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Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.अब भी है कोरोना का कहर!

कोरोना वायरस का संक्रमण बीते 5-6 दिनों से लगातार बढ़ रहा है। ऐसा नहीं है कि यह कोरोना की नई नस्लों के कारण हो रहा है, लेकिन संक्रमण का राष्ट्रीय औसत बढ़ा है। रोज़ाना संक्रमित मामलों का जो औसत 11,430 था, वह बढ़कर 11,825 हो गया है। करीब 139 करोड़ की आबादी के देश में मरीजों की यह बढ़ती संख्या डरावनी नहीं मानी जा सकती, लेकिन संक्रमण का रुझान खंडित हुआ है। भारत के 15-18 राज्यों में कोरोना संक्रमण का फैलाव नगण्य हो गया था। अलबत्ता केरल, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और तेलंगाना आदि राज्यों में संक्रमित मरीजों के आंकड़े औसतन बढ़ ही रहे थे। महाराष्ट्र में गुरुवार को 5427 संक्रमित मामले सामने आए। बीते 78 दिनों में यह रुझान पहली बार देखा गया है। बीते सात दिनों में महाराष्ट्र में करीब 47 फीसदी मामले बढ़े हैं, जबकि केरल में 13 फीसदी कम हुए हैं। पंजाब और मध्यप्रदेश में क्रमशः 20 फीसदी और 25 फीसदी संक्रमित मरीज बढ़े हैं। यही कारण है कि महाराष्ट्र सरकार को यवतमाल जिले में 10 दिन और अमरावती में शनिवार रात्रि 8 बजे से सोमवार सुबह 7 बजे तक के लॉकडाउन लगाने पड़े हैं।

 कुछ और जिलों में लॉकडाउन जैसी पाबंदियों पर विचार किया जा रहा है। सवाल है कि क्या कोरोना दोबारा पलट कर फैलने लगा है? अथवा सार्वजनिक स्तर पर  लापरवाही और ढिलाई का नतीजा है? ध्यान रहे कि नवंबर-दिसंबर में चिकित्सकों और वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि कोरोना वायरस का कहर अभी शेष है। चूंकि दूसरे देशों में कोरोना और उसकी नई नस्लों ने संक्रमण को बढ़ाया है, लिहाजा भारत भी प्रभावित हो सकता है, बेशक वायरस की नई नस्लें हमारे देश में प्रभावहीन हों! चूंकि भारत में कोरोना के संक्रमित आंकड़े तेजी से घट रहे थे, हमने रोज़ाना 98,000 से अधिक संक्रमित मरीजों का दौर भी देखा था और अब सिमट कर आंकड़े 13,000 के करीब तक आ गए हैं, कई बार तो मरीजों की संख्या 10,000 से कम भी दर्ज की गई है, लिहाजा आम धारणा बनने लगी कि कोरोना वायरस का अंत तय हो चुका है। लोगों ने कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन के जो यंत्रणामय मंजर देखे थे, वे उससे निजात पाकर और मुक्त महसूस कर एक सामान्य जिंदगी जीना चाहते थे, लेकिन अब कोरोना का सच साक्षात् सामने है। लोगों ने चेहरे पर मास्क पहनना कम कर दिया था या सरकारों ने भी दंडित करने का सिलसिला रोक दिया था। बाज़ार खुल गए।

 यातायात सामान्य होने लगा। हज़ारों की संख्या वाली राजनीतिक और अन्य जनसभाएं जुटने लगीं। अब तो सिनेमा हॉल भी 100 फीसदी क्षमता के साथ खोलने की अनुमति दे दी गई है। दो गज की दूरी बेमानी हो गई। देश का विभिन्न स्तरों पर अनलॉक होना जरूरी भी था, क्योंकि अर्थव्यवस्था की विकास दर ऋणात्मक 24 फीसदी तक डूब चुकी थी। अब भी यह दर ऋणात्मक ही है। हमें आर्थिक और औद्योगिक उत्पादन के तौर पर उबरने और सकारात्मक अर्थव्यवस्था होने में अब भी लंबा वक्त लगेगा। नतीजा सामने है, लेकिन व्यापक और दहशतनुमा नहीं है। डॉक्टर अब भी चेता रहे हैं कि कोरोना वायरस का संक्रमण पलट कर प्रहार कर सकता है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली भी चपेट में आ सकती है। हालांकि संक्रमण के मामले 100-130 रोज़ाना तक सिमट गए हैं, फिर भी सब कुछ अनिश्चित है। अब तो टीकाकरण कराने वालों की संख्या एक करोड़ को छूने लगी है। फिलहाल हमारे पास दो कंपनियों के ही टीके हैं, जिनकी संख्या आने वाले 3-4 माह के दौरान काफी बढ़ जाएगी। अब तो इलाज भी उपलब्ध है। कभी इलाज कराने वाले मरीजों की संख्या 10 लाख से भी ज्यादा होती थी। अब तो सिर्फ  1.5 लाख मरीजों से भी कम की संख्या है। यह संक्रमण का 1.25 फीसदी है। कोरोना से मरने वालों की दर भी मात्र 1.42 फीसदी है, जबकि स्वस्थ होकर घर लौटने वालों का राष्ट्रीय औसत 97.32 फीसदी है। हालात खराब नहीं हैं और संक्रमण का निरंकुश विस्तार भी नहीं हो रहा है। फिर भी कोरोना को लेकर रेड अलर्ट वाला एहसास रहना चाहिए।

