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Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.शहरों में सियासी खपत

हिमाचल के चार बड़े शहरों को सियासी मान्यता दिलाने की संभावना में डुबकी लगा रही सत्तारूढ़ पार्टी ने अंततः नगर निगम चुनावों में अपना चिन्ह दांव पर लगा दिया। यह एक तरह से साहसी व अति आत्मविश्वासी होने का फैसला है जिसकी रूपरेखा में कई बुनियादी सवाल भी उठेंगे। बहरहाल चार शहरों में सियासी खपत बढ़ेगी और इस तरह चुनाव चिन्ह की रेखाओं में हर पार्टी को नई सीढि़यां मिलेंगी। भाजपा अपने चिन्ह के तहत न केवल प्रतीकात्मक सफलता का मानचित्र खड़ा करना चाहती है, बल्कि चार नगर निगमों के तहत कुल 64 वार्डों के हाकिम भी चुनना चाहती है। यही फसल कांग्रेस के खेत में भी 64 नेताओं के गले में घंटी बांध सकती है। यह अनुमान लगाना कठिन होगा कि कौन सी पार्टी किस सतह पर खड़ी होकर नगर निगम चुनाव को कठिन परीक्षा में बदल देगी, लेकिन सियासत का यह खेल नेताओं के जंगल में होगा या जिम्मेदारियों के उपवन से निकल कर समाज अपने भीतर से प्रतिष्ठित समुदाय को सुशासन की बागडोर दे पाएगा। जो भी हो चुनाव चिन्हों पर जीत के कांटे कबूल होंगे या जब लक्ष्य ही जीत हो जाए, तो शहरी चुनाव भी सियासत के लाभार्थ तक सिमट जाएंगे।

 सत्ता के चौथे साल में भाजपा ने एक तरह से राजनीतिक शीर्षासन करने की ठानी है, तो विपक्षी गलियों में आक्सीजन सूंघ रही कांग्रेस के लिए खुद को आजमाने का बहाना मिल रहा है। ऐसे में पार्टी चिन्ह पर चुनाव को आहूत करते इरादे, सत्ता की शह में कांगे्रस को मात देने का गणित तैयार करेंगे, तो विपक्ष अपने वादों के खेत में खड़ा होकर मतदाता को हांक लगा सकता है। हो सकता है ये चुनाव हर पार्षद सीट पर प्रत्याशियों का आंकड़ा इतना बढ़ा दे कि मुख्यधारा की राजनीति पतली गली बन जाए या सामाजिक आंदोलन के विषय चुनाव को निर्पेक्ष बना दें। शहर अपनी बेहतरी को पारंपरिक सियासत का पिछलग्गू बना सकते हैं या इस अवसर की खुराक में सामाजिक ऊर्जा का नया संचालन कर दें। चुनाव चिन्ह होंगे, तो आबंटन से पहले राजनीतिक खिचड़ी में हर पार्टी नमक हलाल सहमति चाहेगी, लेकिन नमक हरामी का एक कदम भी पार्टियों के चूल्हे ठंडा कर देगा। उम्मीदवारों के भीतर कितने समर्थक,कितने कार्यकर्ता और कितने नेता होंगे, यह फौरी तौर पर न सत्ता और न ही विपक्ष बता सकता है। अंततः शहर अपने लिए प्रतिनिधि कैसे चुने या नगर परिषदों से निगमों में परिवर्तित परिवेश किस गगन को चूमेगा, यह प्रश्न अभी न समझा और समझाया गया।

