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Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.हिमाचल में धर्म का मुद्दा

अंततः तलाशी खत्म हुई और प्रदेश की जेब में भी धर्म एक मुद्दे की तरह मिल गया। ज्वालामुखी मंदिर ट्रस्ट की जमीन पर शिरकत करता हुआ यह मुद्दा भाजपा सांसद सुब्रह्मणयम स्वामी तक पहुंच गया, तो अब राष्ट्रीय पहचान में हमारा प्रदेश भी नई फौजें खड़ी कर सकता है। कोशिश को प्रमाण मिल जाए, तो मंजिल पर कदमों के निशान बदल जाते हैं। प्रदेश में ऐसे कई गांव व शहर हैं, जिनके नाम परिवर्तन करके धर्म का मुद्दा सरकाया जा सकता है और यह रात के अंधेरे में दिल के उजाले से इतिहास चुराने की चाहत है। बहरहाल ज्वालामुखी मंदिर ट्रस्ट के अधीन दो कर्मचारियों की नियुक्ति में आस्था का मुद्दा सरकता हुए धर्म की बिसात पर हिमाचल की नई पेशकश बन गया। किसी तरह जिला प्रशासन ने गैर-हिंदुओं की नौकरी को अपने आंचल में समेट कर विशालता का परिचय दे दिया, लेकिन क्या इससे राजनीतिक संकीर्णता के दाग धुल जाएंगे।

 धार्मिक नगरी की परिधि में हमें एक नई संस्कृति का विस्तार होते हुए देख लेना चाहिए, क्योंकि यह कदम आगे बढ़ेंगे। विडंबना यह है कि मंदिर व्यवस्था में चोरी छिपे नियुक्तियों पर तो किसी को एतराज नहीं होता और न ही धार्मिक आस्था के ऐसे केंद्रों में सामाजिक योगदान का कोई जिक्र हो रहा है, लेकिन अब सांस्कृतिक परिदृश्य से अछूत होने का खतरा जरूर पैदा होने लगा है। कल अगर धार्मिक नगरियों के बीच गैर-हिंदुओं की उपस्थिति की पड़ताल होनी शुरू हो गई, तो कई कोने सूने हो जाएंगे। फिर माता की उस भेंट का क्या करेंगे जो मंदिर परिसर में गूंजते हुए बताती है ‘नंगी-नंगी पैरां माता अकबर आया, सोने दा थाल चढ़ाया’ उस थाल के वृत्तांत का क्या करेंगे, जिसके द्वारा यह प्रमाणित होता है कि शक्तिपीठ होने का इतिहास कितना ताकतवर है। हिमाचल की टोह में संप्रदायवाद की तहरीरें अगर बनने लगीं, तो सामाजिक आईने पर चढ़ी दीवारों का क्या करेंगे। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिमाचल की राजनीतिक जागरूकता, धार्मिक सौहार्द्र और अति शिक्षित समाज के रास्ते पर आपसी वैमनस्य के कांटे बिछाए जा रहे हैं। यह दीगर है कि प्रदेश में आज भी जातीय आधार और लिंगभेद के कारण कई मंदिरों या धार्मिक स्थलों में प्रवेश वर्जित करने के मामलों के कारण, हिंदू समाज के भीतर कई विद्रूप चेहरे सामने आते हैं।

 एसआर हरनोट जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार की कई कहानियों में जातीय विद्वेष के द्वार पर खंडित समाज की परंपराएं चीखती हैं। अब धर्म की चादर ओढ़ कर क्या हम अपनी जातीय विषमताओं को छुपा लेंगे। आज भी जातीय आधार पर आंगन में बिछौने बदल जाते हैं, लेकिन पीर के किसी मज़ार पर जलता दीया, न धर्म पूछता है और न ही जाति। हिमाचली संस्कृति के नेतृत्व में चंबा रूमाल की सूई जिस कढ़ाई को शिरोधार्य बनाती है, वहां सराज बेगम सरीखे कलाकार को पूजा जाता है। चंबा के मिंजर उत्सव में मिर्जा परिवार का योगदान अगर धर्म के थपेड़ों में आ जाए, तो कौन ज्वालामुखी की घटना को साधुवाद देना चाहेगा। अगर वाकई ज्वालामुखी  में हिंदू समाज भविष्य की पताका को धर्म के नाम पर ऊंचा करना चाहता है, तो पूजा-पद्धति में कुछ टीके ऐसी जातियों के माथे पर लगाए जाएं, जो आज भी वर्जित माहौल में संयमित व्यवहार की ताकीद में रहती हैं। क्या मूर्ति पूजा के आलेख में यह शर्त अमल में आ सकती है कि मंदिर की आरती केवल अतीत के अछूत करेंगे, ताकि हम सदियों के लांछन को मिटा सकें। संविधान के आरक्षण की विधा से समाज अगर समानता का अधिकार पुख्ता कर रहा है, तो सांस्कृतिक अधिकार से मंदिर की पूजा में अछूत रही जातियों को प्रतिनिधित्व क्यों न मिले। गैर-हिंदुओं को हटा कर ज्वालामुखी मंदिर ट्रस्ट कितना पवित्र हुआ, लेकिन हिंदू समाज को अपने पाप मिटाने के लिए दलित पुजारी तैयार करके पश्चाताप करना होगा।