 

2.चुनावी रगों में भाजपाई जोश

मोटे तौर पर भाजपा के मंथन में आश्रय और प्रश्रय का मिलाजुला प्रभाव रहा। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के आश्रय में पलता मिशन रिपीट और प्रश्रय में जयराम सरकार के तीन साल किस करवट बैठेंगे, लेकिन राजनीतिक उम्मीदों का यह जलसा अंततः सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नारे पर ही खत्म हुआ। अभी हिमाचल के कान सुन नहीं रहे या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुहाने पर मतदाता तपे नहीं हैं, क्योंकि यह प्रदेश मध्यम वर्ग के मूल्यों में जीता है। देश पश्चिम बंगाल के एजेंडे पर काम करते हुए भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का असर देख सकता है या बिहार चुनावों के निष्कर्ष में पार्टी के प्रभाव को स्वीकार कर सकता है, लेकिन हिमाचल का सियासी शंखनाद अपनी ही अस्मिता की तहों का घर्षण है। यानी पिछला इतिहास बताता है कि मिशन रिपीट के पैंतरों में लिपटी सारी रणनीति की आंखों में धूल झोंकते समीकरण किसी न किसी कारण से पैदा हुए। यह दीगर है कि ग्रामसभा से विधानसभा की रगों में चुनावी जोश भरने का पहला पड़ाव धर्मशाला में देखा गया।

 पंचायती राज चुनावों में अपनी सफलता का डंका बजा रही भाजपा जिस फार्मूले पर काम कर रही है, उसके भीतर की संगठनात्मक ताकत का इजहार पार्टी के मंथन को उम्मीदों से भर देता है। सरकार और संगठन के बीच भाजपा पहली बार खुद में निर्विरोध होने का साहसी परचम उठा रही है, तो आगामी राजनीतिक फलक पर यह साल करवटों भरा रहेगा। देखना यह होगा कि पार्टी के राष्ट्राध्यक्ष नड्डा किस तरह देश में फैले सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पाठ हिमाचल को पढ़ाते हैं या सत्ता के वर्तमान से भविष्य का रथ कैसे आगे बढ़ता है। यह दीगर है कि प्रदेश के पूर्ण राज्यत्व की पचासवीं वर्षगांठ के संदर्भ में जो रथ यात्रा निकलेगी, उसके ऊपर सत्तारूढ़ दल की चमक और धमक सवार रहेगी। बेशक भाजपा मंथन से आगामी विधानसभा चुनाव का परिदृश्य बनना शुरू हो गया है और इसके पहले पड़ाव में चार नगर निगमों के चुनाव माहौल को उत्साहित करेंगे। बावजूद इसके कि पार्टी ने अपने मंथन में संगठन के संदेश को सुदृढ़ किया और सत्ता दोहराने का कदमताल समय पूर्व ही शुरू हो गया, प्रदेश के मुद्दों को नया एहसास चाहिए। जिस रोशनी में पूर्ण राज्यत्व की सीढि़यां चढ़कर हिमाचल पर्वतीय राज्य की अग्रणी श्रेणी में दर्ज है, उसके फलक पर राज्य के अधिकार आज भी छिन्न-भिन्न हैं। पर्वतीय अस्मिता से निकले राज्य के अधिकारों में केंद्रीय नीतियां कितना सहयोग कर रही हैं या विकास के मानदंडों में भागीदारी की उदारता हासिल हो रही है, इसका विवेचन होगा।

हिमाचल भाजपा की राह में कई रेल तथा रोड प्रोजेक्ट आज भी रोड़े बनकर अटके हुए हैं। पार्टी अपनी विचारधारा से ऊपर पश्चिम बंगाल के आदर्शों में प्रदेश चुनाव नहीं लड़ सकती और न ही हरियाणा की तर्ज पर मिशन रिपीट में कोई तीसरा फं्रट यहां मदद कर पाएगा। यह भी सही है कि हिमाचल की जनता को कार्यकर्ता अपनी मुट्ठी में नहीं भर सकते, बशर्ते माहौल की संवेदना में बुद्धिजीवी या मध्यम वर्ग के सामने राजनीति ही आस्था का प्रश्न बन जाए। प्रदेश में मिशन रिपीट के लिए सरकार को अपने चौथे वर्ष के उपहार और प्रदर्शन के ऐतबार पर मार्ग प्रशस्त करना होगा। क्या भाजपा नगर निगमों की राह से अपनी सफलता का चक्रव्यूह बना पाएगी या सरकार चौथे वर्ष में शहरी मानसिकता के सामने अगले चुनाव का मानचित्र बना पाएगी, यह देखना होगा। फिलहाल विधानसभा चुनाव से पहले ग्रामसभा की जीत को सुशासन के अहम बिंदुओं पर सवार करना होगा ताकि निचले स्तर से उच्च शिखर की सीढि़यां स्थिर की जा सकें।