 बड़े दायरों में शहर की परिक्रमा में जो पंचायतें आकर  शामिल हो गइर्ं, उसके कारण कहीं तो राजनीतिक बेरोजगारी भी तो पैदा हुई। दर्जनों प्रधान और सैकड़ों पंचायत सदस्य अब शहर की भूमिका में अपने लिए राजनीतिक जगह ढूंढेंगे। क्या हिमाचल की राजनीति ने स्थानीय निकाय चलाने की साक्षरता पैदा की या अब पार्टी चिन्ह को तसदीक करके चुनावी सफर अचानक बुद्धिमान हो जाएगा। कांगे्रस अपने उत्साह में पंजाब के नगर निगमों में छाए पार्टी प्र्र्रभुत्व को देख सकती है, तो गुजरात में भाजपा ने जो हासिल किया उसके सबक कांग्रेस के राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य को उदास कर सकते हैं। चार नगर निगम चुनावों में विरोध की संवेदना में उठ रहे मुद्दों का कांग्रेस किस तरह इस्तेमाल कर सकती है, लेकिन इसके लिए पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरना होगा। दूसरी ओर भाजपा जैसे संगठन की मशीनरी अपनी ताकत, जिद और जीत को प्रदर्शित करने का हर पैंतरा गढ़ रही है। विडंबना यह भी है कि कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी राजीव शुक्ला ऑनलाइन ही दर्शन दे रहे हैं, जबकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा पश्चिम बंगाल के चुनावी गणित के बीच में से समय निकाल कर, धर्मशाला सम्मेलन में कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा कर गए हैं। कांगे्रस अगर नगर निगम चुनावों से वोटर को कोई संदेश देना चाहती है, तो यह जमीन पर खडे़ कार्यकर्ता को आगे बढ़ा कर ही संभव होगा। गुजरात में भाजपा की जीत से कहीं अलग कांगे्रस को हार इसलिए मिली क्योंकि  उम्मीदवारों की फेहरिस्त में सहमति नहीं थी। भाजपा के लिए चार शहर केवल मुद्दों की वकालत नहीं, बल्कि सुशासन की पड़ताल भी है। इन प्रशासनिक शहरों में अति ब्यूरोक्रेसी के कारण पिछडे़ स्थानीय नेता कैसे सुशासन के प्रतीक बनेंगे, बड़ी चुनौती है। मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रित्व में जिस तरह ब्यूरोक्रेसी के हाथ में सत्ता का वर्चस्व था, कमोबेश वैसी परिस्थितियों में हिमाचल भी नौकरशाही को सींच रहा है। अगर चार शहर इस संवेदना में अपने आसपास के अवरोधकों को समझेंगे, तो भाजपा के लिए इसका जवाब देना आसान नहीं होगा।

2.देशद्रोह या असहमति की दिशा

टूलकिट प्रकरण की एक आरोपी चेहरा 22 वर्षीय दिशा रवि ‘देशद्रोहीÓ नहीं हैं। उनके खिलाफ आरोप बेहद कम, तुच्छ और अधूरे हैं। यूं कहें कि कानून की परिभाषा के दायरे में देशद्रोह नहीं आ पाया है। देशद्रोह और असहमति, असंतोष, मतभेद, विरोध और भिन्नता के बीच पारिभाषिक अंतर हैं, लिहाजा सत्र न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने दिशा रवि को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। बुनियादी तौर पर देशद्रोह और लोकतांत्रिक असहमति की अलग-अलग व्याख्या की गई। भारत सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, यह वैश्विक मान्यता और दावेदारी स्थापित भी होनी चाहिए। न्यायाधीश का ढेरों आभार करते हैं कि उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार की नीतियों के खिलाफ  गूंजने वाली आवाज़ ‘देशद्रोहÓ नहीं है। टूलकिट बनाना अथवा संपादित करना देशद्रोह नहीं है। असहमति या विरोध तो जागरूक और मुखर जनता की निशानी है और यही दमकते लोकतंत्र का प्रतीक है। लोकतांत्रिक देश में नागरिक तो सरकार के सचेत प्रहरी होते हैं। न्यायाधीश को संविधान के अनुच्छेद 19 की व्याख्या करनी ही थी, लेकिन उन्होंने ऋग्वेद को उद्धृत किया, जिसके मायने हैं-‘हमारे लिए सभी से कल्याणकारी विचार आएं।Ó यानी विचारों की विविधता और भिन्नता को हमारे पवित्र वेदों ने भी स्वीकार किया है। मौजूदा समय में हम सभी एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं।

