Career Pathway

+91-98052 91450

info@thecareerspath.com

Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.कश्मीर का विदेशीकरण

कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है। यह हम सार्वजनिक जीवन से संयुक्त राष्ट्र संघ के मंचों तक कहते और सुनते रहे हैं। अनुच्छेद 370 और 35-ए समाप्त करने के बाद जम्मू-कश्मीर में कोई बड़ी अराजकता, असंतोष और विद्रोह नहीं दिख रहे हैं। लद्दाख को अलग संघशासित क्षेत्र बना दिया गया है। अब उसका चौतरफा विकास भी स्वतंत्र और स्वायत्त होगा। जिला विकास परिषद और मंडल विकास परिषद के चुनाव करा ज़मीनी लोकतंत्र को स्थापित करने का कठिन प्रयास किया गया है। कश्मीर में पर्यटक लौट रहे हैं, यह बीती सर्दियों, बर्फबारी और मौजूदा मौसम में भी सैलानियों की चहल-पहल से सत्यापित होता है। आतंकवाद बीते तीन दशकों से कमोबेश कश्मीर घाटी को दहलाता रहा है। आतंकवाद आज भी है, लेकिन आतंकी हादसे और हमले करीब 64 फीसदी कम हुए हैं। करीब 29 फीसदी जांबाज जवान कम ‘शहीद’ हो रहे हैं। अलगाववाद हाशिए पर है, क्योंकि आम कश्मीरियों ने उसे खारिज कर दिया है।

अब पाकिस्तान के आह्वान पर कश्मीर घाटी के बाज़ार, डल झील के शिकारे और आम कारोबारी गतिविधियां बंद नहीं की जातीं। बेहद सुखद है कि करीब 31 सालों के बाद शीतलनाथ भैरव मंदिर के कपाट खुले हैं, आरती के सुर ध्वनित हो उठे हैं और घंटे की आवाज़ आस्था की नई चेतना जगा रही है। जम्मू-कश्मीर में सरकारी भर्तियां जारी हैं। नौजवानों में हौसला है और वे सेना तथा पुलिस का हिस्सा बनकर बचे-खुचे आतंकवाद का अस्तित्व मिटा देना चाहते हैं। बेशक जम्मू-कश्मीर में सब कुछ सामान्य नहीं है। लोकतंत्र में सामान्य हालात होना असंभव है, क्योंकि विरोध की आवाज़ें बुलंद रहती हैं। सरकार और प्रशासन के स्तर पर कुछ विसंगतियां भी हो सकती हैं। अनुच्छेद 370, राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा, एक विधान-एक निशान आदि को लेकर कुछ विपक्षी जुबानें ज़हर उगलती रही हैं। ऐसे नेता फर्जी आश्वासन बांटते रहे हैं कि अंततः कश्मीर का 370 और 35-ए वाला दर्जा बहाल करना पड़ेगा। यह परिवर्तन संसद ने पारित किया है और वह ही उसे बहाल कर सकती है, जो फिलहाल असंभव-सा है। बहरहाल जम्मू-कश्मीर का जीडीपी अभी पटरी पर नहीं लौटा है, लेकिन आर्थिक नुकसान करीब 16 फीसदी घट गए हैं। सबसे अहम यह है कि मोदी सरकार भी कश्मीरी पंडितों और हिंदुओं का पुनर्वास नहीं कर सकी है। वे अब भी जम्मू में स्थापित शिविरों में रहने को विवश हैं या राजधानी दिल्ली समेत कुछ अन्य बड़े शहरों में बसे हैं। यह सरकारी दावा है कि सरकार हिंदू परिवारों को आर्थिक मदद दे रही है। कश्मीरी पंडित और हिंदू इस्लामी जेहाद और सरकारी लीपापोती, वादाखिलाफी के बीच पिस रहे हैं। बहरहाल बड़ा सवाल यह है कि जो कश्मीर बदल रहा है, नए भारत का जो नया कश्मीर उभर रहा है, क्या भारत सरकार उस पर विदेशी राजनयिकों के सर्टिफिकेट लेना चाहती है?

भारत सरकार ने 24 राजनयिकों को जम्मू-कश्मीर भेजा है। यह ऐसा तीसरा दौरा है। इस बार फ्रांस, स्वीडन, आयरलैंड, ब्राजील, क्यूबा, इटली, स्पेन, बेल्जियम, नीदरलैंड्स, पुर्तगाल, सेनेगल, घाना, मलेशिया, ताजिकिस्तान आदि देशों के राजनयिक कश्मीर आए थे। उन्होंने स्थानीय स्तर पर कई लोगों से संवाद किया। सरकार और प्रशासन के चेहरों से भी मिले। सेना, सुरक्षा बलों और पुलिस के जरिए सुरक्षा-व्यवस्था की थाह ली और आतंकवाद के खतरों को भी जानना चाहा। आम नागरिकों से कितनी मुलाकातें ऐसे प्रवास के दौरान होती हैं, हम अपने लंबे अनुभव से जानते हैं। सरकारी पक्ष कुछ भी दावे करता रहे। सवाल यह है कि क्या यह विदेश नीति और कूटनीति का हिस्सा था? भारत पर उसके विरोधी मानवाधिकार हनन के जो आरोप लगाते रहे हैं और संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर भी ऐसे आयोग की टिप्पणियां हम झेलते रहे हैं, क्या ये राजनयिक भारत के प्रवक्ता बनकर दुनिया भर में हमारी असलियत का खुलासा और पैरोकारी करेंगे? क्या इनसान के मूल अधिकारों का प्रमाण-पत्र इन देशों से ही भारत को मिलेगा? क्या इन देशों में मानवाधिकार बिल्कुल सुरक्षित हैं? कश्मीर हमारा है और रहेगा। जैसे भी हालात हैं, हम सभी मिल-जुल कर उन्हें बेहतर बनाएंगे। कश्मीर का विदेशीकरण किया जाए अथवा विदेशी राजनयिकों के जरिए अपनी बात कहनी पड़े, यह हमें भारत के पक्ष में नहीं लगता।