3.बीजिंग की स्वीकारोक्ति

पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग झील क्षेत्र से सैनिकों के पीछे हटने का काम पूरा हो गया है और अगले कुछ घंटों के भीतर ही शेष मुद्दों पर भारतीय और चीनी सैन्य-कमांडरों की वार्ता होने वाली है। यकीनन, यह सुकूनदेह बात है कि महीनों के गतिरोध और अनावश्यक तनाव के बाद सुलह की कोई सूरत बनती दिख रही है। दरअसल, दिसंबर-जनवरी की जानलेवा सर्दी में भारतीय जांबाजों की दिलेरी और बहुत आर्थिक भार सहते हुए भी नई दिल्ली की दृढ़ता देखकर चीनी नेतृत्व को एहसास हो गया होगा कि भारत अब अपने हितों को लेकर कोई नरमी नहीं बरतने वाला, इसलिए खुद को और ज्यादा भुलावे में रखने से बेहतर है कि हालात सुधारने की ओर बढ़ा जाए। फिर जैसी कि रिपोर्टें हैं, बड़ी संख्या में तैनात चीनी सैनिकों के लिए भयानक सर्दी में पहाड़ों पर लंबे समय तक बने रहना भी मुश्किल हो रहा था। बीजिंग के व्यावहारिक रुख अपनाने के पीछे यह भी एक बड़ी वजह होगी। चीन को लेकर कोई भी धारणा बनाना या उसकी बातों पर यकीन करना क्यों मुश्किल है, इसकी तस्दीक इस बात से भी की जा सकती है कि पिछले  साल जून में गलवान घाटी की झड़प में उसके भी सैनिक शहीद हुए थे, इस बात को कुबूलने में उसे आठ महीने लग गए। कल उसने पहली बार आधिकारिक तौर पर माना कि उस संघर्ष में उसके भी चार अफसर-सैनिक शहीद हुए थे। पीएलए डेली  के हवाले से ग्लोबल टाइम्स  ने इस खबर की पुष्टि की है। जो मुल्क इतना हृदयहीन हो कि अपने शहीदों को सम्मान देने में उसे इतना वक्त लग जाए, उसके इस आंकडे़ की विश्वसनीयता भी संदिग्ध ही मानी जाएगी। तब तो और, जब एक रूसी न्यूज एजेंसी ने चंद रोज पहले ही यह खुलासा किया है कि उस संघर्ष में चीन के 45 जवान शहीद हुए थे। चीन का प्रशासनिक ढांचा अमानवीयता की हद तक गोपनीयता बरतता है। बीते दशकों की बात छोड़ दीजिए, हाल-फिलहाल के ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं, जब सच बोलने वाले नागरिकों को वहां बर्बर दंड भोगना पड़ा। इसमें कोई दोराय नहीं कि सरहद पर शांति किसी भी देश की तरक्की के लिए बहुत जरूरी होती है। भारत के साथ टकराव बढ़ाकर इस उप-महाद्वीप की आर्थिक प्रगति को बाधित करने की किसी भी कोशिश का खामियाजा बीजिंग को खुद भुगतना पड़ेगा। इसलिए यह तो तय है कि एक सीमा के बाद वह तनाव को आगे नहीं ले जा सकता। उसकी यह रणनीति न तो भारतीय नीति-निर्धारकों से छिपी है और न अब दुनिया ही इससे गाफिल है। फिर भी, उसके दुस्साहस के आगे आक्रामक रुख अपनाने की जो रणनीति हमने इस बार अपनाई है, उसे ठोस रूप देने की जरूरत है। विदेश मंत्री संकेत कर चुके हैं, बीजिंग के साथ संबंधों की बेहतरी सीमा की गतिविधियों से हमेशा जुड़ी रहेगी। निस्संदेह, यह विवाद दोनों देशों के रिश्तों में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है। बीजिंग को समझना ही होगा कि सीमा-विवाद को अंतिम रूप से सुलझाने का वक्त अब आ गया है। दो कदम आगे बढ़, एक कदम पीछे हटने की उसकी कोई चाल भारत को स्वीकार्य नहीं है। जिस तरह, गलवान की एक सच्चाई को आठ महीने बाद ही सही, दुनिया के सामने कुबूल करने को वह बाध्य हुआ है, उम्मीद है कि बाकी भारतीय दावों की हकीकत को भी वह तस्लीम करेगा।  