सत्र न्यायाधीश के फैसले ने साफ़  कर दिया कि शासन और पुलिस किसी को भी, देशद्रोह के आरोप में, जेल के अंधेरों में नहीं धकेल सकती। यकीनन 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस, को राजधानी दिल्ली में भड़की हिंसा और लालकिले की प्राचीर पर आक्रमण बेहद संवेदनशील मामला है और देश के खिलाफ  युद्ध भड़काने से कम नहीं था। यह कांड देशद्रोह के काफी करीब है, लेकिन पुलिस को साबित करना है और दंगइयों को जेल की कोठरी तक लाना है। आरोपी और एक लाख रुपए का इनामी चेहरा लक्खा सिधाना पंजाब के बठिंडा में सरेआम एक जनसभा के मंच पर दिखाई दिया और उसने संबोधित भी किया। पंजाब या दिल्ली की पुलिस उसे गिरफ्तार क्यों नहीं कर पाई। क्या देशद्रोह और राज्य-भक्ति में भी अंतर सरकारें तय करेंगी? पर्यावरण कार्यकर्ता और शाकाहारी आंदोलन से जुड़ी दिशा के संदर्भ में न्यायाधीश ने टिप्पणी की है कि टूलकिट के जरिए कोई शैतानी साजि़श रची गई, उसके ठोस सबूत पेश नहीं किए गए। दिशा रवि के ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ और ‘पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन’ सरीखे खालिस्तान समर्थक और अलगाववादी संगठनों से कोई संबंध भी साबित नहीं किए जा सके। किसी भी साक्ष्य से यह प्रमाणित नहीं हो सका कि भारतीय दूतावासों पर हिंसा हुई और दिशा तथा उसके सहयोगियों ने उसके लिए किसी को उकसाया अथवा भड़काया। अदालत ने यह भी आदेश दिया कि व्हाट्स एप ग्रुप बनाना या टूलकिट से जुड़ना अथवा उसे ग्रेटा सरीखी हस्तियों को ट्वीट करना भी देशद्रोह की परिधि में नहीं आता। असहमति का अधिकार अनुच्छेद 19 में ही निहित है।

 न्यायाधीश का मानना है कि बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी के तहत दुनिया का ध्यान भी आकर्षित किया जा सकता है। आप अपने कथन को लोकतांत्रिक तरीके से वैश्विक स्तर पर साझा कर सकते हैं। बहरहाल एक न्यायाधीश के आदेश ने देशद्रोह के खौफ  को समाप्त किया और दिशा जेल के बाहर आ सकी, संभव है कि उसी आधार पर टूलकिट प्रकरण से जुड़े शांतनु और निकिता को भी जमानत मिल जाए, लेकिन देशद्रोह संबंधी कानून को अब बिंदुवार परिभाषित किया जाना चाहिए। यह पहल सर्वोच्च न्यायालय की कोई न्यायिक पीठ करे, तो देशहित में होगा, क्योंकि अब भी देशद्रोह के असंख्य मामले अदालत के विचाराधीन होंगे और पुलिस के हाथ में एक बेलगाम, निर्मम हथियार है। पुलिस का विवेक सीमित है। उसे सरकार का विरोध देशद्रोह लगता है अथवा सरकार पुलिस को ऐसे निर्देश देती रहती है। कई मामलों का आकलन किया जा चुका है। उन पर अदालत और न्यायाधीशों के फैसले साररूप में यही कहते हैं कि देशद्रोह के पर्याप्त सबूत नहीं हैं या ऐसा कहना या करना देशद्रोह नहीं है। देश में देशद्रोह संबंधी कानून ब्रिटिशकालीन है। उसमें संशोधन हुए होंगे, लेकिन कानून ढंग से लोकतंत्र की व्याख्या नहीं कर पाता। एक लोकतांत्रिक देश में देशद्रोह या राजद्रोह बेहद संगीन और गंभीर अपराध है, लिहाजा वह खोखला नहीं होना चाहिए। संसद और सरकार देशद्रोह कानून पर सर्वसम्मत नहीं हो सकते, लिहाजा यह पहल सर्वोच्च अदालत को ही करनी चाहिए और सरकार को आदेश देना चाहिए कि वह उन आधारों पर कानून बना सकती है, जो अदालत ने निर्देशित किए हैं।

 