2.हिमाचल में झगड़ालू पानी

पानी की उल्फत में हिमाचल में नए सीमा क्षेत्र उभर रहे हैं। बैजनाथ की पंचायत को मंजूर नहीं कि भटवाली खड्ड से पानी उठाकर मंडी के गांववासियों को पीने को मिल जाए। इससे पूर्व कांगड़ा की तीन पंचायतों ने अपने अस्तित्व की अनूठी लड़ाई शुरू की है। स्पैड, ननाहर और नैन पंचायतों के सुर एक साथ इसलिए उठे ताकि इलाके में बहती आवा खड्ड का पानी थोड़ा आगे निकलकर बैजनाथ की पंचायत के गले तर न कर दे। नदी अब कितनी बहती है, इससे कहीं आगे निकल कर अपने लिए कितना बहती है, यह हिसाब हो रहा है। हम अगर 23000 मेगावाट जल विद्युत पैदा करने की संभावना में अपनी आर्थिकी के सपने देख रहे हैं, तो यह हिसाब भी लगा लें कि प्रदेश की करीब साढ़े तीन लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई को कितना पानी चाहिए। आबादी के हिसाब से हिमाचल ने अपनी मांग को जिस तरह बढ़ाया है, उसका खामियाजा केवल आवा खड्ड के जल बंटवारे पर आक्रोश पैदा नहीं कर रहा, बल्कि पेय जलापूर्ति परियोजनाओं की खामियां भी बता रहा है।

 कहने को धूमल सरकार ने 2011 में अपने समय की सबसे बड़ी परियोजना का खाका खींचते हुए, 35 ग्राम पंचायतों को प्रति व्यक्ति 70 लीटर पानी मुहैया कराने का प्रयत्न किया, लेकिन उद्देश्य की पतझड़ में एक दौर गुजर गया। इसी तरह 2019 में सिराज क्षेत्र के लिए वर्तमान सरकार ने 215 करोड़ से तैंतीस पंचायतों के गले तर करने का महायज्ञ शुरू किया, लेकिन जलवायु परिवर्तन में खाक होते उम्मीदों के बादल, अब सूखे की आहट में भी गुम हो रहे हैं। हैरानी यह कि दिल्ली की प्यास बुझाने के लिए हिमाचल रेणुका जी बांध परियोजना के तहत 23 क्यूसिक्स पानी प्रति सेकंड भेज देगा, लेकिन अपने लिए ऐसी किसी योजना पर गौर नहीं। शिमला जैसे शहर के लिए आज भी हिमाचल की बड़ी बांध परियोजनाएं शरमा रही हैं। वाकनाघाट सेटेलाइट टाउन की रूपरेखा में पेयजल की अनुपलब्धता की बाधा अगर तोड़ पाए होते, तो आज वहां शिमला के बोझ को उठाने की क्षमता होती। हिमाचल से गुजरता पानी या तो बड़े बांध की शक्ल में अन्य राज्यों की बंजर जमीन को सींचता है या जलवायु परिवर्तन के दंश सहता प्रदेश सूखे नदी-नालों और खड्डों के सहारे सामाजिक रंजिश पैदा करता।

  पालमपुर की तीन पंचायतें केवल आवा खड्ड के किनारे पर अपना भविष्य देख रही हैं, क्योंकि हिमाचल ने जल संसाधनों का प्रबंधन जरूरत के मुताबिक नहीं किया। पर्वतीय शहरों की जल वितरण व्यवस्था का आलम यह है कि प्राकृतिक स्रोत खाली करके, नीचे की तरफ जाती खड्डों के बहाव सुखा दिए गए। धर्मशाला के प्राकृतिक जल प्रपात का मुकुट पहनकर जो चरान खड्ड कभी आगे बढ़कर जल वितरण का योगदान करती थी, वह अब साल में चंद महीने ही जिंदा रहती है। यह इसलिए कि वाटरफाल के मुहाने से अवैज्ञानिक ढंग से पानी खींच कर छावनी क्षेत्र तो तर हो गया, लेकिन प्राकृतिक बहाव रोकने से कई जल स्रोत तबाह हो गए। इतना ही नहीं पूरे प्रदेश में सड़कों पर बिछता कंकरीट, मनरेगा की दिहाड़ी में उजड़ते पारंपरिक तौर तरीके, जेसीबी मशीनों से दफन होते पहाड़ और विद्युत परियोजनाओं के तहत जल धाराओं को चुराने की छूट ने कई असंतुलन पैदा किए हैं। इस बीच पानी के इस्तेमाल की जरूरत बढ़ रही है, लेकिन इंतजाम करने की कोई नीति नहीं। बेशक हिमाचल अब शहरी नजर आ रहा है या पूरी तरह खुले में शौच से मुक्त होकर राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान का पैगंबर बन गया, लेकिन इसके साथ पानी के बेहतर व जरूरत के अनुसार इस्तेमाल की कोई रूपरेखा आज भी तैयार नहीं। इसका सबसे व्यापक विवरण चार नगर निगम के चुनावों में भी देखा जा रहा है और एक किस्सा हिमाचल विधानसभा की बहस में अनिल शर्मा बनाम मंत्री महेंद्र सिंह के बीच भी हो चुका है। बेशक मंत्री ने विधायक की आपत्तियों को खारिज कर दिया, लेकिन गांव को शहर की ओर ले जाने के मायनों में उनके विभाग के खाके बदलने पड़ेंगे।