2.पंजाब से आती हवाएं

पंजाब की सियासी खेती में कांग्रेस की फसल कितनी पकी और कितनी बाकी है, इसका हिसाब पूरे देश में चर्चा का विषय जरूर बनेगा। यह कोरोना काल के राजनीतिक लेन-देन  का एक ऐसा परिदृश्य है, जो कल की सूरत में सियासत की सीरत बदल सकता है। पंजाब का शहरी पक्ष भाजपा का विपक्ष क्यों बना, इसे महज कांग्रेस की जीत में समेट कर भी नहीं देखा जा सकता। किसान आंदोलन के आहत पन्नों पर भाजपा की चीख निकल गई, यह भी किसी जनमत संग्रह की तरह सही नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन कहीं पंजाब के शहरी वजूद में परंपरागत वोट हासिल करने में पार्टी पिछड़ी जरूर है। अभी पांच बड़े शहरों के चुनाव होने बाकी हैं, फिर भी अब तक के परिणाम का हासिल उत्साह कांग्रेस के साथ खड़ा है। पंजाब की हर खबर हिमाचल के लिए भी सियासी सरहद की तरह पैगाम देती है, लिहाजा आगामी नगर निगम चुनावों की फेहरिस्त में इम्तिहान बढ़ जाता है।

 प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के लिए यह परिणाम कितने साहस भरे होते हैं या अब तक आए स्थानीय निकाय चुनाव परिणामों की गंगा में पार्टी कितनी धुल चुकी है, यह अगले दौर का अमृत हो सकता है या राजनीतिक जहर उतारने का अवसर देगा। कहना न होगा कि पंजाब में शून्यता के नगर में पहुंची भाजपा, हिमाचल में अपनी सफलता का झंडा गाड़ते हुए धर्मशाला मंथन की हरियाली पर खड़ी है। मिशन रिपीट में ‘ग्राम सभा से पहुंचेंगे विधानसभा’ के नारे में दम भरने के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का कद्दावर चेहरा, भाजपा के अभियान को गति देने के लिए अपने चमत्कार की कसौटी पर रहेगा। देश किसान आंदोलन के जरिए जनांदोलन की मिट्टी बटोर रहा है और इस तरह मुद्दों की नई जमीन पर आक्रोश की लहरें तो मध्यम वर्ग की सूखती जेब से निकल रही हैं। डीजल-पेट्रोल के उछलते दाम और रसोईर् गैस की भयानक मुद्रा ने मध्यम वर्ग को उद्वेलित किया है। सवाल यह कि क्या हिमाचल का मध्यम वर्ग अब वोटर बनकर सोच रहा है या जयराम सरकार को रियायत देकर एक और साल गुजारना चाहता है। यह भी एक सर्वविदित मुहावरे जैसा है कि हिमाचल में चौथे साल में सरकार के सामने परिदृश्य सहेजने, संभालने और सजाने की अंतिम परीक्षा शुरू होती है। सरकार के पास पूर्ण राज्यत्व के पचासवें साल के शगुन, जश्न और इबारतें हैं और इनके साथ चुनाव की बुनियाद डाली जा सकती है। कमोबेश हर सरकार अपने चौथे साल में कर्मचारी, दिहाड़ी और विकास की फेरी लगाती रही है और यह असंभव तरकीब नहीं है, फिर भी न तो कर्मचारी संगठन ऐसा कोई स्पष्ट दबाव बना रहे हैं या विकास में धंसा क्षेत्रवाद सिर उठा रहा है। यह दीगर है कि पुरानी पेंशन बहाली के नाम पर एक कर्मचारी वर्ग को साधने के लिए डा. राजन सुशांत अपनी नई पार्टी की बिसात बिछा चुके हैं या सरकार की खामियों-नाकामयाबियों को पकड़ कर कांग्रेस अपने कुनबे को खड़ा कर रही है।

