा किया कि इस प्रक्रिया में भारत को एक इंच ज़मीन भी खोनी नहीं पड़ी है। अलबत्ता करीब 43,000 वर्ग किलोमीटर पर चीन और पाकिस्तान का अनधिकृत कब्जा जरूर है, जो देश की आज़ादी के दौर में और 1962 में चीन युद्ध के बाद भारत को झेलना पड़ा है। भारत-चीन में समझौते और सेनाओं की वापसी से लद्दाख स्थित वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर कमोबेश तनाव और युद्ध के आसार बेहद कम होंगे। पैंगोंग के उत्तरी तट पर फिंगर-8 के पीछे पूर्व दिशा की ओर चीनी सेना जाएगी और फिंगर-3 पर भारत के स्थायी बेस धनसिंह थापा पोस्ट पर हमारे सैनिक रहेंगे। फिलहाल इस इलाके में सैन्य गतिविधियों और गश्त पर अस्थायी रोक के लिए भी दोनों पक्षों में समझौता हुआ है।

 भारत के रक्षा विशेषज्ञ इस समझौते और स्थिति को ‘बहुत बड़ी जीत’ मान रहे हैं, लेकिन उनके कुछ बुनियादी और कूटनीतिक सवाल भी हैं। क्या यह सेना-वापसी स्थायी साबित होगी अथवा महज एक शुरुआत होकर ही रह जाएगी? क्या इतना बड़ा समझौता करने के बावजूद चीन के छल और पीठ में छुरा घोंपने की उसकी फितरत पर अब भी भरोसा किया जा सकता है? सवाल यह भी बेहद नाजुक है कि क्या चीन देपसांग का इलाका भी खाली  करेगा? क्या चीनी सैनिक पीपी-13ए और 10 में हमारे सैनिकों की पेट्रोलिंग को बाधित करते रहेंगे? क्या चीन पेट्रोलिंग प्वाइंट-14 से भी पीछे हटेगा? इन सवालों से स्पष्ट है कि चीन की मोर्चेबंदी फिलहाल मौजूद है। पूर्व जनरल स्तर के रक्षा विशेषज्ञ देपसांग इलाके को बेहद महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील इसलिए मानते हैं, क्योंकि यहां से चीनी सेनाएं काराकोरम दर्रे वाले इलाके पर अपनी आंख गड़ाए रख सकती हैं और सियाचिन क्षेत्र का खतरा बढ़ सकता है। क्या समझौते में सिर्फ  पैंगोंग झील के उत्तरी-दक्षिणी तटों से सेनाओं की वापसी ही तय हुई है? सवाल यह भी है कि भारत के सैनिकों ने ‘ब्लैक टॉप’ और ‘हैलमेट टॉप’ सरीखी पहाड़ी चोटियों पर कब्जा जमा कर चीनी सैनिकों को रक्षात्मक होने पर विवश किया था, क्या उन चोटियों पर हमारा कब्जा बरकरार रहेगा? हालांकि रक्षा मंत्री ने संसद में खुलासा किया है कि चोटियों पर भारतीय सैनिक तैनात हैं। दरअसल यह सवाल का सटीक जवाब नहीं है।

 रक्षा मंत्री ने यह भरोसा दिलाने की कोशिश जरूर की है कि पैंगोंग इलाके में अप्रैल, 2020 से पहले की स्थिति बहाल होगी। इस कालखंड में भारत-चीन सेनाओं ने जो भी निर्माण किए हैं, ढांचे खड़े किए हैं, उन्हें हटाना अथवा ध्वस्त करना होगा। यानी लद्दाख की एलएसी पर कुछ हद तक यथास्थिति बहाल होगी, लेकिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी का मानना है कि एलएसी पर न  तो यथास्थिति है और न ही शांति है। सैनिकों का अपमान किया जा रहा है। बहरहाल ऐसी टिप्पणियों को यहीं छोड़ देना चाहिए। गौरतलब यह है कि आखिर किन हालात ने चीन को समझौते के लिए बाध्य किया? चीन की अभी तक की रणनीति यह रही है कि वह हमले कर ज़मीन पर कब्जा करता है और फिर उसे अपना इलाका घोषित कर देता है, लेकिन इस बार भारतीय सैनिकों ने साबित कर दिया है कि वे 1962 के दौर में नहीं हैं। हमारे जांबाजों ने पहले डोकलाम में चीनी सैनिकों का मुकाबला कर उन्हें खदेड़ा। फिर गलवान और पैंगोंग में इतना लंबा मुकाबला किया, इसी दौरान सिक्किम के नाकू ला इलाके में भी चीनियों संग हाथापाई की नौबत आई। सभी स्तरों पर हमारे सैनिकों ने मुंहतोड़ जवाब दिया। लद्दाख के हालात और समीकरण इतने तनावग्रस्त रहे कि बार-बार युद्ध के आसार की व्याख्याएं की गईं। भारत के खंपा लड़ाकुओं ने यह भी साबित किया कि पहाड़ी चोटियों पर लड़ने में उनका कोई भी सानी नहीं है, जबकि चीनी सैनिक बीमार होते रहे, बेहोश होते रहे और दूर से ही मशीनों के जरिए मोर्चा संभाले रखा। अंततः चीन के नेतृत्व ने पीछे हटने का फैसला लेना तय किया। दोनों पक्षों के कमांडरों की 9वीं बैठक में, अंततः, समझौता हुआ। फिलहाल देखना यह है कि स्थितियां कितनी स्थायी रहती हैं?