  1. फिर मंडराता संकट

सरकार ने आगामी 1 अप्रैल से कोविड-19 टीकाकरण अभियान में नए आयु वर्ग को शामिल करते हुए अब 45 वर्ष से ऊपर के सभी नागरिकों को टीके लगवाने की इजाजत दे दी है। यकीनन, यह सुकूनदेह खबर है और इससे टीकाकरण की रफ्तार बढे़गी। अब तक 60 साल से ऊपर के ही सभी लोगों को यह सुविधा हासिल थी। अलबत्ता, दूसरे गंभीर रोगों के कमउम्र मरीजों को भी टीके लगवाने की छूट थी। लेकिन जिस तेजी से देश में फिर से संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं, उसे देखते हुए इसका दायरा बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही थी। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने केंद्र से अपील की थी कि नौजवानों को भी टीके लगवाने की इजाजत दी जाए। पंजाब उन सूबों में एक है, जहां कोरोना की नई लहर ज्यादा चिंता पैदा कर रही है। हालात की गंभीरता का अंदाज इसी से लग जाता है कि मुख्यमंत्री ने चेतावनी दी है कि राज्य में पहले ही कई पाबंदियां लगी हैं और यदि लोग कोविड-प्रोटोकॉल के प्रति संजीदा नहीं हुए, तो सरकार और प्रतिबंधों के लिए बाध्य होगी। आज से ठीक एक साल पहले भारत में पहले लॉकडाउन की शुरुआत हुई थी। उसके बाद देश किन-किन कठिनाइयों से जूझा, उसे याद दिलाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि हम सबके जेहन से वह अभी उतरा भी नहीं है। लेकिन टीकाकरण अभियान की शुरुआत के समय देश-दुनिया के तमाम विशेषज्ञों ने आगाह किया था कि टीके के साथ-साथ एहतियाती उपाय जारी रहने चाहिए, मगर उस मोर्चे पर हुई लापरवाही की तस्दीक आंकड़े कर रहे हैं। पिछले 24 घंटों में देश में नए पॉजिटिव मामलों की संख्या 40,700 के ऊपर चली गई है। अकेले महाराष्ट्र में लगभग 25,000 मामले रोजाना आने लगे हैं। पंजाब, गुजरात, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और तमिलनाडु मं् भी तेज उभार दिख रहा है। महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री ने कहा है कि यदि अगले कुछ दिनों में भी यह वृद्धि जारी रही, तो राज्य सरकार मुंबई और कुछ अन्य शहरों में पूर्ण लॉकडाउन जैसे विकल्प पर विचार करेगी। यानी एक साल बाद आज हम फिर उसी मोड़ पर खड़े हैं, जहां एक अनिश्चितता हमारे ऊपर डोलने लगी है। तब तो हमारे पास कोई दवा, वैक्सीन नहीं थी, जबकि आज देश में करीब पांच करोड़ लोगों को टीके की पहली खुराक मिल चुकी है, बल्कि कई लोगों को तो दोनों खुराकें मिल चुकी हैं और अब रोजाना टीके लेने वालों की तादाद भी 30 लाख के पार जा चुकी है। ऐसे में, इस समय देश को अपने नागरिकों के सच्चे सहयोग की दरकार है। कोविड-प्रोटोकॉल का ईमानदारी से निबाह ही इस समय सबसे बड़ा देशप्रेम है। याद रखें, लॉकडाउन जैसी कोई भी स्थिति सबसे ज्यादा मध्यवर्ग, निम्न मध्यवर्ग और गरीबों के लिए मारक होगी। पिछले एक साल में इन वर्गों की माली हालत खस्ता हो चुकी है। आर्थिक गतिविधियों के धीरे-धीरे पटरी पर लौटने के साथ उनकी उम्मीदें भी जीने लगी थीं, तब इस नई लहर ने चिंता बढ़ा दी है। जिन सूबों में यह वायरस सबसे तेजी से पांव फैला रहा है, वे देश की अर्थव्यवस्था को गति देने वाले अहम प्रदेश हैं। इसलिए टीकाकरण अभियान को विस्तार और रफ्तार देने के साथ-साथ इसे प्रभावी बनाने के लिए अगले कुछ माह हमें अनिवार्य रूप से मास्क पहनने, दूरी बरतने और हाथ धोते रहने के मंत्र को अपनाना होगा। इस संकट से मुक्ति सामूहिक सहयोग से ही संभव है।   