स्थानीय निकाय चुनावों की पहली किस्त में सत्तारूढ़ दल काफी हद तक सफल रहा, लेकिन पड़ोसी पंजाब की कहानी एकतरफा ऐलान की जद में भाजपा को दर्द का एहसास दे गई। जाहिर है पंजाब को फिर बटोरने की कोशिश में हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सुर भी जोड़ने पड़ेंगे। जट-जाट के वर्तमान में उलझ रही भाजपा की सियासत, हिमाचल के मध्यम वर्ग को क्या संदेश देती है, यह पड़ताल ही मिशन रिपीट की हकीकत का दर्पण होगी। कोविड काल के बावजूद सरकारों के प्रदर्शन को बांच रही जन अभिलाषा हिमाचल में आकर भिन्न हो जाती है। यहां सुशासन को मापने-जांचने के मानदंड जय श्रीराम का नारा बुलंद नहीं करते और न ही सियासत अपनी जमीन के ताप पर चलती है। यहां नारा बदले या न बदले, संगम और स्रोत बदलते हैं। इस बार नगर निगम चुनाव एक नए सियासी स्रोत की तरह बहेंगे और इसी के परिप्रेक्ष्य में राजनीतिक संगम का बनना तय है। मिशन रिपीट की अवधारणा में यह पहला ऐसा अवसर है जो शहरी धमनियों में प्रदेश की राजनीतिक रेखाएं खींच सकता है या अपनी रेखाओं पर किसी पार्टी का वजूद मिटा सकता है। ग्राम सभा से विधानसभा तक की सियासी लहरें कितनी कारगर होंगी, यह अगले साल पता चलेगा, फिलहाल नगर निगम चुनावों में पार्टी चिन्ह की प्रतीक्षा में मध्यम वर्ग और बुद्धिजीवी समाज अपने भविष्य के धरातल पर कैसे खड़ा होता है, इस पर काफी कुछ निर्भर करेगा।

3.रेल न रुके

देशव्यापी रेल रोको आंदोलन का शांतिपूर्वक समापन किसी राहत से कम नहीं है। 26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड के दौरान दिल्ली में जिस तरह से उपद्रव हुआ था, उसके बाद रेल रोको आह्वान पर भी चिंता जताई जा रही थी। देश के करीब आधे राज्यों में रेलों को रोकने की खबरें सामने आई हैं, चूंकि अब किसानों को तमाम विपक्षी दलों का समर्थन मिलने लगा है, अत: कुछ जगहों पर राजनीतिक झंडे के तले भी रेल परिचालन को बाधित किया गया। दोपहर 12 बजे से शाम चार बजे के बीच रेल रोकने की कोशिश विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा में ज्यादा हुई है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक में भी आंशिक असर देखा गया है। रेलवे का यही मानना है कि देश भर में ट्रेनों के चलने पर नगण्य या न्यूनतम प्रभाव पड़ा है और चार बजे के बाद रेल सेवाएं सामान्य हो गईं। रेलवे ने पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल पर ध्यान केंद्रित करते हुए देश भर में सुरक्षा बलों की 20 अतिरिक्त कंपनियों की तैनाती की थी। किसानों ने भी संयम का परिचय दिया है और यकीनन उनके आंदोलन की आवाज सरकार तक फिर पहुंची है। 
आज देश जिस स्थिति में है, कोई भी किसी तरह की हिंसा नहीं चाहेगा। किसानों का यह आंदोलन शायद लंबा चले, लेकिन उन्हें किसी भी स्तर पर हिंसा का सहारा लेने से बचना चाहिए। सभी पंचायतों-मंचों से हिंसा के खिलाफ अपील होनी चाहिए। यह सरकार के लिए भी अच्छी बात है कि किसान आंदोलन अपनी हदों में रहे, लेकिन सरकार को आंदोलन के वास्तविक समाधान के बारे में जरूर सोचना चाहिए। यह तो अच्छी बात है कि अभी 50 से 60 प्रतिशत के करीब रेलों की ही पटरियों पर वापसी हुई है। ट्रेन संचालन अगर सामान्य दिनों जैसा होता, तो बहुत मुश्किल हो जाती। रेल संचालन में चार घंटे भी बहुत मायने रखते हैं। किसी को नौकरी पर पहुंचना होता है, तो किसी को बूढ़े मां-बाप तक, तो कोई जीवन संवारने की यात्रा पर होता है। सामान्य दिनों में रेलें रुक जाएं, तो भारत में जनजीवन ही बाधित हो जाए। रेलवे भारत में जीवन रेखा की तरह है। लाखों लोगों का रोजगार इससे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। ऐसे में, किसी संगठन या किसी राजनीतिक दल के मन में अगर रेल रोकने की योजना आती है, तो यह देश को प्रभावित करने की साजिश से कम नहीं। किसी को आरक्षण चाहिए, किसी को नौकरी, तो किसी को किसी कानून का विरोध करना है, रेल रोकना विरोध जताने का आसान तरीका है, क्योंकि इससे पूरे देश पर असर पड़ता है। लेकिन अब हम ऐसे दौर में हैं, जब हमें रेल या बस रोकने से बचना चाहिए। तेज आर्थिक विकास के लिए हमें आंदोलन के सभ्य तरीकों से काम लेना होगा। जिस देश में करोड़ों युवा बेरोजगार हों, वहां यातायात या परिवहन का कोई भी साधन बाधित नहीं होना चाहिए। रेल रोकना केवल रेलवे के लिए ही नहीं, देश के लिए नुकसानदेह है। हमें भूलना नहीं चाहिए, लॉकडाउन की वजह से पिछले वर्ष रेलवे के राजस्व में 36,993 करोड़ रुपये की गिरावट आई है। रेल सेवा सामान्य हो, तभी भरपाई संभव है। क्या किसी आंदोलन की मांग पूरी होने से इस गिरावट की भरपाई हो जाएगी? जाहिर है, अंतिम दुष्प्रभाव तो आम लोगों को ही भुगतना होगा। वाकई यह समय व्यापकता में देशहित में सोचने का है।

