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Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.सुधार गृह से सुधार ग्राम तक

जेलों में मानवता के प्रयोग और कैद भरे जीवन में वसंत लाने के सदुपयोग में हिमाचल ने अपना रिकार्ड बेहतर किया है। बेशक चौदह जेलों की क्षमता में ठूंसे गए कैदियों के कारण वर्तमान ढांचा कमजोर पड़ता है और दो साल पहले आए राष्ट्रीय सर्वेक्षण का हवाला लें तो आक्यूपेंसी रेट राष्ट्रीय औसत में प्रदेश की जेल छोटी साबित होने लगी है। क्षमता से कहीं अधिक लगभग 111 प्रतिशत हर प्रकार के कैदियोंकी शरण में जेल व्यवस्था के मानक पूरे नहीं होते, फिर भी लगातार जीवन सुधार की प्रक्रिया में कई सफल प्रयोग हुए हैं। डीजी जेल सोमेश गोयल इसलिए साधुवाद के पात्र हैं कि मौजूदा जेलों में कैदियों ने शाल-कंबल बुनना सीख लिए, कहीं बेकरी तो कहीं थाली में खाना परोसना सीख लिया। कैदियों की श्रम साधना के कारण कमाने के साधन निरंतर बढ़ते गए और पिछले साल तक आमदनी का यह स्रोत ग्यारह करोड़ तक पहुंच गया। इस साल भी कोविड के दुष्प्रभाव के बीच कैदियों के श्रम ने पांच करोड़ कमा लिए हैं।

 भविष्य में हर्बल खेती, टॉफी उत्पादन व अन्य परियोजनाओं के तहत जेल सुधारों की कार्यशाला में कैदियों के मार्फत जिंदगी अपनी उधेड़बुन के बाहर समाज से आर्थिक संवाद कर रही है। कैदियों को महज अपराध बोध की गिरफ्त में रहने के बजाय संसार की पुनर्रचना में सहयोग की पराकाष्ठा का एक बेहतरीन प्रयोग शिमला के बुक कैफे के जरिए हुआ, जहां उम्र कैद के आवरण के बाहर कैदी किताबों के बीच और साहित्य की संगत में नई कहानी लिख रहे थे, लेकिन राजनीतिक कारणों ने बुक कैफे के ऐसे संकल्प को ही हथकड़ी पहना कर इसे जेल विभाग से छीन लिया। यह विडंबना है कि समाज सुधार के लक्ष्यों में राजनीतिक अधिकार जीत जाता है और इस तरह आज भी ऐसे स्थल की भूमिका में ग्रहण लग गया है। ऐसे में जेल सुधार कार्यक्रमों के साथ-साथ जेल प्रबंधन के उच्च आदर्शों को नई जमीन और छत चाहिए ताकि कैद की स्थिति में स्वतंत्र बैरक में कर्म की साधना फिर से प्रफुल्लित हो। प्रदेश के मंडी, कुल्लू, किन्नौर और नालागढ़ जैसे क्षेत्रों समेत पांच नई जेलों का प्रस्ताव है।