4.समृद्धि का जोड़

बेहतर प्रबंधन से दूर होगा जल संकट

सोमवार को विश्व जल दिवस सही मायनों में तब सार्थक हुआ जब देश नदी जोड़ो अभियान को मूर्त रूप देने की दिशा में आगे बढ़ गया। नदी जल प्रबंधन की दिशा में इस बदलावकारी सोच को संबल देने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी को दिया जाता है। उनकी संकल्पना को साकार करती राष्ट्रीय महत्व की केन-बेतवा नदियों को जोड़ने वाली परियोजना के समझौते के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वर्चुअल उपस्थिति में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री, उत्तर प्रदेश व मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने हस्ताक्षर किये। करार को ऐतिहासिक बताते हुए प्रधानमंत्री ने इस परियोजना को समूचे बुंदेलखंड के सुनहरी भविष्य की भाग्यरेखा बताया। निस्संदेह इस परियोजना के अस्तित्व में आने से जहां लाखों हेक्टेयर में सिंचाई हो सकेगी, वहीं प्यासे बुंदेलखंड की प्यास भी बुझेगी। जहां प्रगति के द्वार खुलेंगे, वहीं क्षेत्र से लोगों का पलायन रुकेगा, जो आने वाली पीढ़ियों की दुश्वारियों का अंत करेगी। समाज व सरकार की सक्रिय भागीदारी योजना के क्रियान्वयन में तेजी लायेगी। इस परियोजना से जहां दोनों राज्यों के अंतर्गत आने वाले बुंदेलखंड के 10.62 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई संभव होगी, वहीं 62 लाख घरों को पेयजल उपलब्ध कराया जा सकेगा। इसके अलावा मध्य प्रदेश के पन्ना जनपद में केन नदी पर एक बांध  भी बनाया जायेगा, जिससे करीब 221 किलोमीटर लिंक नहर भी निकाली जायेगी, जो झांसी के निकट बेतवा नदी को जल उपलब्ध करायेगी। इस लिंक नहर के जरिये उन बांधों को भी पानी उपलब्ध कराया जा सकेगा, जो बरसात के बाद भी जल उपलब्ध करा सकेंगे।  दरअसल, यूपीए सरकार के दौरान 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश व मध्यप्रदेश में समझौता हुआ था, लेकिन सत्ताधीशों की उदासीनता से योजना सिरे नहीं चढ़ सकी। जल शक्ति मंत्रालय की कोशिश है कि जलवहन प्रणाली के माध्यम से मानसून अवधि में जल का संग्रहण करके गैर मानसून अवधि में पानी का उपयोग किया जा सके। 

यह विडंबना ही है कि देश की आजादी के सात दशक बाद भी हम हर व्यक्ति तक पेयजल नहीं पहुंचा सके। विडंबना यह भी है कि राज्य सरकारों की प्राथमिकता में जल संसाधनों का संरक्षण व संवर्धन शामिल ही नहीं रहा है। जीवन का यह आवश्यक अवयव कभी चुनावी एजेंडे का हिस्सा बन ही नहीं पाया। हम जल अपव्यय रोकने और कुशल जल प्रबंधन में कामयाब नहीं रहे हैं। यही वजह है कि देश में जल संग्रहण के परंपरागत स्रोत खात्मे की कगार पर हैं। इन स्रोतों से जुड़ी भूमि पर माफिया द्वारा दशकों से कब्जा किया जा रहा है। तभी लगातार गिरते भू-जल स्तर के चलते वर्षा के जल के संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है। विश्व जल दिवस पर प्रधानमंत्री द्वारा ‘कैच द रेन’ अभियान की घोषणा की गई। संयुक्त राष्ट्र के संगठन व देश का नीति आयोग जल संकट के जिस खतरे से आगाह करते रहे हैं, यह अभियान उसी दिशा में कदम है। निस्संदेह इस अभियान का महज प्रतीकात्मक महत्व ही नहीं है, बल्कि यह हमारी जल संरक्षण की सार्थक पहल है। कोशिश है कि भारत जैसे देश, जहां लंबे समय तक मानसून सक्रिय रहता है, में बारिश का पानी यूं ही बर्बाद न हो और बाढ़-सूखे की विभीषिका को टाला जा सके। केंद्र सरकार का ग्रामीण इलाकों में वर्ष 2024 तक हर घर तक नल का लक्ष्य इसी दिशा में बढ़े कदम का परिचायक है। लगातार बढ़ते भूजल संकट के चलते इस तरह की अभिनव पहल महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री द्वारा मनरेगा के मद का सारा पैसा जल संरक्षण में खर्च करने की घोषणा एक महत्वपूर्ण कदम है।  इससे जहां मनरेगा की उत्पादकता में वृद्धि होगी, वहीं जल संरक्षण के लक्ष्य समय रहते हासिल हो सकेंगे। इससे पानी के परंपरागत जल स्रोतों की सफाई व संरक्षण के काम में तेजी आयेगी। स्थानीय निकाय इसमें रचनात्मक भूमिका निभाकर लक्ष्यों को हासिल करने में मदद कर सकते हैं। निश्चय ही बेहतर जल प्रबंधन तथा पानी का अपव्यय रोक कर हम जलसंकट को दूर कर सकते हैं।

 