3.इस्तीफे के मायने

तृणमूल कांग्रेस पर मंडराता संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। केंद्रीय स्तर पर तृणमूल का चेहरा माने जाने वाले दिनेश त्रिवेदी ने राज्यसभा में ही अपने इस्तीफे का एलान करके सबको न केवल चौंका दिया है, बल्कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल की मुश्किलों को बहुत बढ़ा भी दिया है। इस्तीफे का एलान करते हुए दिनेश त्रिवेदी ने जो उद्गार व्यक्त किए हैं, वह काबिले गौर हैं। उन्होंने साफ कहा है कि मुझसे अब देखा नहीं जा रहा, मुझे घुटन महसूस हो रही है। आज मैं देश के लिए, बंगाल के लिए अपना इस्तीफा दे रहा हूं। पश्चिम बंगाल में अब तक हमने मध्य पीढ़ी के नेताओं को ही तृणमूल छोड़कर जाते देखा है, लेकिन पार्टी का एक दिग्गज और अपेक्षाकृत ज्यादा शालीन नेता अगर कह रहा है कि उसे घुटन महसूस हो रही है, तो यह तृणमूल के लिए खतरे की घंटी है। अब यह विश्लेषण का विषय है कि दिनेश त्रिवेदी के इस्तीफे से पश्चिम बंगाल की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा? उनके भारतीय जनता पार्टी में आने से समीकरण कितने बदलेंगे? क्या यह भाजपा की एक बड़ी राजनीतिक कामयाबी है? भाजपा तो पहले ही बोल चुकी है कि चुनाव आने तक ममता बनर्जी अकेली पड़ जाएंगी, क्या वाकई बंगाल के समीकरण उसी दिशा में बढ़ रहे हैं? 
अनेक सवाल है, जो दिनेश त्रिवेदी के इस्तीफे से खड़े हुए हैं। बंगाल की राजनीति में हिंसा कोई ऐसी नई बात नहीं है, जिससे उन्हें अब अजीब लग रहा है? एकाधिक अवसरों पर उनका अपमान हुआ है, सुधारवादी रेल बजट पेश करने के बाद उनको रेल मंत्री पद से हटवाने का मामला हो या कार्टून विवाद पर तार्किक जवाब देने का मामला, नाराजगी अनेक बार सामने आ चुकी है। दिनेश त्रिवेदी के सामने पार्टी को पीठ दिखाने के अवसर पहले भी आए हैं, लेकिन अभी पार्टी छोड़ने के मायने सियासी चश्मे से ही ज्यादा देखे जाएंगे। यह भी ध्यान रखने की बात है कि पूर्व रेल मंत्री अनेक मौकों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते रहे हैं। कुछ साल पहले भी उनके भाजपा में शामिल होने की अटकलें तेज हुई थीं। ममता बनर्जी अब तक यही मानती आ रही हैं कि उनकी पार्टी के ‘दागदार’ नेताओं के लिए भाजपा वॉशिंग मशीन है। क्या वह दिनेश त्रिवेदी को भी दागदार मानेंगी? अब यह देखने वाली बात है कि तृणमूल अपने वरिष्ठ नेता पर कैसे हमलावर होगी। दिनेश त्रिवेदी के आरोप कहीं गहरे हैं कि पार्टी को ऐसे लोग चला रहे हैं, जो राजनीति का क ख ग नहीं जानते। उल्लेखनीय है कि करीब 40 नेता पार्टी नेतृत्व से नाराजगी जताते हुए भाजपा में शामिल हो चुके हैं और उन सभी के बारे में ममता बनर्जी के विचार बुरे हैं। पार्टी छोड़ने वालों को ‘सड़े सेब’ से ‘मीर जाफर’ तक कहा गया है। अगर ऐसा ही आरोप पूर्व रेल मंत्री पर भी लगेगा, तो पार्टी की छवि पर जरूर नकारात्मक असर पड़ेगा। वह तृणमूल के उन संस्थापक सदस्यों में रहे हैं, जिन्होंने 16 साल पहले तृणमूल कांग्रेस बनाई थी। तृणमूल के लिए यह आत्मसमीक्षा का समय है। आक्रामक ढंग से दुश्मनों या प्रतिद्वंद्वियों को जवाब दिया जा सकता है, लेकिन अपने संस्थापक सदस्यों के साथ भी ऐसा ही उग्र रवैया पार्टी की बुनियाद को कमजोर करेगा। यह अवसर है, जब तमाम राजनीतिक पार्टियों को पूरी गंभीरता से अपने यहां लोकतंत्र और अपनी मजबूती बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए।