 ये जेलें कैदियों की संख्या के मद्देनजर जरूरी हैं, लेकिन सुधारों के नजरिए से अब जेल परिसरों का गुणात्मक प्रदर्शन अभिलषित है। प्रदेश में कई जेलें आजादी से पूर्व और अपने धरोहर मूल्य के कारण पर्यटक स्थल सरीखी हैं, तो निरंतर कैदियों में उद्यमशीलता, हुनर और प्रशिक्षण के अनेक विकल्प पैदा करने की निरंतरता से जगह की कमी हो गई है। ऐसे में भविष्य की जेलों की लोकेशन व इनकी आधारभूत सुविधाओं में न केवल कैदियों की संख्या को दृष्टिगत रखना होगा, बल्कि ये सुधार गृह से ग्राम की परिकल्पना में विकसित होनी चाहिएं। हमारा मानना है कि मंडी-कुल्लू की प्रस्तावित जेल परियोजनाओं को एक बड़ी जेल परिसर में विकसित किया जाए, तो यह सुविधाजनक होगा। इसी तरह दो या तीन जिलों के लिए एक बड़ी जेल का निर्माण प्रबंधन, विकास और माकूल सुरक्षा के दृष्टिगत करना होगा, ताकि इनके साथ औद्योगिक, व्यापारिक व पारंपरिक उत्पादों के लिए विस्तृत परिसर उपलब्ध हो पाए। शहरों के बीचोंबीच स्थित जेलों को हटाना होगा, जबकि कानूनी जरूरतों के अनुरूप ट्रांजिट परिसर पुलिस कालोनियों या लाइन्स के साथ जोडे़ जा सकते हैं। उदाहरण के लिए धर्मशाला जेल परिसर का धरोहर मूल्य स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपतराय की स्मृति में एक संग्रहालय की जरूरत पूरी कर सकता है, तो क्यों न हमीरपुर, ऊना और कांगड़ा के लिए एक बड़ा जेल परिसर कहीं किसी मध्य स्थल में विकसित किया जाए। जेल सुधारगृह से जेल सुधार ग्राम की अवधारणा में कल अगर परिसर विकसित होते हैं, तो ये विविध कलाओं के उत्पादन केंद्र भी बन सकते हैं। कैदियों द्वारा काम की कीमत का आकलन अगर सुधार के नजरिए से हो, तो हिमाचल के कलात्मक पक्ष को भी उभारा जा सकता है, जहां एक ही छत के नीचे प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों के पारंपरिक उत्पादों को संरक्षण मिल सकता है।

 

2. किसान आंदोलन कितना सियासी

कोई माने या न माने। बेशक किसान संगठन और नेता लगातार खंडन करते रहे हैं, जो साक्ष्य हैं, दृश्य हैं, वे स्पष्ट और साक्षात हैं। उनका विश्लेषण किया जा सकता है। निष्कर्ष यह है कि किसान आंदोलन अब ‘राजनीतिक’ हो चुका है। अब विवादास्पद कानूनों को रद्द करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी के विमर्श और बुलंद आवाजें सुनाई नहीं देतीं। भारत सरकार से अंतिम संवाद 22 जनवरी को हुआ था। उसके बाद किसी भी पक्ष ने प्रयास नहीं किया। नतीजतन मामला यथावत है। नए संकेत मिल रहे हैं कि किसान नेताओं के विरोधाभास देखे-सुने जा सकते हैं। मसलन-राकेश टिकैत कई बार बयान दे चुके हैं कि फिलहाल आंदोलन दो अक्तूबर तक जारी रहेगा, लेकिन हरियाणा किसान यूनियन के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने इसका खंडन करते हुए कहा है कि आंदोलन अक्तूबर तक जारी रखने का कोई फैसला नहीं हुआ है। यह टिकैत की निजी राय हो सकती है। चढ़ूनी ने राजनीतिक बयान भी दिया है कि जहां-जहां चुनाव होंगे, वहां भाजपा का विरोध किया जाएगा। क्या यह आंदोलन के ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ की नई वैचारिक और अधिकृत लाइन है?