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Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.हिमाचल में धर्म का मुद्दा

अंततः तलाशी खत्म हुई और प्रदेश की जेब में भी धर्म एक मुद्दे की तरह मिल गया। ज्वालामुखी मंदिर ट्रस्ट की जमीन पर शिरकत करता हुआ यह मुद्दा भाजपा सांसद सुब्रह्मणयम स्वामी तक पहुंच गया, तो अब राष्ट्रीय पहचान में हमारा प्रदेश भी नई फौजें खड़ी कर सकता है। कोशिश को प्रमाण मिल जाए, तो मंजिल पर कदमों के निशान बदल जाते हैं। प्रदेश में ऐसे कई गांव व शहर हैं, जिनके नाम परिवर्तन करके धर्म का मुद्दा सरकाया जा सकता है और यह रात के अंधेरे में दिल के उजाले से इतिहास चुराने की चाहत है। बहरहाल ज्वालामुखी मंदिर ट्रस्ट के अधीन दो कर्मचारियों की नियुक्ति में आस्था का मुद्दा सरकता हुए धर्म की बिसात पर हिमाचल की नई पेशकश बन गया। किसी तरह जिला प्रशासन ने गैर-हिंदुओं की नौकरी को अपने आंचल में समेट कर विशालता का परिचय दे दिया, लेकिन क्या इससे राजनीतिक संकीर्णता के दाग धुल जाएंगे।

 धार्मिक नगरी की परिधि में हमें एक नई संस्कृति का विस्तार होते हुए देख लेना चाहिए, क्योंकि यह कदम आगे बढ़ेंगे। विडंबना यह है कि मंदिर व्यवस्था में चोरी छिपे नियुक्तियों पर तो किसी को एतराज नहीं होता और न ही धार्मिक आस्था के ऐसे केंद्रों में सामाजिक योगदान का कोई जिक्र हो रहा है, लेकिन अब सांस्कृतिक परिदृश्य से अछूत होने का खतरा जरूर पैदा होने लगा है। कल अगर धार्मिक नगरियों के बीच गैर-हिंदुओं की उपस्थिति की पड़ताल होनी शुरू हो गई, तो कई कोने सूने हो जाएंगे। फिर माता की उस भेंट का क्या करेंगे जो मंदिर परिसर में गूंजते हुए बताती है ‘नंगी-नंगी पैरां माता अकबर आया, सोने दा थाल चढ़ाया’ उस थाल के वृत्तांत का क्या करेंगे, जिसके द्वारा यह प्रमाणित होता है कि शक्तिपीठ होने का इतिहास कितना ताकतवर है। हिमाचल की टोह में संप्रदायवाद की तहरीरें अगर बनने लगीं, तो सामाजिक आईने पर चढ़ी दीवारों का क्या करेंगे। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिमाचल की राजनीतिक जागरूकता, धार्मिक सौहार्द्र और अति शिक्षित समाज के रास्ते पर आपसी वैमनस्य के कांटे बिछाए जा रहे हैं। यह दीगर है कि प्रदेश में आज भी जातीय आधार और लिंगभेद के कारण कई मंदिरों या धार्मिक स्थलों में प्रवेश वर्जित करने के मामलों के कारण, हिंदू समाज के भीतर कई विद्रूप चेहरे सामने आते हैं।

 एसआर हरनोट जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार की कई कहानियों में जातीय विद्वेष के द्वार पर खंडित समाज की परंपराएं चीखती हैं। अब धर्म की चादर ओढ़ कर क्या हम अपनी जातीय विषमताओं को छुपा लेंगे। आज भी जातीय आधार पर आंगन में बिछौने बदल जाते हैं, लेकिन पीर के किसी मज़ार पर जलता दीया, न धर्म पूछता है और न ही जाति। हिमाचली संस्कृति के नेतृत्व में चंबा रूमाल की सूई जिस कढ़ाई को शिरोधार्य बनाती है, वहां सराज बेगम सरीखे कलाकार को पूजा जाता है। चंबा के मिंजर उत्सव में मिर्जा परिवार का योगदान अगर धर्म के थपेड़ों में आ जाए, तो कौन ज्वालामुखी की घटना को साधुवाद देना चाहेगा। अगर वाकई ज्वालामुखी  में हिंदू समाज भविष्य की पताका को धर्म के नाम पर ऊंचा करना चाहता है, तो पूजा-पद्धति में कुछ टीके ऐसी जातियों के माथे पर लगाए जाएं, जो आज भी वर्जित माहौल में संयमित व्यवहार की ताकीद में रहती हैं। क्या मूर्ति पूजा के आलेख में यह शर्त अमल में आ सकती है कि मंदिर की आरती केवल अतीत के अछूत करेंगे, ताकि हम सदियों के लांछन को मिटा सकें। संविधान के आरक्षण की विधा से समाज अगर समानता का अधिकार पुख्ता कर रहा है, तो सांस्कृतिक अधिकार से मंदिर की पूजा में अछूत रही जातियों को प्रतिनिधित्व क्यों न मिले। गैर-हिंदुओं को हटा कर ज्वालामुखी मंदिर ट्रस्ट कितना पवित्र हुआ, लेकिन हिंदू समाज को अपने पाप मिटाने के लिए दलित पुजारी तैयार करके पश्चाताप करना होगा।

