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Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.हिमाचल में फूड टूरिज्म

धीरे-धीरे हिमाचल में फूड टूरिज्म की दिशा में प्रगति हो रही है और एक बाजार के रूप में इसे देखा जाने लगा है। सैलानियों में चटोरापन या गैस्ट्रोमी का सही पक्ष अगर उबारा जाए, तो डेस्टीनेशन हिमाचल के साथ नए आयाम जुड़ सकते हैं। जाहिर है खान-पान की नई संस्कृति में हिमाचल ने सबसे अधिक तिब्बती रसोई को व्यापार से जोड़ा और आज मकलोडगंज से उठी महक दिल्ली के मजनूं टीला तक ही नहीं, बल्कि मोमो का साम्राज्य देशव्यापी हो गया है। हिमाचल ने अपनी गलियों को तिब्बती फूड से इतना भर लिया है कि कहीं दूर तक स्थानीय पकवान सामने नहीं आते। अब कुछ हद तक सिड्डू ने खुद को तरोताजा किया या कहीं कोई ढाबा ‘धाम’ परोस देता है, वरना हिमाचली व्यंजनों की थाली अभी अधूरी ही मानी जाएगी।

 

 मंडी व कुछ अन्य क्षेत्रों में दाल की स्टफिंग से तैयार खमीरी रोटी पर ही गौर करें, तो सैलानियों के नाश्ते में इसकी गुंजाइश बढे़गी। एक दौर था जब हिमाचल पर्यटन विकास निगम ने प्रमुख शहरों या सड़क मार्गाें पर कैफे खोलने का काम किया, लेकिन पिछले दशकों में इनका नाम मिट गया। विडंबना यह भी कि हिमाचली रसोई जैसी किसी अवधारणा को लेकर ‘टेस्ट ऑफ हिमाचल’ जैसी कोई थाली तैयार नहीं हुई। दिल्ली में स्थित पूर्वोत्तर राज्यों गोवा, बिहार या आंध्र प्रदेश के भवनों में वहां का परंपरागत खाना उपलब्ध है, जबकि हिमाचल भवन में प्रदेश का जायका पेश नहीं किया जाता है। टूरिज्म को फूड से जोड़ने की पहली विधा स्थानीय व्यंजनों से पैदा की जा सकती है। मजनूं का टीला आज हिमाचल को तिब्बती फूड टूरिज्म से जोड़ता है, तो यह ताकत हिमाचल भवन भी प्रदर्शित कर सकता है। इसके कहीं विपरीत हिमाचल में आ रहे सैलानियों को हम कमोबेश हर राज्य और अंतरराष्ट्रीय जायका परोसने की क्षमता बढ़ा रहे हैं। मनाली-मकलोडगंज जैसे स्थानों पर फूड टूरिज्म बखूबी बढ़ रहा है, लेकिन इसमें हिमाचली तत्त्व की कमी दिखाई देती है। हिमाचल के अपने फूड अनुभव भी बदल रहे हैं। खासतौर पर शिक्षा हब के रूप में उभर रहे तमाम शहरों की परिधि में खास तरह के फास्ट फूड ने पांव पसारे हैं, तो साथ ही पंजाबी, दक्षिण भारतीय, चाइनीज तथा इटैलियन जायका अपने साथ कुछ फूड चेन के उत्पादों को बढ़ावा दे रहा है।

 