4.सहमति की ओर

स्थायी समाधान की ओर बढ़ें दोनों देश

भारत-चीन के बीच जारी नौ महीने के गतिरोध के बाद लद्दाख स्थित पैंगोंग झील के उत्तरी-दक्षिणी तट पर दोनों देशों के सैनिकों को हटाने पर बनी सहमति स्वागतयोग्य ही कही जायेगी। राजनयिक और सैन्य स्तर पर कई दौर की बातचीत के बाद एलएसी पर तनाव का कम होना दोनों देशों के हित में ही है क्योंकि दोनों बड़े मुल्कों में टकराव विश्वव्यापी संकट को जन्म दे सकता था। विगत में विदेशमंत्री एस. जयशंकर और उनके चीनी समकक्ष वांग यी के बीच मास्को में हुई बैठक में तनाव कम करने के लिये पांच सूत्रीय कार्ययोजना पर बात हुई थी लेकिन लंबे समय से इसके सार्थक परिणाम नजर नहीं आये थे। अब इस मुद्दे पर सहमति के बावजूद भारत को सतर्कता में कोई चूक नहीं करनी चाहिए। दशकों से जारी सीमा निर्धारण को लेकर बातचीत चीन के अड़ियल रवैये के चलते किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पायी है। इसके बावजूद चीनी सैनिकों का पीछे हटना सेना के लिये राहतकारी है, जो गलवान घाटी के घटनाक्रम के बाद विषम मौसम में भी हाई अलर्ट पर है। भारत को चीनी मंसूबों की लगातार निगरानी करने की जरूरत है। साथ ही आपसी विश्वास बहाली के लिये निरंतर प्रयास करते रहने होंगे। अतीत में विश्वास तोड़ने की चीनी कोशिशों ने भारतीयों के मन में अविश्वास को जन्म दिया है। इतिहास ने हमें कई कड़वे सबक दिये हैं, खासकर 1962 के आक्रमण में जब शांति की बात करते हुए चीन ने भारतीय नेतृत्व से छल किया। जुलाई, 1962 में पं. नेहरू ने लद्दाख से चीनी सैनिकों की आंशिक वापसी का स्वागत किया था परंतु उसके तीन माह बाद ही चीन ने भारतीय क्षेत्र पर आक्रमण कर दिया था। हालांकि, भारत 1962 की स्थितियों से बहुत आगे निकल चुका है, लेकिन फिर भी सतर्क रहने की जरूरत है। चिंता की बात यह है कि चीनी नीतियों में पारदर्शिता का अभाव रहा है।