2.हिमाचल में झगड़ालू पानी

पानी की उल्फत में हिमाचल में नए सीमा क्षेत्र उभर रहे हैं। बैजनाथ की पंचायत को मंजूर नहीं कि भटवाली खड्ड से पानी उठाकर मंडी के गांववासियों को पीने को मिल जाए। इससे पूर्व कांगड़ा की तीन पंचायतों ने अपने अस्तित्व की अनूठी लड़ाई शुरू की है। स्पैड, ननाहर और नैन पंचायतों के सुर एक साथ इसलिए उठे ताकि इलाके में बहती आवा खड्ड का पानी थोड़ा आगे निकलकर बैजनाथ की पंचायत के गले तर न कर दे। नदी अब कितनी बहती है, इससे कहीं आगे निकल कर अपने लिए कितना बहती है, यह हिसाब हो रहा है। हम अगर 23000 मेगावाट जल विद्युत पैदा करने की संभावना में अपनी आर्थिकी के सपने देख रहे हैं, तो यह हिसाब भी लगा लें कि प्रदेश की करीब साढ़े तीन लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई को कितना पानी चाहिए। आबादी के हिसाब से हिमाचल ने अपनी मांग को जिस तरह बढ़ाया है, उसका खामियाजा केवल आवा खड्ड के जल बंटवारे पर आक्रोश पैदा नहीं कर रहा, बल्कि पेय जलापूर्ति परियोजनाओं की खामियां भी बता रहा है।

 कहने को धूमल सरकार ने 2011 में अपने समय की सबसे बड़ी परियोजना का खाका खींचते हुए, 35 ग्राम पंचायतों को प्रति व्यक्ति 70 लीटर पानी मुहैया कराने का प्रयत्न किया, लेकिन उद्देश्य की पतझड़ में एक दौर गुजर गया। इसी तरह 2019 में सिराज क्षेत्र के लिए वर्तमान सरकार ने 215 करोड़ से तैंतीस पंचायतों के गले तर करने का महायज्ञ शुरू किया, लेकिन जलवायु परिवर्तन में खाक होते उम्मीदों के बादल, अब सूखे की आहट में भी गुम हो रहे हैं। हैरानी यह कि दिल्ली की प्यास बुझाने के लिए हिमाचल रेणुका जी बांध परियोजना के तहत 23 क्यूसिक्स पानी प्रति सेकंड भेज देगा, लेकिन अपने लिए ऐसी किसी योजना पर गौर नहीं। शिमला जैसे शहर के लिए आज भी हिमाचल की बड़ी बांध परियोजनाएं शरमा रही हैं। वाकनाघाट सेटेलाइट टाउन की रूपरेखा में पेयजल की अनुपलब्धता की बाधा अगर तोड़ पाए होते, तो आज वहां शिमला के बोझ को उठाने की क्षमता होती। हिमाचल से गुजरता पानी या तो बड़े बांध की शक्ल में अन्य राज्यों की बंजर जमीन को सींचता है या जलवायु परिवर्तन के दंश सहता प्रदेश सूखे नदी-नालों और खड्डों के सहारे सामाजिक रंजिश पैदा करता।

  पालमपुर की तीन पंचायतें केवल आवा खड्ड के किनारे पर अपना भविष्य देख रही हैं, क्योंकि हिमाचल ने जल संसाधनों का प्रबंधन जरूरत के मुताबिक नहीं किया। पर्वतीय शहरों की जल वितरण व्यवस्था का आलम यह है कि प्राकृतिक स्रोत खाली करके, नीचे की तरफ जाती खड्डों के बहाव सुखा दिए गए। धर्मशाला के प्राकृतिक जल प्रपात का मुकुट पहनकर जो चरान खड्ड कभी आगे बढ़कर जल वितरण का योगदान करती थी, वह अब साल में चंद महीने ही जिंदा रहती है। यह इसलिए कि वाटरफाल के मुहाने से अवैज्ञानिक ढंग से पानी खींच कर छावनी क्षेत्र तो तर हो गया, लेकिन प्राकृतिक बहाव रोकने से कई जल स्रोत तबाह हो गए। इतना ही नहीं पूरे प्रदेश में सड़कों पर बिछता कंकरीट, मनरेगा की दिहाड़ी में उजड़ते पारंपरिक तौर तरीके, जेसीबी मशीनों से दफन होते पहाड़ और विद्युत परियोजनाओं के तहत जल धाराओं को चुराने की छूट ने कई असंतुलन पैदा किए हैं। इस बीच पानी के इस्तेमाल की जरूरत बढ़ रही है, लेकिन इंतजाम करने की कोई नीति नहीं। बेशक हिमाचल अब शहरी नजर आ रहा है या पूरी तरह खुले में शौच से मुक्त होकर राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान का पैगंबर बन गया, लेकिन इसके साथ पानी के बेहतर व जरूरत के अनुसार इस्तेमाल की कोई रूपरेखा आज भी तैयार नहीं। इसका सबसे व्यापक विवरण चार नगर निगम के चुनावों में भी देखा जा रहा है और एक किस्सा हिमाचल विधानसभा की बहस में अनिल शर्मा बनाम मंत्री महेंद्र सिंह के बीच भी हो चुका है। बेशक मंत्री ने विधायक की आपत्तियों को खारिज कर दिया, लेकिन गांव को शहर की ओर ले जाने के मायनों में उनके विभाग के खाके बदलने पड़ेंगे।