4.कांग्रेस की बल्ले-बल्ले

किसान आंदोलन की तपिश से झुलसी भाजपा

किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि में यह दीवार पर लिखी इबारत थी कि भाजपा को पंजाब के स्थानीय निकाय चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ सकता है। कांग्रेस की जीत तय थी लेकिन विपक्ष को नकार कर इतनी बड़ी जीत मिलेगी, इसका अंदाजा कम ही था। बहरहाल, आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के ‘लिटमस टैस्ट’ में कांग्रेस ने मनोवैज्ञानिक बढ़त तो हासिल कर ही ली है। वैसे इन निकाय चुनावों के चुनाव अभियान के दौरान भाजपा नेताओं और प्रत्याशियों को जिस तरह विरोध का सामना करना पड़ रहा था, उससे साफ था कि राज्य के निकाय चुनाव में भाजपा के सितारे गर्दिश में रहेंगे। वैसा हुआ भी, जिससे राज्य के विधानसभा चुनाव में भाजपा की वापसी की संभावनाओं पर भी सवाल उठते हैं। दरअसल, पहले पंजाब और फिर दिल्ली की सीमा पर लंबे समय से जारी किसान आंदोलन को पंजाब के लोगों ने राज्य की अस्मिता से जोड़कर देखा और उसी के अनुरूप जनादेश भी दिया। वहीं भाजपा के साथ ही  आप को भी लोगों ने नकार दिया। शिरोमणि अकाली दल दूसरे नंबर पर जरूर आया लेकिन उसकी उपलब्धि ज्यादा उम्मीद जगाने वाली नहीं है। कांग्रेस ने किसानों से अर्जित सद्भावना के बूते जीत की शानदार इबारत लिख डाली। पंजाब निकाय चुनावों में कांग्रेस ने आठ नगर निगमों और 109 नगरपलिका परिषद व 100 नगर पंचायतों में परचम लहराया। गत चौदह फरवरी को हुए स्थानीय निकाय चुनावों में मतदाताओं ने बड़े उत्साह से भाग लिया और करीब 71 फीसदी मतदाताओं ने अपने पसंद के उम्मीदवारों को वोट दिया। बहरहाल, इन चुनाव परिणामों ने राज्य के मतदाताओं के मूड का अहसास करा दिया है। भाजपा को जहां किसान आंदोलन को लेकर केंद्र सरकार के अड़ियल रवैये का खमियाजा भुगतना पड़ा, वहीं शिरोमणि अकाली दल से हुए अलगाव का भी नुकसान हुआ। वहीं किसानों की नाराजगी झेल रही भाजपा से अलग होने का भी कोई विशेष लाभ अकाली दल को नहीं हो सका जो उसके लिये सबक भी है कि आगामी विधानसभा चुनाव के लिये राज्य में उसे कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी।

निस्संदेह, राज्य के भावी राजनीतिक परिदृश्य की बानगी दिखाने वाले इन चुनावों ने पिछड़ने वाले राजनीतिक दलों के लिये आत्ममंथन का मौका दिया है। यह भी कि जनांदोलनों की अनदेखी राजनीतिक दलों को भी भारी पड़ सकती है। कमोबेश किसान आंदोलन से उपजे परिदृश्य में पंजाब ही नहीं, हरियाणा की राजनीति भी अछूती नहीं रही है, जिसकी झांकी दिसंबर के अंत में तीन नगर निगमों के महापौर की सीटों में से दो व तीन नगरपालिका परिषद अध्यक्ष पद खोकर भाजपा-जजपा गठबंधन ने देखी थी। वैसे आमतौर पर इन चुनावों में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल को फायदा होता है। निश्चित रूप से भाजपा-जजपा गठबंधन ने इन राजनीतिक रुझानों को महसूस किया होगा। बहरहाल, पंजाब में तो भाजपा के लिये आने वाला वक्त बहुत मुश्किलों भरा होने वाला है। निकाय चुनाव के दौरान पार्टी नेताओं को जहां लोगों की तल्खी का सामना करना पड़ा है वहीं दूसरी ओर शिरोमणि अकाली दल तथा आम आदमी पार्टी को ये मंथन करना होगा कि वे पंजाब की प्रगति की योजनाओं से कैसे जुड़कर जनता का विश्वास हासिल कर सकते हैं। जनता से जुड़ने के लिये उन्हें अब अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत होगी। यह सुखद ही है कि पंजाब में पहली बार निकाय चुनावों में महिलाओं के लिये पचास फीसदी सीटें आरक्षित की गई थीं। ऐसे में जहां वार्डों में विकास कार्यों के लिये नये व अनुभवी पुरुष प्रतिनिधियों से उन्हें सामंजस्य बनाना है, वहीं उन्हें इस बदलाव को साबित भी करना है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वे अपने विवेक से विकास के लिये रचनात्मक पहल करेंगी। साथ ही उस धारणा को खारिज करेंगी, जिसमें कहा जाता है कि परिवार के पुरुष सदस्य कार्यप्रणाली के निर्धारण में फैसले लेते हैं।  बहरहाल, स्थानीय निकायों के इन चुनाव परिणामों ने जहां कांग्रेस पार्टी में उत्साह भर दिया है, वहीं कैप्टन अमरेंद्र सिंह के नेतृत्व को भी मजबूती प्रदान की है जो आगामी विधानसभा चुनाव के लिये पार्टी के लिये सुखद संकेत ही है। 