4.लोकतंत्र की घाटी

विदेशी राजनयिकों की यात्रा से संबल

जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे की समाप्ति और इसे दो केंद्रशासित प्रदेश बनाये जाने पर पाकिस्तान तथा उसके सरपरस्तों ने जो हाय-तौबा मचायी थी, वह निरर्थक ही साबित हुई है। झूठ के किले ढहने लगे हैं। पाक को आकाश-पाताल एक करने पर जब कुछ हासिल नहीं हुआ तो वह गुलाम कश्मीर को अपना भविष्य तय करने की आजादी की दलील देकर अपनी खिसियाहट निकाल रहा है। बहरहाल, अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद को सींचने वाले अनुच्छेद 370 को हटाये जाने के बाद जो भ्रम फैलाये गये, उसकी हकीकत 24 देशों से आये राजनयिकों ने खुद अपनी आंखों से देखी है। हालांकि, उनकी यात्रा के आखिरी दिन शुक्रवार को आतंकवादियों के हमलों ने चिंता भी बढ़ायी है लेकिन यह भी पाक हुक्मरानों के इशारों पर यह जताने की कोशिश है कि कश्मीर घाटी अशांत है। बहरहाल, जम्मू-कश्मीर में जिंदगी पटरी पर लौटने लगी है और राष्ट्रीय कानून व कल्याण योजनाओं के क्रियान्वयन से घाटी के लोग देश की मुख्यधारा की ओर उन्मुख हैं। हाल के दिनों में बर्फबारी के दौरान टूरिस्टों का जमावड़ा और घाटी में कई फिल्मों की शूटिंग होने से पता चलता है कि धीरे-धीरे घाटी में जनजीवन सामान्य हो रहा है। पाक में बैठे आकाओं के इशारे पर घाटी में अलगाव के बीज बोने वाले राजनेताओं की अब चल नहीं पा रही है। स्थानीय निकाय चुनावों में जनता ने जिस उत्साह से चुनाव प्रक्रिया में भाग लिया, उसने घाटी में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जीवंत होने का ही प्रमाण दिया है। सुखद यह है कि राज्य के मुख्य राजनीतिक दलों ने परोक्ष रूप से गठबंधन बनाकर इन चुनावों में भागीदारी की।  यानी राजनीतिक दलों ने राज्य में हुए बदलाव पर मोहर लगा दी है। निस्संदेह यह केंद्र सरकार की सुनियोजित कार्रवाई की सफलता ही कही जायेगी जो देश के कन्याकुमारी से कश्मीर तक एक होने की अवधारणा को पुष्ट भी करता है।

बहरहाल, यह अच्छी पहल रही कि विदेशी राजनयिकों को कश्मीर का दौरा कराया गया। बजाय वे भ्रामक स्रोतों से सूचनाएं हासिल करें, उन्होंने स्वयं कश्मीर की स्थिति को करीब से देखा। इस प्रतिनिधिमंडल में यूरोप, अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिकी देशों के राजनयिक शामिल थे। हालांकि, इससे पहले यूरोपीय यूनियन का प्रतिनिधिमंडल भी घाटी का दौरा कर चुका है। प्रतिनिधिमंडल ने राज्य के विभिन्न राजनीतिक-सामाजिक समूहों से संवाद किया। नवनिर्वाचित जिला विकास परिषद सदस्यों से भी मुलाकात की। इस दल का मकसद यही देखना था कि क्या डेढ़ साल बाद राज्य में लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं सुचारु रूप से स्थापित हुई हैं और राज्य अमन की ओर लौटा है? राज्य में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होने की बात प्रतिनिधिमंडल से मिलने वाले स्थानीय लोगों ने कही। इसके बावजूद केंद्र सरकार को कुछ अतिरिक्त कदम कश्मीरियों का विश्वास हासिल करने के लिये उठाने होंगे, जिससे घाटी में दीर्घकालीन शांति का मार्ग प्रशस्त हो सके। जरूरी है कि उस सोच का खात्मा हो जो अलगाववाद व आतंकवाद फैलाने में मददगार होती है। राज्य में रोजगार सृजन के विशेष प्रयास करने होंगे ताकि चंद रुपयों के लालच में युवा पत्थर फेंकने व आतंक फैलाने वालों के मददगार न बनें। निस्संदेह नागरिक स्वतंत्रता को प्राथमिकता देनी होगी। हालिया स्थानीय निकाय चुनाव और फोर-जी मोबाइल सेवा की बहाली इसी दिशा में सार्थक कदम है। साथ ही न तो आतंकवाद से लड़ाई में चूक हो, न ही लोगों में सुरक्षा बलों के प्रति अविश्वास पनपे,  जिससे घाटी के लोगों का देश से जुड़ाव होगा। तभी हमारी बहुलतावादी संस्कृति का परचम दुनिया में लहरायेगा। लोकतंत्र की मजबूती के लिये इसे राज्य का दर्जा देना जरूरी है। हाल ही में गृहमंत्री ने कहा भी है कि उचित समय पर जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा दिया जायेगा। हालांकि, शुक्रवार को श्रीनगर में अंधाधुंध फायरिंग में पुलिस के दो जवानों की मौत चिंता बढ़ाने वाली है। बुधवार को भी आतंकियों ने एक रेस्तरां मालिक के बेटे की हत्या कर दी थी। शोपियां में लश्कर-ए-तैयबा के तीन आतंकियों का मारा जाना सुरक्षा बलों की चौकसी को दर्शाता है।

 

 

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Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.अब भी है कोरोना का कहर!