  1. फिर मंडराता संकट

सरकार ने आगामी 1 अप्रैल से कोविड-19 टीकाकरण अभियान में नए आयु वर्ग को शामिल करते हुए अब 45 वर्ष से ऊपर के सभी नागरिकों को टीके लगवाने की इजाजत दे दी है। यकीनन, यह सुकूनदेह खबर है और इससे टीकाकरण की रफ्तार बढे़गी। अब तक 60 साल से ऊपर के ही सभी लोगों को यह सुविधा हासिल थी। अलबत्ता, दूसरे गंभीर रोगों के कमउम्र मरीजों को भी टीके लगवाने की छूट थी। लेकिन जिस तेजी से देश में फिर से संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं, उसे देखते हुए इसका दायरा बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही थी। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने केंद्र से अपील की थी कि नौजवानों को भी टीके लगवाने की इजाजत दी जाए। पंजाब उन सूबों में एक है, जहां कोरोना की नई लहर ज्यादा चिंता पैदा कर रही है। हालात की गंभीरता का अंदाज इसी से लग जाता है कि मुख्यमंत्री ने चेतावनी दी है कि राज्य में पहले ही कई पाबंदियां लगी हैं और यदि लोग कोविड-प्रोटोकॉल के प्रति संजीदा नहीं हुए, तो सरकार और प्रतिबंधों के लिए बाध्य होगी। आज से ठीक एक साल पहले भारत में पहले लॉकडाउन की शुरुआत हुई थी। उसके बाद देश किन-किन कठिनाइयों से जूझा, उसे याद दिलाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि हम सबके जेहन से वह अभी उतरा भी नहीं है। लेकिन टीकाकरण अभियान की शुरुआत के समय देश-दुनिया के तमाम विशेषज्ञों ने आगाह किया था कि टीके के साथ-साथ एहतियाती उपाय जारी रहने चाहिए, मगर उस मोर्चे पर हुई लापरवाही की तस्दीक आंकड़े कर रहे हैं। पिछले 24 घंटों में देश में नए पॉजिटिव मामलों की संख्या 40,700 के ऊपर चली गई है। अकेले महाराष्ट्र में लगभग 25,000 मामले रोजाना आने लगे हैं। पंजाब, गुजरात, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और तमिलनाडु मं् भी तेज उभार दिख रहा है। महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री ने कहा है कि यदि अगले कुछ दिनों में भी यह वृद्धि जारी रही, तो राज्य सरकार मुंबई और कुछ अन्य शहरों में पूर्ण लॉकडाउन जैसे विकल्प पर विचार करेगी। यानी एक साल बाद आज हम फिर उसी मोड़ पर खड़े हैं, जहां एक अनिश्चितता हमारे ऊपर डोलने लगी है। तब तो हमारे पास कोई दवा, वैक्सीन नहीं थी, जबकि आज देश में करीब पांच करोड़ लोगों को टीके की पहली खुराक मिल चुकी है, बल्कि कई लोगों को तो दोनों खुराकें मिल चुकी हैं और अब रोजाना टीके लेने वालों की तादाद भी 30 लाख के पार जा चुकी है। ऐसे में, इस समय देश को अपने नागरिकों के सच्चे सहयोग की दरकार है। कोविड-प्रोटोकॉल का ईमानदारी से निबाह ही इस समय सबसे बड़ा देशप्रेम है। याद रखें, लॉकडाउन जैसी कोई भी स्थिति सबसे ज्यादा मध्यवर्ग, निम्न मध्यवर्ग और गरीबों के लिए मारक होगी। पिछले एक साल में इन वर्गों की माली हालत खस्ता हो चुकी है। आर्थिक गतिविधियों के धीरे-धीरे पटरी पर लौटने के साथ उनकी उम्मीदें भी जीने लगी थीं, तब इस नई लहर ने चिंता बढ़ा दी है। जिन सूबों में यह वायरस सबसे तेजी से पांव फैला रहा है, वे देश की अर्थव्यवस्था को गति देने वाले अहम प्रदेश हैं। इसलिए टीकाकरण अभियान को विस्तार और रफ्तार देने के साथ-साथ इसे प्रभावी बनाने के लिए अगले कुछ माह हमें अनिवार्य रूप से मास्क पहनने, दूरी बरतने और हाथ धोते रहने के मंत्र को अपनाना होगा। इस संकट से मुक्ति सामूहिक सहयोग से ही संभव है।   