 क्या हिमाचल राज्य को अपने तमाम व्यंजनों पर केंद्रित फूड श्रृंखला चलाने की जरूरत नहीं और इस संभावना पर पर्यटन विकास निगम या बड़े मंदिरों के ट्रस्टों ने तवज्जो क्यों नहीं दी। फूड टूरिज्म की विडंबना भी देखनी होगी। सुंदरनगर की रेहडि़यों पर बनते-बिकते ‘सिड्डू’ ने स्थानीय लोगों के बजाय प्रवासी मजदूरों को रोजगार दे दिया। इसी तरह राज्यभर में हाई-वे टूरिज्म की उड़ान में जो चटोरापन पनप रहा है, उसके सौदागर हिमाचली नहीं, बल्कि बाहरी राज्यों से आ रहे लोग हैं। प्रदेश के हमीरपुर स्थित राष्ट्रीय होटल प्रबंधन संस्थान के नेतृत्व में हिमाचल के पारंपरिक पकवानों को टूरिज्म के जरिए आगे बढ़ाने के संकल्प सामने आने चाहिएं। इसी तरह विश्वविद्यालयों के पर्यटन विभागों तथा फूड क्राफ्ट संस्थानों को ‘फूड टूरिज्म’ की दृष्टि से हिमाचली रसोई पर विशेष अध्ययन, शोध तथा लेखन करते हुए फूड लिटरेचर को बढ़ावा देना होगा। हिमाचल के पर्यटन विभाग को पीडब्ल्यूडी के साथ मिलकर हाई-वे टूरिज्म को हिमाचली जायकों के लिहाज से विकसित करना होगा। हिमाचली फूड टूरिज्म के जरिए निवेश की अधोसंरचना का विकास होता है, तो कई युवा स्वरोजगार पैदा कर पाएंगे।

2.पुराने समझौते पर नई सहमति

भारत-पाकिस्तान के महानिदेशक, सैन्य ऑपरेशन (डीजीएमओ) के बीच पुराने समझौते पर नई सहमति बनी है कि नियंत्रण-रेखा (एलओसी) के आर-पार युद्धविराम का सम्मान किया जाएगा। यानी अब ग्रेनेड नहीं फेंके जाएंगे, गोलीबारी नहीं होगी और गोले भी नहीं दागे जाएंगे। बेशक यह शांति-प्रयास स्वागतयोग्य है, लेकिन सवालिया भी है। युद्धविराम का समझौता 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के तानाशाह राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ के दरमियान तय हुआ था। उसके बाद शायद ही कोई ऐसा दिन रहा होगा, जब सीमापार से संघर्षविराम का उल्लंघन न किया गया हो! बीते साल 2020 में ही 5133 बार यह उल्लंघन किया गया। उनमें 126 जवान घायल हुए, 21 नागरिक मारे गए और 71 लोग जख्मी हुए। सेना और अर्द्धसैन्य बलों के 70 से अधिक रणबांकुरों की ‘शहादत’ भी हमने देखी। बीते तीन सालों के दौरान 10,752 बार युद्धविराम का उल्लंघन किया गया, जिनमें 72 जवान शहीद हुए। सिर्फ  गोलीबारी या ग्रेनेड फेंकने तक ही उल्लंघन नहीं किया गया, बल्कि आतंकी लॉन्चपैड्स से घुसपैठ भी कराई गई और ज्यादातर आतंकी हमले सरहदी राज्य कश्मीर में कराए गए।