ऐसे में भारत को चीनी कदम के सभी पहलुओं का मूल्यांकन कर कदम बढ़ाने होंगे। राज्यसभा में रक्षा मंत्री के बयान के अनुसार समझौते के बाद चीनी सैनिक पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे पर फिंगर 8 के पास रहेंगे और भारतीय सैनिक फिंगर तीन के पास रहेंगे। इस बीच दोनों स्थानों के बीच गश्त पर अस्थाई रोक रहेगी। बहरहाल, लंबे गतिरोध के बाद कम से कम एक क्षेत्र से चीनी सैनिकों की वापसी शुरू हुई है। निस्संदेह इस कदम से दोनों देशों के संबंधों में जमी अविश्वास की बर्फ पिघलेगी। इस बात पर सहमति बनी बताई जा रही है कि तनाव के दौरान इस क्षेत्र में हुए निर्माण भी हटाये जायेंगे। इस समझौते के आलोक में इस बात की उम्मीद जगी है कि देप्सांग व गलवान घाटी में बाकी विवादास्पद मुद्दों को सुलझाने की शीघ्र पहल होगी। हालिया सहमति को आधार बनाकर आगे अन्य विवादों को सुलझाने की पहल होनी चाहिए। यह भरोसा तो जगा है कि चीन की तरफ से ईमानदार पहल हो तो तनाव घटाते हुए अन्य विवादों का भी पटाक्षेप हो सकता है। जाहिरा तौर पर सीमा पर आशंकाओं के बादल तो छटे ही हैं। दो सीमाओं पर सुरक्षा की चुनौती से निपटना सेना के लिये भी एक बड़ी चुनौती रही है। उम्मीद जरूर जगी है कि बातचीत के लिये अब अनुकूल वातावरण बनेगा। साथ ही वास्तविक नियंत्रण रेखा से जुड़े विवादों के निपटारे की दिशा में दोनों देश आगे बढ़ सकेंगे। निस्संदेह संवादहीनता संबंधों में कई तरह की जटिलताओं को जन्म देती है। बहुत संभव है कि पैंगोंग झील के तटों को लेकर हुआ समझौता आगे की बातचीत का आधार बने। ऐसे में इस सकारात्मक प्रगति का स्वागत ही किया जाना चाहिए। साथ ही लंबे समय तक तनाव और गलवान के जख्मों के बाद दोनों देशों ने जैसा संयम दिखाया, वह भविष्य की बातचीत की राह दिखाने वाला है। साथ ही ताजा घटनाक्रम यह विश्वास तो जगाता ही है कि बगैर बाहरी हस्तक्षेप के दोनों देश अपने विवादों को सुलझाने में सक्षम है। कोशिश हो कि विवाद के इस पटाक्षेप को कोई देश हार-जीत के रूप में न ले।

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Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.शहरी आय बढ़ाने के तर्क

शहरी निकायों की आय पर राज्य योजना बोर्ड उपाध्यक्ष  रमेश धवाला के सुझाव कितना प्रेरित करेंगे, लेकिन इनकी अनिवार्यता को नजरअंदाज नहीं कर सकते। आय के अतिरिक्त संसाधन पैदा करने की नसीहत के साथ-साथ यह भी सोचना होगा कि हिमाचल का शहरी ढांचा किस तरह प्रदेश की जीडीपी में सहयोगी भूमिका में भविष्य रेखांकित कर सकता है। प्रदेश के शहरों का वर्गीकरण करके देखें तो धार्मिक, प्रशासनिक, व्यापारिक, पर्यटन, औद्योगिक तथा शिक्षा के हब को रुपांतरित करते कई नगर आगे बढ़ रहे हैं। कमोबेश हर शहर की परिधि में व्यवसाय बढ़ रहा है, लेकिन इसे व्यवस्थित परिभाषा में आगे नहीं देखा जा रहा। प्रदेश के करीब आधा दर्जन धार्मिक स्थल अपनी भूमिका तथा आस्था के प्रारूप के कारण समाज के एक बड़े वर्ग को रोजगार देते आए हैं। ज्वालाजी, चिंतपूर्णी, दियोटसिद्ध, नयनादेवी, चामुंडा, बालासुंदरी या कांगड़ा जैसे शहरों से जुड़ी आस्था के कारण आर्थिकी विकसित हुई है।

 धार्मिक पर्यटन की अपनी क्षमता है, लेकिन हिमाचल ने इसे आर्थिक बढ़ोतरी के नजरिए से पनपने का मौका ही नहीं दिया। अगर देवी स्थलों के आठ से दस किलोमीटर इलाके को मंदिर परिसर के साथ जोड़कर विकसित किया जाए, तो मंदिर आय के सदुपयोग से रोजगार, आर्थिक व व्यापारिक गतिविधियां नए आयाम तक नहीं पहुंचेंगी, बल्कि दक्षिण भारत की तर्ज पर अगले कुछ सालों में इन्हें पांच हजार करोड़ तक की आमदनी का जरिया बनाया जा सकता है। इसी तरह प्रदेश के स्वास्थ्य संस्थानों के साथ कुछ शहरों को हैल्थ टूरिज्म तथा उच्च स्तरीय खेल ढांचे के साथ खेल पर्यटन के लाभ से जोड़ा जा सकता है। प्रदेश के हर छोटे-बड़े शहर को अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए अपने तौर पर बस स्टैंड, माल, व्यापारिक केंद्र तथा सैरगाहें विकसित करनी होंगी। शहर की शिनाख्त में आधुनिक सब्जी तथा फल मंडियां, मनोरंजन के साधन, सांस्कृतिक-व्यापारिक मेले तथा कांवेंशन अधोसंरचना पैदा करके आय पैदा होगी। आय बढ़ाने के लिए नगर निगमों का खाका स्पष्ट होना चाहिए, क्योंकि पैंतीस हजार की आबादी पर केंद्रित शहर को स्पष्ट आर्थिक दिशा चाहिए। नगर निगमों के तहत सर्वप्रथम भूमि बैंक स्थापित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे तथा इसके साथ बैंकिंग व कारपोरेट सेक्टर का सहयोग सुनिश्चित करना होगा। शहरों की सरकारी संपत्तियों तथा सार्वजनिक भूमि का सदुपयोग कुछ इस तरह करना होगा ताकि अतिरिक्त जमीन पर निरंतर आय के स्रोत पैदा किए जा सकें। हर शहर अपनी क्षमता व जरूरतों के हिसाब से पीपीपी मोड पर सिटी हास्पिटल का संचालन करे, तो सुविधा व संसाधन पैदा होंगे।