कोरोना वायरस का संक्रमण बीते 5-6 दिनों से लगातार बढ़ रहा है। ऐसा नहीं है कि यह कोरोना की नई नस्लों के कारण हो रहा है, लेकिन संक्रमण का राष्ट्रीय औसत बढ़ा है। रोज़ाना संक्रमित मामलों का जो औसत 11,430 था, वह बढ़कर 11,825 हो गया है। करीब 139 करोड़ की आबादी के देश में मरीजों की यह बढ़ती संख्या डरावनी नहीं मानी जा सकती, लेकिन संक्रमण का रुझान खंडित हुआ है। भारत के 15-18 राज्यों में कोरोना संक्रमण का फैलाव नगण्य हो गया था। अलबत्ता केरल, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और तेलंगाना आदि राज्यों में संक्रमित मरीजों के आंकड़े औसतन बढ़ ही रहे थे। महाराष्ट्र में गुरुवार को 5427 संक्रमित मामले सामने आए। बीते 78 दिनों में यह रुझान पहली बार देखा गया है। बीते सात दिनों में महाराष्ट्र में करीब 47 फीसदी मामले बढ़े हैं, जबकि केरल में 13 फीसदी कम हुए हैं। पंजाब और मध्यप्रदेश में क्रमशः 20 फीसदी और 25 फीसदी संक्रमित मरीज बढ़े हैं। यही कारण है कि महाराष्ट्र सरकार को यवतमाल जिले में 10 दिन और अमरावती में शनिवार रात्रि 8 बजे से सोमवार सुबह 7 बजे तक के लॉकडाउन लगाने पड़े हैं।

 कुछ और जिलों में लॉकडाउन जैसी पाबंदियों पर विचार किया जा रहा है। सवाल है कि क्या कोरोना दोबारा पलट कर फैलने लगा है? अथवा सार्वजनिक स्तर पर  लापरवाही और ढिलाई का नतीजा है? ध्यान रहे कि नवंबर-दिसंबर में चिकित्सकों और वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि कोरोना वायरस का कहर अभी शेष है। चूंकि दूसरे देशों में कोरोना और उसकी नई नस्लों ने संक्रमण को बढ़ाया है, लिहाजा भारत भी प्रभावित हो सकता है, बेशक वायरस की नई नस्लें हमारे देश में प्रभावहीन हों! चूंकि भारत में कोरोना के संक्रमित आंकड़े तेजी से घट रहे थे, हमने रोज़ाना 98,000 से अधिक संक्रमित मरीजों का दौर भी देखा था और अब सिमट कर आंकड़े 13,000 के करीब तक आ गए हैं, कई बार तो मरीजों की संख्या 10,000 से कम भी दर्ज की गई है, लिहाजा आम धारणा बनने लगी कि कोरोना वायरस का अंत तय हो चुका है। लोगों ने कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन के जो यंत्रणामय मंजर देखे थे, वे उससे निजात पाकर और मुक्त महसूस कर एक सामान्य जिंदगी जीना चाहते थे, लेकिन अब कोरोना का सच साक्षात् सामने है। लोगों ने चेहरे पर मास्क पहनना कम कर दिया था या सरकारों ने भी दंडित करने का सिलसिला रोक दिया था। बाज़ार खुल गए।

 यातायात सामान्य होने लगा। हज़ारों की संख्या वाली राजनीतिक और अन्य जनसभाएं जुटने लगीं। अब तो सिनेमा हॉल भी 100 फीसदी क्षमता के साथ खोलने की अनुमति दे दी गई है। दो गज की दूरी बेमानी हो गई। देश का विभिन्न स्तरों पर अनलॉक होना जरूरी भी था, क्योंकि अर्थव्यवस्था की विकास दर ऋणात्मक 24 फीसदी तक डूब चुकी थी। अब भी यह दर ऋणात्मक ही है। हमें आर्थिक और औद्योगिक उत्पादन के तौर पर उबरने और सकारात्मक अर्थव्यवस्था होने में अब भी लंबा वक्त लगेगा। नतीजा सामने है, लेकिन व्यापक और दहशतनुमा नहीं है। डॉक्टर अब भी चेता रहे हैं कि कोरोना वायरस का संक्रमण पलट कर प्रहार कर सकता है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली भी चपेट में आ सकती है। हालांकि संक्रमण के मामले 100-130 रोज़ाना तक सिमट गए हैं, फिर भी सब कुछ अनिश्चित है। अब तो टीकाकरण कराने वालों की संख्या एक करोड़ को छूने लगी है। फिलहाल हमारे पास दो कंपनियों के ही टीके हैं, जिनकी संख्या आने वाले 3-4 माह के दौरान काफी बढ़ जाएगी। अब तो इलाज भी उपलब्ध है। कभी इलाज कराने वाले मरीजों की संख्या 10 लाख से भी ज्यादा होती थी। अब तो सिर्फ  1.5 लाख मरीजों से भी कम की संख्या है। यह संक्रमण का 1.25 फीसदी है। कोरोना से मरने वालों की दर भी मात्र 1.42 फीसदी है, जबकि स्वस्थ होकर घर लौटने वालों का राष्ट्रीय औसत 97.32 फीसदी है। हालात खराब नहीं हैं और संक्रमण का निरंकुश विस्तार भी नहीं हो रहा है। फिर भी कोरोना को लेकर रेड अलर्ट वाला एहसास रहना चाहिए।