3.दुखद चेतावनी

आंदोलन के बढ़ते दिनों के साथ किसानों की बोली में बढ़ती उग्रता चिंता बढ़ाने लगी है। संसद को चालीस लाख ट्रैक्टर के जोर पर घेरने की चेतावनी, इंडिया गेट के पास के पार्कों में जुताई और फसल उगाने की चेतावनी कतई हल्की नहीं है। चेतावनी की पूरी गंभीरता का अंदाजा सरकार को जरूर होगा। एक ट्रैक्टर रैली राष्ट्रीय राजधानी 26 जनवरी को देख चुकी है, किस तरह से उपद्रव की स्थिति बनी, अराजकता हुई। राष्ट्र के लिए अपमान के दृश्य उपस्थित हुए, भला कौन भूल सकता है? क्या आंदोलनकारी किसान वैसा ही कोई दुखद मौका फिर पैदा करना चाहते हैं? हम देख चुके हैं, शांति और अनुशासन के हलफनामों का विशेष अर्थ नहीं है। इसके पहले की ऐसी अतिरेकी योजनाओं पर कुछ किसान नेता अमल करें, सरकार को सावधानीपूर्वक ऐसे कदम उठाने चाहिए, ताकि राष्ट्रीय राजधानी और देश को फिर अपमान न झेलना पड़े। इधर, आंदोलन के मंच से उग्रता बढ़ी है, तो तरह-तरह के अतिवादी बयान सामने आने लगे हैं। किसानों को संयम नहीं खोना चाहिए। संयम खोकर वे देश के दूसरे लोगों का समर्थन ही गंवाएंगे। संसद, इंडिया गेट, राष्ट्रीय राजधानी पर पूरे देश का हक है। आंदोलन कोई भी हो, दूसरों को होने वाली तकलीफ के बारे में भी सोचना चाहिए, इस दिशा में सुप्रीम कोर्ट भी अनेक बार इशारा कर चुका है। वैसे आंदोलनकारी नेताओं को भी पता है, संसद को निशाना बनाना जघन्य अपराध है और वे दस-पंद्रह साल के लिए जेल जाने को भी तैयार दिख रहे हैं। लेकिन यह नौबत ही क्यों आए? किसानों को यह सोचना चाहिए कि क्या राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी यही करते? क्या वह कभी यह बोल सकते थे कि किसान निजी गोदामों पर हमला बोल दें? क्या वह किसानों को यह कह सकते थे कि अपनी खड़ी फसल को अपने हाथों बर्बाद कर दो, जला दो? आंदोलन के उग्र तौर-तरीकों के बजाय किसानों को ज्यादा संतुलित और स्वीकार्य तरीकों से अपनी मांग रखनी चाहिए। किसी भी आंदोलन के लिए अनुशासन जरूरी है। आह्वान वही करना चाहिए, जिससे राष्ट्र और राष्ट्रीय प्रतीक आहत न होते हों। उग्र आंदोलनों की परंपरा को मजबूत करने से पहले भविष्य में होने वाले आंदोलनों के बारे में सोच लेना चाहिए। आज की स्थिति में केवल किसान ही नहीं, समाज के अनेक वर्गों की अलग-अलग मांगें होंगी। क्या हर आंदोलन राष्ट्रीय राजधानी और संसद को निशाना बनाने लगेगा? आज देश के बारे में सोचना पहले से भी कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है। आंदोलन की आंच पर देश या सरकार विरोधी तत्व अपनी रोटियां सेंक लेना चाहते हैं। यह आंच जितनी जल्दी बुझे, सरकार के लिए उतना ही अच्छा है। अत: सरकार को पूरी तन्मयता के साथ इस समस्या को सुलझाना है। इस पर एक फैसला सुप्रीम कोर्ट से भी आएगा, लेकिन उससे पहले किसानों को समझाना सरकार की ही जिम्मेदारी है। सरकार और किसान संगठनों के बीच अंतिम बैठक 22 जनवरी को हुई थी, तो उसके बाद बातचीत क्यों बंद है? क्या बातचीत बंद करने से समाधान निकल आएगा? आंदोलन छोड़ किसानों के यूं ही लौट जाने के इतिहास से ज्यादा उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। यह नए दौर के नए किसान और नए किसान नेता हैं, उनके भय और भाव को समझना होगा। देश और उसके आंदोलनों को किसी नए दाग से बचाना होगा।