 

 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.कश्मीर का विदेशीकरण

कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है। यह हम सार्वजनिक जीवन से संयुक्त राष्ट्र संघ के मंचों तक कहते और सुनते रहे हैं। अनुच्छेद 370 और 35-ए समाप्त करने के बाद जम्मू-कश्मीर में कोई बड़ी अराजकता, असंतोष और विद्रोह नहीं दिख रहे हैं। लद्दाख को अलग संघशासित क्षेत्र बना दिया गया है। अब उसका चौतरफा विकास भी स्वतंत्र और स्वायत्त होगा। जिला विकास परिषद और मंडल विकास परिषद के चुनाव करा ज़मीनी लोकतंत्र को स्थापित करने का कठिन प्रयास किया गया है। कश्मीर में पर्यटक लौट रहे हैं, यह बीती सर्दियों, बर्फबारी और मौजूदा मौसम में भी सैलानियों की चहल-पहल से सत्यापित होता है। आतंकवाद बीते तीन दशकों से कमोबेश कश्मीर घाटी को दहलाता रहा है। आतंकवाद आज भी है, लेकिन आतंकी हादसे और हमले करीब 64 फीसदी कम हुए हैं। करीब 29 फीसदी जांबाज जवान कम ‘शहीद’ हो रहे हैं। अलगाववाद हाशिए पर है, क्योंकि आम कश्मीरियों ने उसे खारिज कर दिया है।

अब पाकिस्तान के आह्वान पर कश्मीर घाटी के बाज़ार, डल झील के शिकारे और आम कारोबारी गतिविधियां बंद नहीं की जातीं। बेहद सुखद है कि करीब 31 सालों के बाद शीतलनाथ भैरव मंदिर के कपाट खुले हैं, आरती के सुर ध्वनित हो उठे हैं और घंटे की आवाज़ आस्था की नई चेतना जगा रही है। जम्मू-कश्मीर में सरकारी भर्तियां जारी हैं। नौजवानों में हौसला है और वे सेना तथा पुलिस का हिस्सा बनकर बचे-खुचे आतंकवाद का अस्तित्व मिटा देना चाहते हैं। बेशक जम्मू-कश्मीर में सब कुछ सामान्य नहीं है। लोकतंत्र में सामान्य हालात होना असंभव है, क्योंकि विरोध की आवाज़ें बुलंद रहती हैं। सरकार और प्रशासन के स्तर पर कुछ विसंगतियां भी हो सकती हैं। अनुच्छेद 370, राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा, एक विधान-एक निशान आदि को लेकर कुछ विपक्षी जुबानें ज़हर उगलती रही हैं। ऐसे नेता फर्जी आश्वासन बांटते रहे हैं कि अंततः कश्मीर का 370 और 35-ए वाला दर्जा बहाल करना पड़ेगा। यह परिवर्तन संसद ने पारित किया है और वह ही उसे बहाल कर सकती है, जो फिलहाल असंभव-सा है। बहरहाल जम्मू-कश्मीर का जीडीपी अभी पटरी पर नहीं लौटा है, लेकिन आर्थिक नुकसान करीब 16 फीसदी घट गए हैं। सबसे अहम यह है कि मोदी सरकार भी कश्मीरी पंडितों और हिंदुओं का पुनर्वास नहीं कर सकी है। वे अब भी जम्मू में स्थापित शिविरों में रहने को विवश हैं या राजधानी दिल्ली समेत कुछ अन्य बड़े शहरों में बसे हैं। यह सरकारी दावा है कि सरकार हिंदू परिवारों को आर्थिक मदद दे रही है। कश्मीरी पंडित और हिंदू इस्लामी जेहाद और सरकारी लीपापोती, वादाखिलाफी के बीच पिस रहे हैं। बहरहाल बड़ा सवाल यह है कि जो कश्मीर बदल रहा है, नए भारत का जो नया कश्मीर उभर रहा है, क्या भारत सरकार उस पर विदेशी राजनयिकों के सर्टिफिकेट लेना चाहती है?

भारत सरकार ने 24 राजनयिकों को जम्मू-कश्मीर भेजा है। यह ऐसा तीसरा दौरा है। इस बार फ्रांस, स्वीडन, आयरलैंड, ब्राजील, क्यूबा, इटली, स्पेन, बेल्जियम, नीदरलैंड्स, पुर्तगाल, सेनेगल, घाना, मलेशिया, ताजिकिस्तान आदि देशों के राजनयिक कश्मीर आए थे। उन्होंने स्थानीय स्तर पर कई लोगों से संवाद किया। सरकार और प्रशासन के चेहरों से भी मिले। सेना, सुरक्षा बलों और पुलिस के जरिए सुरक्षा-व्यवस्था की थाह ली और आतंकवाद के खतरों को भी जानना चाहा। आम नागरिकों से कितनी मुलाकातें ऐसे प्रवास के दौरान होती हैं, हम अपने लंबे अनुभव से जानते हैं। सरकारी पक्ष कुछ भी दावे करता रहे। सवाल यह है कि क्या यह विदेश नीति और कूटनीति का हिस्सा था? भारत पर उसके विरोधी मानवाधिकार हनन के जो आरोप लगाते रहे हैं और संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर भी ऐसे आयोग की टिप्पणियां हम झेलते रहे हैं, क्या ये राजनयिक भारत के प्रवक्ता बनकर दुनिया भर में हमारी असलियत का खुलासा और पैरोकारी करेंगे? क्या इनसान के मूल अधिकारों का प्रमाण-पत्र इन देशों से ही भारत को मिलेगा? क्या इन देशों में मानवाधिकार बिल्कुल सुरक्षित हैं? कश्मीर हमारा है और रहेगा। जैसे भी हालात हैं, हम सभी मिल-जुल कर उन्हें बेहतर बनाएंगे। कश्मीर का विदेशीकरण किया जाए अथवा विदेशी राजनयिकों के जरिए अपनी बात कहनी पड़े, यह हमें भारत के पक्ष में नहीं लगता।