 

2.चुनावी रगों में भाजपाई जोश

मोटे तौर पर भाजपा के मंथन में आश्रय और प्रश्रय का मिलाजुला प्रभाव रहा। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के आश्रय में पलता मिशन रिपीट और प्रश्रय में जयराम सरकार के तीन साल किस करवट बैठेंगे, लेकिन राजनीतिक उम्मीदों का यह जलसा अंततः सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नारे पर ही खत्म हुआ। अभी हिमाचल के कान सुन नहीं रहे या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुहाने पर मतदाता तपे नहीं हैं, क्योंकि यह प्रदेश मध्यम वर्ग के मूल्यों में जीता है। देश पश्चिम बंगाल के एजेंडे पर काम करते हुए भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का असर देख सकता है या बिहार चुनावों के निष्कर्ष में पार्टी के प्रभाव को स्वीकार कर सकता है, लेकिन हिमाचल का सियासी शंखनाद अपनी ही अस्मिता की तहों का घर्षण है। यानी पिछला इतिहास बताता है कि मिशन रिपीट के पैंतरों में लिपटी सारी रणनीति की आंखों में धूल झोंकते समीकरण किसी न किसी कारण से पैदा हुए। यह दीगर है कि ग्रामसभा से विधानसभा की रगों में चुनावी जोश भरने का पहला पड़ाव धर्मशाला में देखा गया।

 पंचायती राज चुनावों में अपनी सफलता का डंका बजा रही भाजपा जिस फार्मूले पर काम कर रही है, उसके भीतर की संगठनात्मक ताकत का इजहार पार्टी के मंथन को उम्मीदों से भर देता है। सरकार और संगठन के बीच भाजपा पहली बार खुद में निर्विरोध होने का साहसी परचम उठा रही है, तो आगामी राजनीतिक फलक पर यह साल करवटों भरा रहेगा। देखना यह होगा कि पार्टी के राष्ट्राध्यक्ष नड्डा किस तरह देश में फैले सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पाठ हिमाचल को पढ़ाते हैं या सत्ता के वर्तमान से भविष्य का रथ कैसे आगे बढ़ता है। यह दीगर है कि प्रदेश के पूर्ण राज्यत्व की पचासवीं वर्षगांठ के संदर्भ में जो रथ यात्रा निकलेगी, उसके ऊपर सत्तारूढ़ दल की चमक और धमक सवार रहेगी। बेशक भाजपा मंथन से आगामी विधानसभा चुनाव का परिदृश्य बनना शुरू हो गया है और इसके पहले पड़ाव में चार नगर निगमों के चुनाव माहौल को उत्साहित करेंगे। बावजूद इसके कि पार्टी ने अपने मंथन में संगठन के संदेश को सुदृढ़ किया और सत्ता दोहराने का कदमताल समय पूर्व ही शुरू हो गया, प्रदेश के मुद्दों को नया एहसास चाहिए। जिस रोशनी में पूर्ण राज्यत्व की सीढि़यां चढ़कर हिमाचल पर्वतीय राज्य की अग्रणी श्रेणी में दर्ज है, उसके फलक पर राज्य के अधिकार आज भी छिन्न-भिन्न हैं। पर्वतीय अस्मिता से निकले राज्य के अधिकारों में केंद्रीय नीतियां कितना सहयोग कर रही हैं या विकास के मानदंडों में भागीदारी की उदारता हासिल हो रही है, इसका विवेचन होगा।

हिमाचल भाजपा की राह में कई रेल तथा रोड प्रोजेक्ट आज भी रोड़े बनकर अटके हुए हैं। पार्टी अपनी विचारधारा से ऊपर पश्चिम बंगाल के आदर्शों में प्रदेश चुनाव नहीं लड़ सकती और न ही हरियाणा की तर्ज पर मिशन रिपीट में कोई तीसरा फं्रट यहां मदद कर पाएगा। यह भी सही है कि हिमाचल की जनता को कार्यकर्ता अपनी मुट्ठी में नहीं भर सकते, बशर्ते माहौल की संवेदना में बुद्धिजीवी या मध्यम वर्ग के सामने राजनीति ही आस्था का प्रश्न बन जाए। प्रदेश में मिशन रिपीट के लिए सरकार को अपने चौथे वर्ष के उपहार और प्रदर्शन के ऐतबार पर मार्ग प्रशस्त करना होगा। क्या भाजपा नगर निगमों की राह से अपनी सफलता का चक्रव्यूह बना पाएगी या सरकार चौथे वर्ष में शहरी मानसिकता के सामने अगले चुनाव का मानचित्र बना पाएगी, यह देखना होगा। फिलहाल विधानसभा चुनाव से पहले ग्रामसभा की जीत को सुशासन के अहम बिंदुओं पर सवार करना होगा ताकि निचले स्तर से उच्च शिखर की सीढि़यां स्थिर की जा सकें।