 यह है युद्धविराम पर पुराने समझौते का क्रूर सच…! बेशक पलटवार में भारतीय सेना ने भी पाकिस्तान की चौकियां तबाह की हैं और फौजी भी मारे गए हैं, लेकिन सवाल है कि इस मारा-काटी का हासिल क्या रहा? अब दोनों देशों के डीजीएमओ स्तर पर युद्धविराम समझौते की इबारत नए सिरे से लिखी गई है, तो यह विश्वहित और मानवहित में है। पाकिस्तान की फितरत भारत-विरोधी रही है। उसके स्कूली पाठ्यक्रमों में नफरतों के पाठ पढ़ाए जाते रहे हैं, जबकि भारत ने पाकिस्तान को ‘सबसे पसंदीदा मुल्क’ का दर्जा दे रखा था। कई स्तरों पर भारत अपने पड़ोसी देश की मदद भी करता रहा। भारत आज भी सह-अस्तित्व के मानवीय दर्शन में विश्वास रखता है। इसका एक छोटा, लेकिन बहुत महत्त्वपूर्ण उदाहरण यह है कि बीते दिनों पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को श्रीलंका जाना था। पाकिस्तान ने भारत के वायु-क्षेत्र से गुज़र कर जाने की इज़ाज़त मांगी, तो भारत सरकार ने अनुमति प्रदान की। हालांकि ऐसे निर्णय कूटनीतिक सदाशयता के होते हैं। नई सहमति के बावजूद आशंकाएं और सवाल हैं, क्योंकि पाकिस्तान की सरज़मीं पर हाफिज सईद, मसूद अज़हर, लखवी, सैयद सलाउद्दीन सरीखे असंख्य आतंकियों के गुट और अड्डे लगातार सक्रिय रहे हैं। पाकिस्तान में आतंकवाद अब भी जिंदा है, लिहाजा ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ (फाट्फ) को हालिया बैठक में फैसला लेना पड़ा कि पाकिस्तान अब भी ‘ग्रे लिस्ट’ में रहेगा। शुक्र है कि पाकिस्तान ‘काली सूची’ में जाने से फिलहाल बच गया। यदि उसे ‘काली सूची’ में धकेल दिया जाता, तो पाकिस्तान बर्बाद हो सकता था। ऐसा इमरान खान का भी सार्वजनिक तौर पर मानना है। बहरहाल मुद्दा पुराने समझौते पर नई सहमति का है, लेकिन पाकिस्तान ने सरहद पर एयर डिफेंस सिस्टम तैनात कर रखा है।

 इस्लामाबाद के आसमान में एफ-16 और जे-17 लड़ाकू विमानों की गर्जना सुनाई दे रही है और वजीर-ए-आजम इमरान ने कश्मीर समेत अन्य विषयों पर द्विपक्षीय संवाद के लिए माकूल माहौल बनाने का दायित्व भारत के जिम्मे मढ़ दिया है। पाक प्रधानमंत्री ने कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पुराने प्रस्तावों का राग फिर अलापा है। सहमति के बावजूद यह दोगलापन और सैन्य गतिविधियों का प्रदर्शन क्यों किया जा रहा है। हालांकि समझौते पर नई सहमति का स्वागत इमरान खान ने भी किया है। यह ऐसा निर्णय है, जो जाहिरा तौर पर शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व और सैन्य प्रमुखों ने लिया होगा। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की अंदरूनी भूमिका क्या रही है, उसकी सार्वजनिक व्याख्या नहीं की जा सकती। ऐसे फैसले के बावजूद दो सवाल गौरतलब हैं कि पाकिस्तान इस सहमति के लिए तैयार क्यों और कैसे हुआ? और आतंकवाद को लेकर क्या उसकी फितरत बदलेगी? इन दोनों सवालों के संदर्भ में अमरीका में नए राष्ट्रपति जो बाइडेन का आगमन और पूर्वी लद्दाख में चीनी सेना का पीछे हटना और अपने ढांचों को ध्वस्त करना बेहद महत्त्वपूर्ण और सामरिक घटनाक्रम हैं। दोनों ही स्थितियों में भारत विजयी मुद्रा में है। फिर भी पाकिस्तान कहां तक नई सहमति का निर्वाह करता है, यह वक्त ही साफ करेगा, क्योंकि पुराना समझौता भी पाकिस्तान ने ही तोड़ा था।