2.पंजाब से आती हवाएं

पंजाब की सियासी खेती में कांग्रेस की फसल कितनी पकी और कितनी बाकी है, इसका हिसाब पूरे देश में चर्चा का विषय जरूर बनेगा। यह कोरोना काल के राजनीतिक लेन-देन  का एक ऐसा परिदृश्य है, जो कल की सूरत में सियासत की सीरत बदल सकता है। पंजाब का शहरी पक्ष भाजपा का विपक्ष क्यों बना, इसे महज कांग्रेस की जीत में समेट कर भी नहीं देखा जा सकता। किसान आंदोलन के आहत पन्नों पर भाजपा की चीख निकल गई, यह भी किसी जनमत संग्रह की तरह सही नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन कहीं पंजाब के शहरी वजूद में परंपरागत वोट हासिल करने में पार्टी पिछड़ी जरूर है। अभी पांच बड़े शहरों के चुनाव होने बाकी हैं, फिर भी अब तक के परिणाम का हासिल उत्साह कांग्रेस के साथ खड़ा है। पंजाब की हर खबर हिमाचल के लिए भी सियासी सरहद की तरह पैगाम देती है, लिहाजा आगामी नगर निगम चुनावों की फेहरिस्त में इम्तिहान बढ़ जाता है।

 प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के लिए यह परिणाम कितने साहस भरे होते हैं या अब तक आए स्थानीय निकाय चुनाव परिणामों की गंगा में पार्टी कितनी धुल चुकी है, यह अगले दौर का अमृत हो सकता है या राजनीतिक जहर उतारने का अवसर देगा। कहना न होगा कि पंजाब में शून्यता के नगर में पहुंची भाजपा, हिमाचल में अपनी सफलता का झंडा गाड़ते हुए धर्मशाला मंथन की हरियाली पर खड़ी है। मिशन रिपीट में ‘ग्राम सभा से पहुंचेंगे विधानसभा’ के नारे में दम भरने के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का कद्दावर चेहरा, भाजपा के अभियान को गति देने के लिए अपने चमत्कार की कसौटी पर रहेगा। देश किसान आंदोलन के जरिए जनांदोलन की मिट्टी बटोर रहा है और इस तरह मुद्दों की नई जमीन पर आक्रोश की लहरें तो मध्यम वर्ग की सूखती जेब से निकल रही हैं। डीजल-पेट्रोल के उछलते दाम और रसोईर् गैस की भयानक मुद्रा ने मध्यम वर्ग को उद्वेलित किया है। सवाल यह कि क्या हिमाचल का मध्यम वर्ग अब वोटर बनकर सोच रहा है या जयराम सरकार को रियायत देकर एक और साल गुजारना चाहता है। यह भी एक सर्वविदित मुहावरे जैसा है कि हिमाचल में चौथे साल में सरकार के सामने परिदृश्य सहेजने, संभालने और सजाने की अंतिम परीक्षा शुरू होती है। सरकार के पास पूर्ण राज्यत्व के पचासवें साल के शगुन, जश्न और इबारतें हैं और इनके साथ चुनाव की बुनियाद डाली जा सकती है। कमोबेश हर सरकार अपने चौथे साल में कर्मचारी, दिहाड़ी और विकास की फेरी लगाती रही है और यह असंभव तरकीब नहीं है, फिर भी न तो कर्मचारी संगठन ऐसा कोई स्पष्ट दबाव बना रहे हैं या विकास में धंसा क्षेत्रवाद सिर उठा रहा है। यह दीगर है कि पुरानी पेंशन बहाली के नाम पर एक कर्मचारी वर्ग को साधने के लिए डा. राजन सुशांत अपनी नई पार्टी की बिसात बिछा चुके हैं या सरकार की खामियों-नाकामयाबियों को पकड़ कर कांग्रेस अपने कुनबे को खड़ा कर रही है।