 क्या अब किसान आंदोलन भी राजनीति और चुनाव के जरिए अपनी मांगें मनवाना चाहता है? टिकैत आजकल किसान और खाप महापंचायतों को संबोधित करने में व्यस्त हैं। वह लगातार घुमक्कड़ी पर हैं। उन्होंने बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात तक जाकर वहां के किसानों को संबोधित करने और किसान आंदोलन बनाम मोदी सरकार के गतिरोध का सच बयां करने की हुंकार भरी है। तो क्या टिकैत अब खुद को ‘भावी प्रधानमंत्री’ के किरदार में आंकने लगे हैं? इतना बड़ा मुग़ालता…! सवाल यह भी अहम है कि क्या विवादास्पद कानूनों और एमएसपी के कानूनी दर्जे सरीखे मुद्दों पर देश के किसान लामबंद हो सकते हैं? और 2024 के लोकसभा चुनाव का यह प्रमुख मुद्दा बन सकता है? हाल ही में नीति आयोग की संचालन परिषद की बैठक हुई थी। प्रधानमंत्री उसके अध्यक्ष होते हैं और कई राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल होते हैं। नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने खुलासा किया है कि किसी ने भी बैठक में तीन विवादास्पद कानूनों को वापस लेने की मांग नहीं की। यानी एक सशक्त पक्ष है, जो कानूनों का पक्षधर माना जा सकता है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन  अमरिंदर सिंह ने भी एक साक्षात्कार में कहा है कि यदि केंद्र सरकार दो साल के लिए कानूनों पर रोक लगा दे, तो उस पर किसान समझौता करने को सहमत हो सकते हैं। डेढ़ साल की रोक की पेशकश तो खुद कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने दी थी। क्या पंजाब के मुख्यमंत्री आंदोलित किसानों के आधार पर यह दावा कर रहे हैं? बहरहाल जो यथार्थ देश के सामने है, उसके मुताबिक कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा पश्चिमी उप्र के सहारनपुर, बिजनौर और मुज़फ्फरनगर में किसान पंचायतों को संबोधित कर चुकी हैं और 23 फरवरी को मथुरा में ऐसा आयोजन होना है।

 राजस्थान में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने भी किसानों को संबोधित कर सहानुभूति जताई है। राज्य के दौसा और भरतपुर आदि इलाकों में राजस्थान के पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट भी किसानों को उनके सच और शोषण का एहसास करा रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह की घरेलू सियासत को उनके पौत्र जयंत चौधरी आगे बढ़ा रहे हैं। किसान पंचायतों के जरिए वह राष्ट्रीय लोकदल की बंजर हुई सियासी ज़मीन को नए सिरे से ‘उपजाऊ’ बनाने में जुटे हैं। एक अच्छी-खासी भीड़ इन पंचायतों में उमड़ रही है।  इससे पहले 10 दलों के 15 सांसद गाजीपुर बॉर्डर पर किसान नेता टिकैत से मुलाकात करने गए थे, लेकिन चौतरफा किलेबंदी और कीलबंदी ऐसी थी कि उन्हें बैरंग ही लौटना पड़ा। टिकैत भी मौजूद नहीं थे। शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत पूरे प्रतिनिधिमंडल के साथ टिकैत से आलिंगनबद्ध हुए थे। अकाली दल नेता सुखबीर बादल और इनेलो नेता अभय कुमार चौटाला आदि ने किसान नेताओं से मुलाकात भी की और आंदोलन के मंचों पर बैठे भी दिखाई दिए। क्या यह सब कुछ राजनीति नहीं है? बेशक इस राजनीति पर किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि सियासी सक्रियता भी संवैधानिक अधिकार है, लेकिन सवाल किसान नेताओं से है, जो अभी तक यह कहते हुए नहीं थके कि पूरा आंदोलन किसानों का है, राजनीति से उसका कोई सरोकार नहीं। अब यह आकलन देश करे कि वाकई यह गैर-राजनीतिक आंदोलन है अथवा अब किसान प्रधानमंत्री के पद पर भी अपना ‘चेहरा’ बिठाना चाहते हैं?

 