 हर शहर की आय बढ़ाने के लिए आवासीय अपार्टमेंट्स का निर्माण करना होगा। तुलनात्मक दृष्टि से हिमाचल के शहरों की परिधि में आबादी का घनत्व कम है, लिहाजा दो-तीन नगरों के क्लस्टर बनाकर खर्चा कम किया जा सकता है। शहरी प्रबंधन की लागत घटा कर भी आय की उपयोगिता बढ़ाने की दिशा में प्रयास करने होंगे। सारे प्रदेश की जनता को शहरी एवं ग्राम योजना के तहत लाने के लिए एक नई चेतना की जरूरत है। यह आश्चर्य का विषय है कि किन्नौर का जिला मुख्यालय रिकांगपिओ अभी भी पंचायत क्षेत्र है, जबकि इसके आधुनिक विकास के लिए कम से कम आधा दर्जन गांव जोड़कर नगर पंचायत या परिषद का दर्जा मिलना चाहिए। गगल (कांगड़ा) जैसे गांव को भी इसके आर्थिक कारणों व गैर कृषि के आधार के कारण शहरी घोषित करना चाहिए क्योंकि ऐसे कस्बे ऑटो व्यापार के प्रमुख केंद्र हैं। अमूमन यह देखा गया है कि हिमाचल की जनता कर अदायगी के बजाय ऐसी व्यवस्था में रहना चाहती है, जहां हर खर्च सरकार वहन करे। दूसरी ओर राजनीतिक कारणों से सत्ता व नगर व्यवस्था में पक्ष-विपक्ष चुना जाता है, तो आय के स्रोत तहस-नहस हो जाएंगे। उदाहरण के लिए धर्मशाला नगर निगम ने अपनी आय बढ़ाने के लिए जो प्रस्ताव सरकार की अनुमति के लिए भेजे थे, वे आज तक स्वीकृत नहीं हुए। दरअसल शहरी आबादी को अब नए संबोधनों की जरूरत है और इनके प्रबंधन के लिए निजी निवेश की व्यापकता तथा आर्थिकी बढ़ाने का नवाचार चाहिए।

2.क्या सेना-वापसी स्थायी?

पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग झील के तटों से भारत-चीन सेनाओं की वापसी शुरू हो गई है। यह दोनों देशों के बीच समझौते और सहमति का फलितार्थ है। अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिक चरणबद्ध, समन्वय और सत्यापन के साथ लौटेंगे। टैंक और बख्तरबंद वाहन भी लौट रहे हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद के दोनों सदनों में सेना-वापसी और समझौते का खुलासा करते हुए दावा किया कि इस प्रक्रिया में भारत को एक इंच ज़मीन भी खोनी नहीं पड़ी है। अलबत्ता करीब 43,000 वर्ग किलोमीटर पर चीन और पाकिस्तान का अनधिकृत कब्जा जरूर है, जो देश की आज़ादी के दौर में और 1962 में चीन युद्ध के बाद भारत को झेलना पड़ा है। भारत-चीन में समझौते और सेनाओं की वापसी से लद्दाख स्थित वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर कमोबेश तनाव और युद्ध के आसार बेहद कम होंगे। पैंगोंग के उत्तरी तट पर फिंगर-8 के पीछे पूर्व दिशा की ओर चीनी सेना जाएगी और फिंगर-3 पर भारत के स्थायी बेस धनसिंह थापा पोस्ट पर हमारे सैनिक रहेंगे। फिलहाल इस इलाके में सैन्य गतिविधियों और गश्त पर अस्थायी रोक के लिए भी दोनों पक्षों में समझौता हुआ है।