3.रोबो का नाटक

वह दौर भी आएगा, जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के जरिए भी सृजनात्मक लेखन संभव हो जाएगा। यह एक खुशखबरी ही है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिए पहले नाटक की रचना हो चुकी है। प्राग स्थित चार्लेस यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने इस कार्य को संभव कर दिखाया है। एआई : वेन अ रोबो राइट्स अ प्ले नामक इस नाटक में एक रोबो की यात्रा कथा है। एक ऐसा रोबो, जो समाज, मानव भावनाओं और यहां तक कि मौत के बारे में जानने के लिए दुनिया में यात्रा पर है। यह भी कम दिलचस्प नहीं कि स्वयं रोबो शब्द भी सौ साल पहले एक चेक लेखक करेल केप के एक नाटक में पहली बार इस्तेमाल हुआ था। हम कह सकते हैं कि नाटक में पैदा हुए रोबो ने भी अब अपना पहला नाटक लिख लिया है। दरअसल, यह नाटक लेखन एक एआई सिस्टम जीपीटी-2 की मदद से लिखा गया है। इस तकनीक का इस्तेमाल पहले फेक न्यूज, छोटी कहानी व कविताएं लिखने के लिए हो चुका है। वैसे अभी इस एआई सिस्टम को बाहरी मदद की जरूरत बहुत पड़ रही है। अभी भाव और कथा के स्तर पर यह सिस्टम भटक जा रहा है। जैसे रोबो लिखते-लिखते यह भूल गया कि नाटक का नायक रोबो है। इसके अलावा रोबो को लिंगभेद में भी समस्या आई। वह भला कैसे तय करता कि वह लड़का है या लड़की। शायद आने वाले समय में रोबो या एआई का भी लिंग निर्धारण करना पड़ेगा। लैंगिक अंतर के साथ ही भाषा भी बदल जाती है, लेकिन रोबो या एआई अभी यह काम नहीं कर पा रहा है। रोबो ने अभी जो नाटक लिखा है, वह अपने तार्किक प्रवाह से भी भटका है। अभी जो स्थिति है, उससे यही लगता है कि एआई सिस्टम पहले से उपलब्ध सूचनाओं और लेखन का मिश्रण तैयार करने में तो सक्षम है, पर उसकी अपनी बुद्धि अभी सृजनात्मक ढंग से नहीं सोच पा रही। मनुष्य को चूंकि नाटक की जरूरत महसूस हुई थी, इसलिए उसने नाटक लिखा, लेकिन एआई को नाटक लिखने की जरूरत तो कभी महसूस नहीं होगी। उसे तो मनुष्यों के दिमाग के अनुरूप ही काम करना है, लेकिन तब भी हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि एआई या रोबो आने वाले वर्षों में मानवीय भावना, विचारधारा, भाषा, चेतना, लिंगभेद इत्यादि के ज्ञान से लैस होकर अच्छा लेखन करने लगेगा। वैज्ञानिक देचेंत जैसे विशेषज्ञ भी हैं, जो इस नाटक को पूरी तरह से एआई का सृजन नहीं मान रहे हैं। वह कहते हैं, मानव की जटिल भावनाओं को समझने और शुरू से अंत तक समन्वय के साथ संतुलित लेखन में सक्षम होने में प्रौद्योगिकी को अभी पंद्रह साल लगेंगे। अभी जो नाटक रचा गया है, उससे लोगों का उत्साह बेशक बढ़ा है, जिससे आगे की राह तैयार होगी। वैसे, एआई के लिखे नाटक दर्शकों के लिए भी चुनौती होंगे। इस नाटक की परियोजना पेश करने वाले चेक उद्यमी और एआई के प्रशंसक टॉम स्टडेनिक नाटक के एक विशेष दृश्य का उल्लेख करते हैं, जिसमें एक लड़का रोबो को एक चुटकुला सुनाने के लिए कहता है। रोबो सुनाता है, ‘जब तुम बूढ़े हो जाओगे, मर जाओगे, आगे चलकर तुम्हारे बेटे और पोते भी मर जाएंगे, लेकिन मैं तब भी यहीं आसपास रहूंगा।’ जाहिर है, मशीनी रोबो कभी नहीं मरेंगे और उनकी बुद्धिमत्ता मनुष्यों को हमेशा चौंकाती रहेगी। अभी तो सिर्फ शुरुआत है।