  1. मंगल पर फिर नासा

मंगल पर इंसानों की कामयाबी का सिलसिला जिस तरह से आगे बढ़ रहा है, वह सुखद और उत्साहजनक है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का रोवर शुक्रवार को मंगल अर्थात लाल ग्रह की सतह पर सुरक्षित उतर गया और धरती पर अनमोल वीडियो भेजने शुरू कर दिए। रोवर द्वारा बनाए गए उच्च गुणवत्ता के वीडियो से कुछ तस्वीरें निकाली गई हैं, जिनमें मंगल की सतह दिखाई पड़ रही है। वैज्ञानिकों ने सतह का अध्ययन शुरू कर दिया है। यह जानने की कोशिश होगी कि क्या मंगल पर कभी जीवन था। यह खोज दिलचस्प ही नहीं, बल्कि इंसानों के लिए उपयोगी भी है। मंगल को सही प्रकार से जानने के बाद ही अगले ग्रहों की खोज में ज्यादा तेजी आएगी। नासा के ताजा अभियान की शुरुआत 30 जुलाई को हुई थी। अमेरिका के फ्लोरिडा में केप केनावेरल अंतरिक्ष सेंटर से मंगल की ओर यात्रा करते हुए यान ने 47.2 करोड़ किलोमीटर की दूरी तय की है। उसके रोवर का मंगल की सतह पर सही ढंग से उतरना यकीनन एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक कामयाबी है। यह मंगल पर भेजा गया अब तक का सबसे बड़ा रोवर है और इसकी तकनीकी क्षमता-दक्षता भी बहुत ज्यादा है। यह अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी का नौवां मंगल अभियान है, जिसकी शुरुआती सफलता से वैज्ञानिक बहुत उत्साहित हैं। नासा की यह सफलता भारत के लिए भी एक बड़ी खुशखबरी है, क्योंकि नासा पर रोवर उतारने में सबसे प्रमुख भूमिका भारतीय मूल की अमेरिकी वैज्ञानिक स्वाति मोहन की है। वह एक साल की उम्र में ही अमेरिका चली गई थीं और यह उनकी प्रतिभा का ही प्रमाण है कि नासा जैसे अंतरिक्ष विज्ञान संस्थान ने उन्हें रोवर की कमान सौंपी है। नासा में काम करने वाले भारतीय मूल के वैज्ञानिकों का प्रतिशत अभी भले एक प्रतिशत के आसपास हो, पर उनकी हैसियत अच्छी है। स्वाति मोहन अमेरिका ही नहीं, भारत के लिए भी प्रेरणास्रोत हैं। इस अभियान के तहत मंगल से छोटी चट्टान या मिट्टी लाने की कोशिश होगी। यदि यह अभियान पूर्ण सफल होता है, तो भारतीयों के गौरव में भी वृद्धि होगी और इससे भारत के मंगल अभियान को भी बल मिलेगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर कभी मंगल ग्रह पर जीवन रहा भी था, तो तीन से चार अरब साल पहले रहा होगा। शायद तब इस लाल ग्रह पर पानी बहता था। मंगल की सतह और मिट्टी के अध्ययन से असली रहस्य खुलेगा। यह अभियान अमेरिका की वर्षों की मेहनत का नतीजा है। मंगल हम मनुष्यों का एक पुराना सपना है, वहां पहुंचने या उसे जानने के लिए करीब 50 अभियान चले हैं या चल रहे हैं। अमेरिका के अलावा, रूस, भारत, चीन, यूरोपीय यूनियन, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन और जापान भी मंगल के लिए प्रयासरत रहे हैं। बेशक, मंगल की परिक्रमा करने वाले यानों की तुलना में मंगल पर उतरने वाले रोवर से ज्यादा उम्मीद है। भारत को इस दिशा में अभी लंबा सफर तय करना है। भारत ने मंगल की परिक्रमा के लिए मंगलयान नवंबर 2013 में प्रक्षेपित किया था, जो सितंबर 2014 में मंगल की कक्षा में प्रवेश कर गया था। वह अभियान पूरी तरह से सफल रहा था और दुनिया का सबसे सस्ता व एशिया का सबसे पहला मंगल अभियान था। इसरो ने स्पष्ट कर दिया है कि मंगलयान-2 पर काम चल रहा है, लेकिन चंद्रयान-3 के प्रक्षेपण वर्ष 2022 के बाद ही उसकी योजना साकार होगी।