 भारत के रक्षा विशेषज्ञ इस समझौते और स्थिति को ‘बहुत बड़ी जीत’ मान रहे हैं, लेकिन उनके कुछ बुनियादी और कूटनीतिक सवाल भी हैं। क्या यह सेना-वापसी स्थायी साबित होगी अथवा महज एक शुरुआत होकर ही रह जाएगी? क्या इतना बड़ा समझौता करने के बावजूद चीन के छल और पीठ में छुरा घोंपने की उसकी फितरत पर अब भी भरोसा किया जा सकता है? सवाल यह भी बेहद नाजुक है कि क्या चीन देपसांग का इलाका भी खाली  करेगा? क्या चीनी सैनिक पीपी-13ए और 10 में हमारे सैनिकों की पेट्रोलिंग को बाधित करते रहेंगे? क्या चीन पेट्रोलिंग प्वाइंट-14 से भी पीछे हटेगा? इन सवालों से स्पष्ट है कि चीन की मोर्चेबंदी फिलहाल मौजूद है। पूर्व जनरल स्तर के रक्षा विशेषज्ञ देपसांग इलाके को बेहद महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील इसलिए मानते हैं, क्योंकि यहां से चीनी सेनाएं काराकोरम दर्रे वाले इलाके पर अपनी आंख गड़ाए रख सकती हैं और सियाचिन क्षेत्र का खतरा बढ़ सकता है। क्या समझौते में सिर्फ  पैंगोंग झील के उत्तरी-दक्षिणी तटों से सेनाओं की वापसी ही तय हुई है? सवाल यह भी है कि भारत के सैनिकों ने ‘ब्लैक टॉप’ और ‘हैलमेट टॉप’ सरीखी पहाड़ी चोटियों पर कब्जा जमा कर चीनी सैनिकों को रक्षात्मक होने पर विवश किया था, क्या उन चोटियों पर हमारा कब्जा बरकरार रहेगा? हालांकि रक्षा मंत्री ने संसद में खुलासा किया है कि चोटियों पर भारतीय सैनिक तैनात हैं। दरअसल यह सवाल का सटीक जवाब नहीं है।

 रक्षा मंत्री ने यह भरोसा दिलाने की कोशिश जरूर की है कि पैंगोंग इलाके में अप्रैल, 2020 से पहले की स्थिति बहाल होगी। इस कालखंड में भारत-चीन सेनाओं ने जो भी निर्माण किए हैं, ढांचे खड़े किए हैं, उन्हें हटाना अथवा ध्वस्त करना होगा। यानी लद्दाख की एलएसी पर कुछ हद तक यथास्थिति बहाल होगी, लेकिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी का मानना है कि एलएसी पर न  तो यथास्थिति है और न ही शांति है। सैनिकों का अपमान किया जा रहा है। बहरहाल ऐसी टिप्पणियों को यहीं छोड़ देना चाहिए। गौरतलब यह है कि आखिर किन हालात ने चीन को समझौते के लिए बाध्य किया? चीन की अभी तक की रणनीति यह रही है कि वह हमले कर ज़मीन पर कब्जा करता है और फिर उसे अपना इलाका घोषित कर देता है, लेकिन इस बार भारतीय सैनिकों ने साबित कर दिया है कि वे 1962 के दौर में नहीं हैं। हमारे जांबाजों ने पहले डोकलाम में चीनी सैनिकों का मुकाबला कर उन्हें खदेड़ा। फिर गलवान और पैंगोंग में इतना लंबा मुकाबला किया, इसी दौरान सिक्किम के नाकू ला इलाके में भी चीनियों संग हाथापाई की नौबत आई। सभी स्तरों पर हमारे सैनिकों ने मुंहतोड़ जवाब दिया। लद्दाख के हालात और समीकरण इतने तनावग्रस्त रहे कि बार-बार युद्ध के आसार की व्याख्याएं की गईं। भारत के खंपा लड़ाकुओं ने यह भी साबित किया कि पहाड़ी चोटियों पर लड़ने में उनका कोई भी सानी नहीं है, जबकि चीनी सैनिक बीमार होते रहे, बेहोश होते रहे और दूर से ही मशीनों के जरिए मोर्चा संभाले रखा। अंततः चीन के नेतृत्व ने पीछे हटने का फैसला लेना तय किया। दोनों पक्षों के कमांडरों की 9वीं बैठक में, अंततः, समझौता हुआ। फिलहाल देखना यह है कि स्थितियां कितनी स्थायी रहती हैं?