4.समृद्धि का जोड़

बेहतर प्रबंधन से दूर होगा जल संकट

सोमवार को विश्व जल दिवस सही मायनों में तब सार्थक हुआ जब देश नदी जोड़ो अभियान को मूर्त रूप देने की दिशा में आगे बढ़ गया। नदी जल प्रबंधन की दिशा में इस बदलावकारी सोच को संबल देने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी को दिया जाता है। उनकी संकल्पना को साकार करती राष्ट्रीय महत्व की केन-बेतवा नदियों को जोड़ने वाली परियोजना के समझौते के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वर्चुअल उपस्थिति में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री, उत्तर प्रदेश व मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने हस्ताक्षर किये। करार को ऐतिहासिक बताते हुए प्रधानमंत्री ने इस परियोजना को समूचे बुंदेलखंड के सुनहरी भविष्य की भाग्यरेखा बताया। निस्संदेह इस परियोजना के अस्तित्व में आने से जहां लाखों हेक्टेयर में सिंचाई हो सकेगी, वहीं प्यासे बुंदेलखंड की प्यास भी बुझेगी। जहां प्रगति के द्वार खुलेंगे, वहीं क्षेत्र से लोगों का पलायन रुकेगा, जो आने वाली पीढ़ियों की दुश्वारियों का अंत करेगी। समाज व सरकार की सक्रिय भागीदारी योजना के क्रियान्वयन में तेजी लायेगी। इस परियोजना से जहां दोनों राज्यों के अंतर्गत आने वाले बुंदेलखंड के 10.62 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई संभव होगी, वहीं 62 लाख घरों को पेयजल उपलब्ध कराया जा सकेगा। इसके अलावा मध्य प्रदेश के पन्ना जनपद में केन नदी पर एक बांध  भी बनाया जायेगा, जिससे करीब 221 किलोमीटर लिंक नहर भी निकाली जायेगी, जो झांसी के निकट बेतवा नदी को जल उपलब्ध करायेगी। इस लिंक नहर के जरिये उन बांधों को भी पानी उपलब्ध कराया जा सकेगा, जो बरसात के बाद भी जल उपलब्ध करा सकेंगे।  दरअसल, यूपीए सरकार के दौरान 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश व मध्यप्रदेश में समझौता हुआ था, लेकिन सत्ताधीशों की उदासीनता से योजना सिरे नहीं चढ़ सकी। जल शक्ति मंत्रालय की कोशिश है कि जलवहन प्रणाली के माध्यम से मानसून अवधि में जल का संग्रहण करके गैर मानसून अवधि में पानी का उपयोग किया जा सके। 

यह विडंबना ही है कि देश की आजादी के सात दशक बाद भी हम हर व्यक्ति तक पेयजल नहीं पहुंचा सके। विडंबना यह भी है कि राज्य सरकारों की प्राथमिकता में जल संसाधनों का संरक्षण व संवर्धन शामिल ही नहीं रहा है। जीवन का यह आवश्यक अवयव कभी चुनावी एजेंडे का हिस्सा बन ही नहीं पाया। हम जल अपव्यय रोकने और कुशल जल प्रबंधन में कामयाब नहीं रहे हैं। यही वजह है कि देश में जल संग्रहण के परंपरागत स्रोत खात्मे की कगार पर हैं। इन स्रोतों से जुड़ी भूमि पर माफिया द्वारा दशकों से कब्जा किया जा रहा है। तभी लगातार गिरते भू-जल स्तर के चलते वर्षा के जल के संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है। विश्व जल दिवस पर प्रधानमंत्री द्वारा ‘कैच द रेन’ अभियान की घोषणा की गई। संयुक्त राष्ट्र के संगठन व देश का नीति आयोग जल संकट के जिस खतरे से आगाह करते रहे हैं, यह अभियान उसी दिशा में कदम है। निस्संदेह इस अभियान का महज प्रतीकात्मक महत्व ही नहीं है, बल्कि यह हमारी जल संरक्षण की सार्थक पहल है। कोशिश है कि भारत जैसे देश, जहां लंबे समय तक मानसून सक्रिय रहता है, में बारिश का पानी यूं ही बर्बाद न हो और बाढ़-सूखे की विभीषिका को टाला जा सके। केंद्र सरकार का ग्रामीण इलाकों में वर्ष 2024 तक हर घर तक नल का लक्ष्य इसी दिशा में बढ़े कदम का परिचायक है। लगातार बढ़ते भूजल संकट के चलते इस तरह की अभिनव पहल महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री द्वारा मनरेगा के मद का सारा पैसा जल संरक्षण में खर्च करने की घोषणा एक महत्वपूर्ण कदम है।  इससे जहां मनरेगा की उत्पादकता में वृद्धि होगी, वहीं जल संरक्षण के लक्ष्य समय रहते हासिल हो सकेंगे। इससे पानी के परंपरागत जल स्रोतों की सफाई व संरक्षण के काम में तेजी आयेगी। स्थानीय निकाय इसमें रचनात्मक भूमिका निभाकर लक्ष्यों को हासिल करने में मदद कर सकते हैं। निश्चय ही बेहतर जल प्रबंधन तथा पानी का अपव्यय रोक कर हम जलसंकट को दूर कर सकते हैं।

 

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