3.बीजिंग की स्वीकारोक्ति

पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग झील क्षेत्र से सैनिकों के पीछे हटने का काम पूरा हो गया है और अगले कुछ घंटों के भीतर ही शेष मुद्दों पर भारतीय और चीनी सैन्य-कमांडरों की वार्ता होने वाली है। यकीनन, यह सुकूनदेह बात है कि महीनों के गतिरोध और अनावश्यक तनाव के बाद सुलह की कोई सूरत बनती दिख रही है। दरअसल, दिसंबर-जनवरी की जानलेवा सर्दी में भारतीय जांबाजों की दिलेरी और बहुत आर्थिक भार सहते हुए भी नई दिल्ली की दृढ़ता देखकर चीनी नेतृत्व को एहसास हो गया होगा कि भारत अब अपने हितों को लेकर कोई नरमी नहीं बरतने वाला, इसलिए खुद को और ज्यादा भुलावे में रखने से बेहतर है कि हालात सुधारने की ओर बढ़ा जाए। फिर जैसी कि रिपोर्टें हैं, बड़ी संख्या में तैनात चीनी सैनिकों के लिए भयानक सर्दी में पहाड़ों पर लंबे समय तक बने रहना भी मुश्किल हो रहा था। बीजिंग के व्यावहारिक रुख अपनाने के पीछे यह भी एक बड़ी वजह होगी। चीन को लेकर कोई भी धारणा बनाना या उसकी बातों पर यकीन करना क्यों मुश्किल है, इसकी तस्दीक इस बात से भी की जा सकती है कि पिछले  साल जून में गलवान घाटी की झड़प में उसके भी सैनिक शहीद हुए थे, इस बात को कुबूलने में उसे आठ महीने लग गए। कल उसने पहली बार आधिकारिक तौर पर माना कि उस संघर्ष में उसके भी चार अफसर-सैनिक शहीद हुए थे। पीएलए डेली  के हवाले से ग्लोबल टाइम्स  ने इस खबर की पुष्टि की है। जो मुल्क इतना हृदयहीन हो कि अपने शहीदों को सम्मान देने में उसे इतना वक्त लग जाए, उसके इस आंकडे़ की विश्वसनीयता भी संदिग्ध ही मानी जाएगी। तब तो और, जब एक रूसी न्यूज एजेंसी ने चंद रोज पहले ही यह खुलासा किया है कि उस संघर्ष में चीन के 45 जवान शहीद हुए थे। चीन का प्रशासनिक ढांचा अमानवीयता की हद तक गोपनीयता बरतता है। बीते दशकों की बात छोड़ दीजिए, हाल-फिलहाल के ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं, जब सच बोलने वाले नागरिकों को वहां बर्बर दंड भोगना पड़ा। इसमें कोई दोराय नहीं कि सरहद पर शांति किसी भी देश की तरक्की के लिए बहुत जरूरी होती है। भारत के साथ टकराव बढ़ाकर इस उप-महाद्वीप की आर्थिक प्रगति को बाधित करने की किसी भी कोशिश का खामियाजा बीजिंग को खुद भुगतना पड़ेगा। इसलिए यह तो तय है कि एक सीमा के बाद वह तनाव को आगे नहीं ले जा सकता। उसकी यह रणनीति न तो भारतीय नीति-निर्धारकों से छिपी है और न अब दुनिया ही इससे गाफिल है। फिर भी, उसके दुस्साहस के आगे आक्रामक रुख अपनाने की जो रणनीति हमने इस बार अपनाई है, उसे ठोस रूप देने की जरूरत है। विदेश मंत्री संकेत कर चुके हैं, बीजिंग के साथ संबंधों की बेहतरी सीमा की गतिविधियों से हमेशा जुड़ी रहेगी। निस्संदेह, यह विवाद दोनों देशों के रिश्तों में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है। बीजिंग को समझना ही होगा कि सीमा-विवाद को अंतिम रूप से सुलझाने का वक्त अब आ गया है। दो कदम आगे बढ़, एक कदम पीछे हटने की उसकी कोई चाल भारत को स्वीकार्य नहीं है। जिस तरह, गलवान की एक सच्चाई को आठ महीने बाद ही सही, दुनिया के सामने कुबूल करने को वह बाध्य हुआ है, उम्मीद है कि बाकी भारतीय दावों की हकीकत को भी वह तस्लीम करेगा।  