3.इस्तीफे के मायने

तृणमूल कांग्रेस पर मंडराता संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। केंद्रीय स्तर पर तृणमूल का चेहरा माने जाने वाले दिनेश त्रिवेदी ने राज्यसभा में ही अपने इस्तीफे का एलान करके सबको न केवल चौंका दिया है, बल्कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल की मुश्किलों को बहुत बढ़ा भी दिया है। इस्तीफे का एलान करते हुए दिनेश त्रिवेदी ने जो उद्गार व्यक्त किए हैं, वह काबिले गौर हैं। उन्होंने साफ कहा है कि मुझसे अब देखा नहीं जा रहा, मुझे घुटन महसूस हो रही है। आज मैं देश के लिए, बंगाल के लिए अपना इस्तीफा दे रहा हूं। पश्चिम बंगाल में अब तक हमने मध्य पीढ़ी के नेताओं को ही तृणमूल छोड़कर जाते देखा है, लेकिन पार्टी का एक दिग्गज और अपेक्षाकृत ज्यादा शालीन नेता अगर कह रहा है कि उसे घुटन महसूस हो रही है, तो यह तृणमूल के लिए खतरे की घंटी है। अब यह विश्लेषण का विषय है कि दिनेश त्रिवेदी के इस्तीफे से पश्चिम बंगाल की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा? उनके भारतीय जनता पार्टी में आने से समीकरण कितने बदलेंगे? क्या यह भाजपा की एक बड़ी राजनीतिक कामयाबी है? भाजपा तो पहले ही बोल चुकी है कि चुनाव आने तक ममता बनर्जी अकेली पड़ जाएंगी, क्या वाकई बंगाल के समीकरण उसी दिशा में बढ़ रहे हैं? 
अनेक सवाल है, जो दिनेश त्रिवेदी के इस्तीफे से खड़े हुए हैं। बंगाल की राजनीति में हिंसा कोई ऐसी नई बात नहीं है, जिससे उन्हें अब अजीब लग रहा है? एकाधिक अवसरों पर उनका अपमान हुआ है, सुधारवादी रेल बजट पेश करने के बाद उनको रेल मंत्री पद से हटवाने का मामला हो या कार्टून विवाद पर तार्किक जवाब देने का मामला, नाराजगी अनेक बार सामने आ चुकी है। दिनेश त्रिवेदी के सामने पार्टी को पीठ दिखाने के अवसर पहले भी आए हैं, लेकिन अभी पार्टी छोड़ने के मायने सियासी चश्मे से ही ज्यादा देखे जाएंगे। यह भी ध्यान रखने की बात है कि पूर्व रेल मंत्री अनेक मौकों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते रहे हैं। कुछ साल पहले भी उनके भाजपा में शामिल होने की अटकलें तेज हुई थीं। ममता बनर्जी अब तक यही मानती आ रही हैं कि उनकी पार्टी के ‘दागदार’ नेताओं के लिए भाजपा वॉशिंग मशीन है। क्या वह दिनेश त्रिवेदी को भी दागदार मानेंगी? अब यह देखने वाली बात है कि तृणमूल अपने वरिष्ठ नेता पर कैसे हमलावर होगी। दिनेश त्रिवेदी के आरोप कहीं गहरे हैं कि पार्टी को ऐसे लोग चला रहे हैं, जो राजनीति का क ख ग नहीं जानते। उल्लेखनीय है कि करीब 40 नेता पार्टी नेतृत्व से नाराजगी जताते हुए भाजपा में शामिल हो चुके हैं और उन सभी के बारे में ममता बनर्जी के विचार बुरे हैं। पार्टी छोड़ने वालों को ‘सड़े सेब’ से ‘मीर जाफर’ तक कहा गया है। अगर ऐसा ही आरोप पूर्व रेल मंत्री पर भी लगेगा, तो पार्टी की छवि पर जरूर नकारात्मक असर पड़ेगा। वह तृणमूल के उन संस्थापक सदस्यों में रहे हैं, जिन्होंने 16 साल पहले तृणमूल कांग्रेस बनाई थी। तृणमूल के लिए यह आत्मसमीक्षा का समय है। आक्रामक ढंग से दुश्मनों या प्रतिद्वंद्वियों को जवाब दिया जा सकता है, लेकिन अपने संस्थापक सदस्यों के साथ भी ऐसा ही उग्र रवैया पार्टी की बुनियाद को कमजोर करेगा। यह अवसर है, जब तमाम राजनीतिक पार्टियों को पूरी गंभीरता से अपने यहां लोकतंत्र और अपनी मजबूती बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए।