स्थानीय निकाय चुनावों की पहली किस्त में सत्तारूढ़ दल काफी हद तक सफल रहा, लेकिन पड़ोसी पंजाब की कहानी एकतरफा ऐलान की जद में भाजपा को दर्द का एहसास दे गई। जाहिर है पंजाब को फिर बटोरने की कोशिश में हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सुर भी जोड़ने पड़ेंगे। जट-जाट के वर्तमान में उलझ रही भाजपा की सियासत, हिमाचल के मध्यम वर्ग को क्या संदेश देती है, यह पड़ताल ही मिशन रिपीट की हकीकत का दर्पण होगी। कोविड काल के बावजूद सरकारों के प्रदर्शन को बांच रही जन अभिलाषा हिमाचल में आकर भिन्न हो जाती है। यहां सुशासन को मापने-जांचने के मानदंड जय श्रीराम का नारा बुलंद नहीं करते और न ही सियासत अपनी जमीन के ताप पर चलती है। यहां नारा बदले या न बदले, संगम और स्रोत बदलते हैं। इस बार नगर निगम चुनाव एक नए सियासी स्रोत की तरह बहेंगे और इसी के परिप्रेक्ष्य में राजनीतिक संगम का बनना तय है। मिशन रिपीट की अवधारणा में यह पहला ऐसा अवसर है जो शहरी धमनियों में प्रदेश की राजनीतिक रेखाएं खींच सकता है या अपनी रेखाओं पर किसी पार्टी का वजूद मिटा सकता है। ग्राम सभा से विधानसभा तक की सियासी लहरें कितनी कारगर होंगी, यह अगले साल पता चलेगा, फिलहाल नगर निगम चुनावों में पार्टी चिन्ह की प्रतीक्षा में मध्यम वर्ग और बुद्धिजीवी समाज अपने भविष्य के धरातल पर कैसे खड़ा होता है, इस पर काफी कुछ निर्भर करेगा।

3.रेल न रुके

देशव्यापी रेल रोको आंदोलन का शांतिपूर्वक समापन किसी राहत से कम नहीं है। 26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड के दौरान दिल्ली में जिस तरह से उपद्रव हुआ था, उसके बाद रेल रोको आह्वान पर भी चिंता जताई जा रही थी। देश के करीब आधे राज्यों में रेलों को रोकने की खबरें सामने आई हैं, चूंकि अब किसानों को तमाम विपक्षी दलों का समर्थन मिलने लगा है, अत: कुछ जगहों पर राजनीतिक झंडे के तले भी रेल परिचालन को बाधित किया गया। दोपहर 12 बजे से शाम चार बजे के बीच रेल रोकने की कोशिश विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा में ज्यादा हुई है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक में भी आंशिक असर देखा गया है। रेलवे का यही मानना है कि देश भर में ट्रेनों के चलने पर नगण्य या न्यूनतम प्रभाव पड़ा है और चार बजे के बाद रेल सेवाएं सामान्य हो गईं। रेलवे ने पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल पर ध्यान केंद्रित करते हुए देश भर में सुरक्षा बलों की 20 अतिरिक्त कंपनियों की तैनाती की थी। किसानों ने भी संयम का परिचय दिया है और यकीनन उनके आंदोलन की आवाज सरकार तक फिर पहुंची है। 
आज देश जिस स्थिति में है, कोई भी किसी तरह की हिंसा नहीं चाहेगा। किसानों का यह आंदोलन शायद लंबा चले, लेकिन उन्हें किसी भी स्तर पर हिंसा का सहारा लेने से बचना चाहिए। सभी पंचायतों-मंचों से हिंसा के खिलाफ अपील होनी चाहिए। यह सरकार के लिए भी अच्छी बात है कि किसान आंदोलन अपनी हदों में रहे, लेकिन सरकार को आंदोलन के वास्तविक समाधान के बारे में जरूर सोचना चाहिए। यह तो अच्छी बात है कि अभी 50 से 60 प्रतिशत के करीब रेलों की ही पटरियों पर वापसी हुई है। ट्रेन संचालन अगर सामान्य दिनों जैसा होता, तो बहुत मुश्किल हो जाती। रेल संचालन में चार घंटे भी बहुत मायने रखते हैं। किसी को नौकरी पर पहुंचना होता है, तो किसी को बूढ़े मां-बाप तक, तो कोई जीवन संवारने की यात्रा पर होता है। सामान्य दिनों में रेलें रुक जाएं, तो भारत में जनजीवन ही बाधित हो जाए। रेलवे भारत में जीवन रेखा की तरह है। लाखों लोगों का रोजगार इससे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। ऐसे में, किसी संगठन या किसी राजनीतिक दल के मन में अगर रेल रोकने की योजना आती है, तो यह देश को प्रभावित करने की साजिश से कम नहीं। किसी को आरक्षण चाहिए, किसी को नौकरी, तो किसी को किसी कानून का विरोध करना है, रेल रोकना विरोध जताने का आसान तरीका है, क्योंकि इससे पूरे देश पर असर पड़ता है। लेकिन अब हम ऐसे दौर में हैं, जब हमें रेल या बस रोकने से बचना चाहिए। तेज आर्थिक विकास के लिए हमें आंदोलन के सभ्य तरीकों से काम लेना होगा। जिस देश में करोड़ों युवा बेरोजगार हों, वहां यातायात या परिवहन का कोई भी साधन बाधित नहीं होना चाहिए। रेल रोकना केवल रेलवे के लिए ही नहीं, देश के लिए नुकसानदेह है। हमें भूलना नहीं चाहिए, लॉकडाउन की वजह से पिछले वर्ष रेलवे के राजस्व में 36,993 करोड़ रुपये की गिरावट आई है। रेल सेवा सामान्य हो, तभी भरपाई संभव है। क्या किसी आंदोलन की मांग पूरी होने से इस गिरावट की भरपाई हो जाएगी? जाहिर है, अंतिम दुष्प्रभाव तो आम लोगों को ही भुगतना होगा। वाकई यह समय व्यापकता में देशहित में सोचने का है।