4.लोकतंत्र की घाटी

विदेशी राजनयिकों की यात्रा से संबल

जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे की समाप्ति और इसे दो केंद्रशासित प्रदेश बनाये जाने पर पाकिस्तान तथा उसके सरपरस्तों ने जो हाय-तौबा मचायी थी, वह निरर्थक ही साबित हुई है। झूठ के किले ढहने लगे हैं। पाक को आकाश-पाताल एक करने पर जब कुछ हासिल नहीं हुआ तो वह गुलाम कश्मीर को अपना भविष्य तय करने की आजादी की दलील देकर अपनी खिसियाहट निकाल रहा है। बहरहाल, अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद को सींचने वाले अनुच्छेद 370 को हटाये जाने के बाद जो भ्रम फैलाये गये, उसकी हकीकत 24 देशों से आये राजनयिकों ने खुद अपनी आंखों से देखी है। हालांकि, उनकी यात्रा के आखिरी दिन शुक्रवार को आतंकवादियों के हमलों ने चिंता भी बढ़ायी है लेकिन यह भी पाक हुक्मरानों के इशारों पर यह जताने की कोशिश है कि कश्मीर घाटी अशांत है। बहरहाल, जम्मू-कश्मीर में जिंदगी पटरी पर लौटने लगी है और राष्ट्रीय कानून व कल्याण योजनाओं के क्रियान्वयन से घाटी के लोग देश की मुख्यधारा की ओर उन्मुख हैं। हाल के दिनों में बर्फबारी के दौरान टूरिस्टों का जमावड़ा और घाटी में कई फिल्मों की शूटिंग होने से पता चलता है कि धीरे-धीरे घाटी में जनजीवन सामान्य हो रहा है। पाक में बैठे आकाओं के इशारे पर घाटी में अलगाव के बीज बोने वाले राजनेताओं की अब चल नहीं पा रही है। स्थानीय निकाय चुनावों में जनता ने जिस उत्साह से चुनाव प्रक्रिया में भाग लिया, उसने घाटी में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जीवंत होने का ही प्रमाण दिया है। सुखद यह है कि राज्य के मुख्य राजनीतिक दलों ने परोक्ष रूप से गठबंधन बनाकर इन चुनावों में भागीदारी की।  यानी राजनीतिक दलों ने राज्य में हुए बदलाव पर मोहर लगा दी है। निस्संदेह यह केंद्र सरकार की सुनियोजित कार्रवाई की सफलता ही कही जायेगी जो देश के कन्याकुमारी से कश्मीर तक एक होने की अवधारणा को पुष्ट भी करता है।

बहरहाल, यह अच्छी पहल रही कि विदेशी राजनयिकों को कश्मीर का दौरा कराया गया। बजाय वे भ्रामक स्रोतों से सूचनाएं हासिल करें, उन्होंने स्वयं कश्मीर की स्थिति को करीब से देखा। इस प्रतिनिधिमंडल में यूरोप, अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिकी देशों के राजनयिक शामिल थे। हालांकि, इससे पहले यूरोपीय यूनियन का प्रतिनिधिमंडल भी घाटी का दौरा कर चुका है। प्रतिनिधिमंडल ने राज्य के विभिन्न राजनीतिक-सामाजिक समूहों से संवाद किया। नवनिर्वाचित जिला विकास परिषद सदस्यों से भी मुलाकात की। इस दल का मकसद यही देखना था कि क्या डेढ़ साल बाद राज्य में लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं सुचारु रूप से स्थापित हुई हैं और राज्य अमन की ओर लौटा है? राज्य में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होने की बात प्रतिनिधिमंडल से मिलने वाले स्थानीय लोगों ने कही। इसके बावजूद केंद्र सरकार को कुछ अतिरिक्त कदम कश्मीरियों का विश्वास हासिल करने के लिये उठाने होंगे, जिससे घाटी में दीर्घकालीन शांति का मार्ग प्रशस्त हो सके। जरूरी है कि उस सोच का खात्मा हो जो अलगाववाद व आतंकवाद फैलाने में मददगार होती है। राज्य में रोजगार सृजन के विशेष प्रयास करने होंगे ताकि चंद रुपयों के लालच में युवा पत्थर फेंकने व आतंक फैलाने वालों के मददगार न बनें। निस्संदेह नागरिक स्वतंत्रता को प्राथमिकता देनी होगी। हालिया स्थानीय निकाय चुनाव और फोर-जी मोबाइल सेवा की बहाली इसी दिशा में सार्थक कदम है। साथ ही न तो आतंकवाद से लड़ाई में चूक हो, न ही लोगों में सुरक्षा बलों के प्रति अविश्वास पनपे,  जिससे घाटी के लोगों का देश से जुड़ाव होगा। तभी हमारी बहुलतावादी संस्कृति का परचम दुनिया में लहरायेगा। लोकतंत्र की मजबूती के लिये इसे राज्य का दर्जा देना जरूरी है। हाल ही में गृहमंत्री ने कहा भी है कि उचित समय पर जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा दिया जायेगा। हालांकि, शुक्रवार को श्रीनगर में अंधाधुंध फायरिंग में पुलिस के दो जवानों की मौत चिंता बढ़ाने वाली है। बुधवार को भी आतंकियों ने एक रेस्तरां मालिक के बेटे की हत्या कर दी थी। शोपियां में लश्कर-ए-तैयबा के तीन आतंकियों का मारा जाना सुरक्षा बलों की चौकसी को दर्शाता है।

 

 

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