4.सहमति की ओर

स्थायी समाधान की ओर बढ़ें दोनों देश

भारत-चीन के बीच जारी नौ महीने के गतिरोध के बाद लद्दाख स्थित पैंगोंग झील के उत्तरी-दक्षिणी तट पर दोनों देशों के सैनिकों को हटाने पर बनी सहमति स्वागतयोग्य ही कही जायेगी। राजनयिक और सैन्य स्तर पर कई दौर की बातचीत के बाद एलएसी पर तनाव का कम होना दोनों देशों के हित में ही है क्योंकि दोनों बड़े मुल्कों में टकराव विश्वव्यापी संकट को जन्म दे सकता था। विगत में विदेशमंत्री एस. जयशंकर और उनके चीनी समकक्ष वांग यी के बीच मास्को में हुई बैठक में तनाव कम करने के लिये पांच सूत्रीय कार्ययोजना पर बात हुई थी लेकिन लंबे समय से इसके सार्थक परिणाम नजर नहीं आये थे। अब इस मुद्दे पर सहमति के बावजूद भारत को सतर्कता में कोई चूक नहीं करनी चाहिए। दशकों से जारी सीमा निर्धारण को लेकर बातचीत चीन के अड़ियल रवैये के चलते किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पायी है। इसके बावजूद चीनी सैनिकों का पीछे हटना सेना के लिये राहतकारी है, जो गलवान घाटी के घटनाक्रम के बाद विषम मौसम में भी हाई अलर्ट पर है। भारत को चीनी मंसूबों की लगातार निगरानी करने की जरूरत है। साथ ही आपसी विश्वास बहाली के लिये निरंतर प्रयास करते रहने होंगे। अतीत में विश्वास तोड़ने की चीनी कोशिशों ने भारतीयों के मन में अविश्वास को जन्म दिया है। इतिहास ने हमें कई कड़वे सबक दिये हैं, खासकर 1962 के आक्रमण में जब शांति की बात करते हुए चीन ने भारतीय नेतृत्व से छल किया। जुलाई, 1962 में पं. नेहरू ने लद्दाख से चीनी सैनिकों की आंशिक वापसी का स्वागत किया था परंतु उसके तीन माह बाद ही चीन ने भारतीय क्षेत्र पर आक्रमण कर दिया था। हालांकि, भारत 1962 की स्थितियों से बहुत आगे निकल चुका है, लेकिन फिर भी सतर्क रहने की जरूरत है। चिंता की बात यह है कि चीनी नीतियों में पारदर्शिता का अभाव रहा है।

ऐसे में भारत को चीनी कदम के सभी पहलुओं का मूल्यांकन कर कदम बढ़ाने होंगे। राज्यसभा में रक्षा मंत्री के बयान के अनुसार समझौते के बाद चीनी सैनिक पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे पर फिंगर 8 के पास रहेंगे और भारतीय सैनिक फिंगर तीन के पास रहेंगे। इस बीच दोनों स्थानों के बीच गश्त पर अस्थाई रोक रहेगी। बहरहाल, लंबे गतिरोध के बाद कम से कम एक क्षेत्र से चीनी सैनिकों की वापसी शुरू हुई है। निस्संदेह इस कदम से दोनों देशों के संबंधों में जमी अविश्वास की बर्फ पिघलेगी। इस बात पर सहमति बनी बताई जा रही है कि तनाव के दौरान इस क्षेत्र में हुए निर्माण भी हटाये जायेंगे। इस समझौते के आलोक में इस बात की उम्मीद जगी है कि देप्सांग व गलवान घाटी में बाकी विवादास्पद मुद्दों को सुलझाने की शीघ्र पहल होगी। हालिया सहमति को आधार बनाकर आगे अन्य विवादों को सुलझाने की पहल होनी चाहिए। यह भरोसा तो जगा है कि चीन की तरफ से ईमानदार पहल हो तो तनाव घटाते हुए अन्य विवादों का भी पटाक्षेप हो सकता है। जाहिरा तौर पर सीमा पर आशंकाओं के बादल तो छटे ही हैं। दो सीमाओं पर सुरक्षा की चुनौती से निपटना सेना के लिये भी एक बड़ी चुनौती रही है। उम्मीद जरूर जगी है कि बातचीत के लिये अब अनुकूल वातावरण बनेगा। साथ ही वास्तविक नियंत्रण रेखा से जुड़े विवादों के निपटारे की दिशा में दोनों देश आगे बढ़ सकेंगे। निस्संदेह संवादहीनता संबंधों में कई तरह की जटिलताओं को जन्म देती है। बहुत संभव है कि पैंगोंग झील के तटों को लेकर हुआ समझौता आगे की बातचीत का आधार बने। ऐसे में इस सकारात्मक प्रगति का स्वागत ही किया जाना चाहिए। साथ ही लंबे समय तक तनाव और गलवान के जख्मों के बाद दोनों देशों ने जैसा संयम दिखाया, वह भविष्य की बातचीत की राह दिखाने वाला है। साथ ही ताजा घटनाक्रम यह विश्वास तो जगाता ही है कि बगैर बाहरी हस्तक्षेप के दोनों देश अपने विवादों को सुलझाने में सक्षम है। कोशिश हो कि विवाद के इस पटाक्षेप को कोई देश हार-जीत के रूप में न ले।

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