4.कांग्रेस की बल्ले-बल्ले

किसान आंदोलन की तपिश से झुलसी भाजपा

किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि में यह दीवार पर लिखी इबारत थी कि भाजपा को पंजाब के स्थानीय निकाय चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ सकता है। कांग्रेस की जीत तय थी लेकिन विपक्ष को नकार कर इतनी बड़ी जीत मिलेगी, इसका अंदाजा कम ही था। बहरहाल, आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के ‘लिटमस टैस्ट’ में कांग्रेस ने मनोवैज्ञानिक बढ़त तो हासिल कर ही ली है। वैसे इन निकाय चुनावों के चुनाव अभियान के दौरान भाजपा नेताओं और प्रत्याशियों को जिस तरह विरोध का सामना करना पड़ रहा था, उससे साफ था कि राज्य के निकाय चुनाव में भाजपा के सितारे गर्दिश में रहेंगे। वैसा हुआ भी, जिससे राज्य के विधानसभा चुनाव में भाजपा की वापसी की संभावनाओं पर भी सवाल उठते हैं। दरअसल, पहले पंजाब और फिर दिल्ली की सीमा पर लंबे समय से जारी किसान आंदोलन को पंजाब के लोगों ने राज्य की अस्मिता से जोड़कर देखा और उसी के अनुरूप जनादेश भी दिया। वहीं भाजपा के साथ ही  आप को भी लोगों ने नकार दिया। शिरोमणि अकाली दल दूसरे नंबर पर जरूर आया लेकिन उसकी उपलब्धि ज्यादा उम्मीद जगाने वाली नहीं है। कांग्रेस ने किसानों से अर्जित सद्भावना के बूते जीत की शानदार इबारत लिख डाली। पंजाब निकाय चुनावों में कांग्रेस ने आठ नगर निगमों और 109 नगरपलिका परिषद व 100 नगर पंचायतों में परचम लहराया। गत चौदह फरवरी को हुए स्थानीय निकाय चुनावों में मतदाताओं ने बड़े उत्साह से भाग लिया और करीब 71 फीसदी मतदाताओं ने अपने पसंद के उम्मीदवारों को वोट दिया। बहरहाल, इन चुनाव परिणामों ने राज्य के मतदाताओं के मूड का अहसास करा दिया है। भाजपा को जहां किसान आंदोलन को लेकर केंद्र सरकार के अड़ियल रवैये का खमियाजा भुगतना पड़ा, वहीं शिरोमणि अकाली दल से हुए अलगाव का भी नुकसान हुआ। वहीं किसानों की नाराजगी झेल रही भाजपा से अलग होने का भी कोई विशेष लाभ अकाली दल को नहीं हो सका जो उसके लिये सबक भी है कि आगामी विधानसभा चुनाव के लिये राज्य में उसे कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी।

निस्संदेह, राज्य के भावी राजनीतिक परिदृश्य की बानगी दिखाने वाले इन चुनावों ने पिछड़ने वाले राजनीतिक दलों के लिये आत्ममंथन का मौका दिया है। यह भी कि जनांदोलनों की अनदेखी राजनीतिक दलों को भी भारी पड़ सकती है। कमोबेश किसान आंदोलन से उपजे परिदृश्य में पंजाब ही नहीं, हरियाणा की राजनीति भी अछूती नहीं रही है, जिसकी झांकी दिसंबर के अंत में तीन नगर निगमों के महापौर की सीटों में से दो व तीन नगरपालिका परिषद अध्यक्ष पद खोकर भाजपा-जजपा गठबंधन ने देखी थी। वैसे आमतौर पर इन चुनावों में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल को फायदा होता है। निश्चित रूप से भाजपा-जजपा गठबंधन ने इन राजनीतिक रुझानों को महसूस किया होगा। बहरहाल, पंजाब में तो भाजपा के लिये आने वाला वक्त बहुत मुश्किलों भरा होने वाला है। निकाय चुनाव के दौरान पार्टी नेताओं को जहां लोगों की तल्खी का सामना करना पड़ा है वहीं दूसरी ओर शिरोमणि अकाली दल तथा आम आदमी पार्टी को ये मंथन करना होगा कि वे पंजाब की प्रगति की योजनाओं से कैसे जुड़कर जनता का विश्वास हासिल कर सकते हैं। जनता से जुड़ने के लिये उन्हें अब अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत होगी। यह सुखद ही है कि पंजाब में पहली बार निकाय चुनावों में महिलाओं के लिये पचास फीसदी सीटें आरक्षित की गई थीं। ऐसे में जहां वार्डों में विकास कार्यों के लिये नये व अनुभवी पुरुष प्रतिनिधियों से उन्हें सामंजस्य बनाना है, वहीं उन्हें इस बदलाव को साबित भी करना है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वे अपने विवेक से विकास के लिये रचनात्मक पहल करेंगी। साथ ही उस धारणा को खारिज करेंगी, जिसमें कहा जाता है कि परिवार के पुरुष सदस्य कार्यप्रणाली के निर्धारण में फैसले लेते हैं।  बहरहाल, स्थानीय निकायों के इन चुनाव परिणामों ने जहां कांग्रेस पार्टी में उत्साह भर दिया है, वहीं कैप्टन अमरेंद्र सिंह के नेतृत्व को भी मजबूती प्रदान की है जो आगामी विधानसभा चुनाव के लिये पार्टी के लिये सुखद संकेत ही है। 

 

 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top