  1. सूचना साम्राज्यवाद

मनमानी के खिलाफ मुखर होते सुर

दुनिया के महाकाय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों द्वारा विभिन्न देशों की स्थानीय खबर कंपनियों से हासिल खबरों के कारोबार के जरिये अरबों रुपये कमाने और उनकी खबरों का भुगतान न करने के खिलाफ पूरी दुनिया में आवाज उठने लगी है। फ्रांस के बाद अब दमदार पहल आस्ट्रेलिया ने की है। दुनिया के बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म गूगल व फेसबुक पर आरोप है कि दुनिया के विभिन्न देशों की खबरों को इन्होंने अपने लाभ के लिए इस्तेमाल किया है। वे इन सूचनाओं और डेटा को व्यापारिक घरानों को बेचकर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। जिन भी देशों में इसके खिलाफ प्रतिरोध सामने आया, वहां गूगल व फेसबुक ने अहसान जताया कि हम आपके नागरिकों को मुफ्त सेवाएं दे रहे हैं। यदि हमें लाभांश में हिस्सेदारी देने को बाध्य किया गया तो हम मुफ्त सेवा बंद कर देंगे। इस प्रतिरोध की पहल फ्रांस में हुई, जिसमें फ्रांसीसी मीडिया घरानों की खबरें लेने पर कॉपीराइट कानून लागू कर दिया गया, जिसके बाद गूगल ने फ्रांसीसी मीडिया कंपनियों को खबरों का भुगतान करना शुरू कर दिया। लेकिन शेष विश्व में जागरूकता के अभाव में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की मनमानी जारी है। आस्ट्रेलिया ने इस मुद्दे पर तीखे तेवर दिखाये हैं। यहां तक कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात करके गूगल और फेसबुक पर शिकंजा कसने में सहयोग मांगा है। आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने ऐसे ही संपर्क ब्रिटेन-कनाडा के राष्ट्राध्यक्षों से भी किया।

इस मनमानी के खिलाफ आस्ट्रेलिया जल्द ही संसद में समझौता कानून बनायेगा ताकि स्वदेशी खबरों के दुरुपयोग पर नियंत्रण किया जा सके, जिसके अंतर्गत समाचार सामग्री की परिभाषा तय करके मसौदा तैयार किया जायेगा। जिससे ये कंपनियां मुफ्त में खबरें लेकर मनमाना मुनाफा न कमा सकें। यूं तो समाचार घराने अपनी खबरों को अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए इंटरनेट के माध्यमों का उपयोग करते हैं। जिस पर ये कंपनियां न केवल कॉरपोरेट घरानों को डेटा बेचती हैं, बल्कि इन पर विज्ञापन थोपकर दोहरा मुनाफा कमाती हैं। दरअसल, सूचना का कारोबार करने वाली ये कंपनियां जहां एक ओर खबरों के जरिये मोटा मुनाफा कमा रही हैं, वहीं दुनिया के देशों के लोगों के दिमागों पर भी राज कर रही हैं। लोग इन माध्यमों पर जो निजी सूचनाएं पोस्ट करते हैं, कंपनियां उन्हें कॉरपोरेट घरानों के कारोबार दिशा तय करने को बेचकर मोटा मुनाफा कमा रही हैं। इतना ही नहीं, इन सूचनाओं और रुझानों की मदद से कॉरपोरेट के उत्पादों के लिए अनुकूल वातावरण भी तैयार करती हैं। कहने को इन कंपनियों का दावा है कि हम विभिन्न देशों के लिए मुफ्त मंच उपलब्ध करा रहे हैं, लेकिन दरअसल लोगों को इस मुफ्त की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। सही मायनों में लोग इन कंपनियों की मनमानी के लिए उत्पाद बन गये हैं। दरअसल, इन महाकाय सोशल मीडिया प्लेट फॉर्मों ने अब सरकारों को हिलाने और ‍विभिन्न आंदोलनों को आक्रामक बनाने का खेल भी शुरू कर दिया है। भारत में हालिया टूलकिट विवाद इसकी ताजा कड़ी है।

 

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