  1. आंतरिक लोकतंत्र

समय-संकेतों के निहितार्थ

जम्मू-कश्मीर की शीतल वादियों से शनिवार को असंतुष्ट कांग्रेसी दिग्गजों के तीखे बयानों की तपिश दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक महसूस हुई। तर्क वही थे कि कांग्रेस कमजोर हो रही है, पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र जरूरी है और हम से ही कांग्रेस मजबूत होगी। हालांकि, सीधे-तौर पर राहुल-सोनिया पर वार नहीं थे, लेकिन कांग्रेस द्वारा बनाये संगठन गांधी ग्लोबल फैमिली के शांति सम्मेलन के स्वर कांग्रेस पार्टी को अशांत करने वाले थे। कांग्रेसी दिग्गज गुलाम नबी आजाद के नेतृत्व में उनके गृह राज्य में हुए सम्मेलन की पृष्ठभूमि में राज्यसभा से सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें फिर से मौका न दिये जाने की कसक महसूस हुई। नेताओं का कहना था कि उनके अनुभव का लाभ पार्टी उठाए। कहा गया कि लगातार कमजोर हो रही पार्टी को मजबूत बनाये जाने की जरूरत है। कहा जा रहा है कि चार राज्यों व एक केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा चुनावों की घोषणा के ठीक बाद इस तरह की कवायद क्या पार्टी को चपत नहीं लगायेगी? यही वजह है कि इस कार्यक्रम के बाद पार्टी की ओर से कहा गया कि कांग्रेस कमजोर होने जैसी बात अनुचित है और इन अनुभवी नेताओं को विधानसभा चुनाव अभियान में सहयोग करना चाहिए। वहीं राजनीतिक पंडित इसे पार्टी के खिलाफ लड़ाई का शखंनाद मान रहे हैं। कहा जा रहा है कि अन्य राज्यों में ऐसे ही कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे। मुहिम को तेज करने के संकेत हैं।

बहरहाल, इन दिग्गज कांग्रेसियों की मुहिम को लेकर भी सवाल उठाये जा रहे हैं। सवाल है कि क्या कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का संकट अभी पैदा हुआ या यह दशकों से जारी अनवरत प्रक्रिया रही है? जिस वंशवाद के खिलाफ ये नेता मुखर हैं क्या उसे सींचने में इनका योगदान नहीं रहा है? पार्टी में महत्वपूर्ण पदों, मंत्रालयों व राज्यों में बड़े पदों पर रहे इन नेताओं ने वंशवाद और आंतरिक लोकतंत्र का मुद्दा तब क्यों नहीं उठाया? पार्टी ने भी एक दिग्गज नेता के सात बार सांसद रहने की बात कही। जहां तक पार्टी के कमजोर होने का सवाल है तो मोदी उदय के बाद से ही ग्राफ गिरने लगा था, यह कोई तात्कालिक घटना भी नहीं है। बहरहाल, राजनीतिक पंडित कयास लगा रहे हैं कि इस मुखर विरोध के गहरे निहितार्थ भी हो सकते हैं। गुलाम नबी आजादी की विदाई के वक्त उनके सम्मान में संसद में कसीदे पढ़े गये थे। अश्रुओं का आदान-प्रदान भी हुआ। इन कांग्रेसी नेताओं की भगवा पगड़ियों ने भी लोगों का ध्यान खींचा। फिर रविवार को भी गुलाम नबी आजाद ने प्रधानमंत्री की तरीफ की है कि वे जैसे हैं वैसा दिखते हैं और कुछ छिपाते नहीं हैं। वहीं कहा कि वे राज्यसभा से सेवानिवृत्त हुए हैं राजनीति से नहीं। वैसे भी विरोध की यह चिंगारी गुलाम नबी आजाद को राज्यसभा का कार्यकाल पूरा होने पर दोबारा मौका न दिये जाने के बाद ही भड़की है, जिसे ये नेता असंतुष्टों के खिलाफ पार्टी की कार्रवाई के रूप में देख रहे हैं।

 

 

 

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