4.जांच की दिशा-दशा

असहमति के सुर देश विरोध नहीं

टूलकिट विवाद में गिरफ्तार पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि को जमानत देते हुए अदालत ने उन विवादित मुद्दों पर दृष्टि स्पष्ट करने का प्रयास किया है जिन पर हाल के वर्षों में देशव्यापी गहन विमर्श जारी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में असहमति को राजद्रोह की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने तल्ख टिप्पणी की कि मतभेद, असहमति, वैचारिक भिन्नता, असंतोष व अस्वीकृति राज्य की नीतियों में निष्पक्षता लाने के जरूरी अवयव हैं। न्यायाधीश ने कहा कि एक सचेतन और मुखर नागरिक एक उदासीन व विनम्र नागरिक की तुलना में जीवंत लोकतंत्र का परिचायक है। मंगलवार को पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि की जमानत के बाद तिहाड़ जेल से रिहाई हो गई। पुलिस ने अदालत में दिशा की पेशी के वक्त कहा था कि वह 26 जनवरी को लालकिला हिंसा की योजना को दर्शाने वाले टूलकिट डॉक्यूमेंट की एडिटर हैं, जिसे बनाने व प्रसारित करने में उसकी भूमिका रही है। इस बाबत एडिशनल सेशन जज धर्मेंद्र राणा ने माना कि लगता नहीं कि व्हाट्सएप समूह बनाना  अथवा किसी को हानि न पहुंचाने वाले टूलकिट का संपादन करना कोई अपराध है। जज ने इस टूलकिट के अंतर्राष्ट्रीय संस्था पीजेएफ से जुड़ाव को भी आपत्तिजनक नहीं माना। ऐसे में व्हाट्सएप समूह से उस बातचीत को हटाना, जिनका संबंध टूलकिट व पीजेएफ से था, अपराध की श्रेणी में नहीं आता। साथ ही संचार माध्यम को भौगोलिक बाधाओं से परे बताया और उसे नागरिक अधिकार माना, जिसे वह संवाद करने के लिए प्रयुक्त भी कर सकता है। साथ ही अदालत ने कहा कि पुलिस ऐसे कोई साक्ष्य पेश नहीं कर पायी है, जिससे पता चले कि दिशा रवि का संबंध पीजेएफ व खालिस्तानी समर्थकों से रहा है। साथ ही इस बात का भी कोई साक्ष्य नहीं है कि दिशा का संबंध 26 जनवरी को हुई हिंसा से रहा है। अत: आपराधिक रिकॉर्ड न रखने वाली दिशा को अधूरे सबूतों के चलते एक लाख के पर्सनल बॉन्ड पर रिहा कर दिया गया।

हालांकि, दूसरी ओर अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि इस तरह के आरोपित अपराध के लिए साक्ष्य जुटाना आसान नहीं है। यह भी माना कि मामले में जांच अभी आरंभिक दौर में तथा पुलिस अभी सबूत एकत्र करने में जुटी है। निस्संदेह जांच में जुटी एजेंसियों ने जुटाये साक्ष्यों के आधार पर दिशा रवि को गिरफ्तार किया था, लेकिन ठोस सबूतों के अभाव में किसी नागरिक की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने दिशा को जांच में सहयोग करने और कोर्ट की अनुमति के बिना देश न छोड़ने के भी निर्देश दिये। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि 26 जनवरी की दिल्ली हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की गिरफ्तारी हुई है, लेकिन किसी हिंसा के अभियुक्त से दिशा के जुड़ाव के तथ्य सामने नहीं आये हैं। अभियोजन पक्ष इस बाबत कोई साक्ष्य नहीं जुटा पाया है। अदालत ने साथ ही सत्ताधीशों को नसीहत दी कि असहमति के चलते नागरिक सरकार की नीतियों की निगरानी कर सकते हैं, लेकिन उनकी असहमति की वजह से उन्हें जेल में नहीं डाला जाना चाहिए। महज इस वजह से कि किसी की असहमति सरकार को रास नहीं आती, उस पर राजद्रोह का मामला नहीं बनाया जा सकता है। न्यायाधीश ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19 में असंतोष का अधिकार भी समाहित है। दरअसल, ‘फ्राइडे फॉर फ्यूचर’ नामक पर्यावरण मुहिम की संस्थापक बाइस वर्षीय दिशा रवि को दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा ने तेरह फरवरी को बेंगलुरु से गिरफ्तार किया था। उन पर पृथकतावादी संगठनों के समर्थक पीजेएफ के साथ मिलकर देश के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया था। उन पर राजद्रोह, नफरत फैलाने व आपराधिक षड्यंत्र के मामले दर्ज किये गये थे, जिसको लेकर देश के प्रगतिशील संगठन लगातार मुखर हो रहे थे। कहा जा रहा है था कि जन आंदोलनों को दबाने के लिए सरकार राजद्रोह कानून का दुरुपयोग कर रही है। ब्रिटिश काल में बने इस कानून के तहत जुर्माने और लंबी कैद तक प्रावधान हैं।

 

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