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Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.आक्रोश के हाथ तकदीर की रेखा

राजनीतिक बगावत, मिलावट और झंझावात के बीच नगर निगम चुनाव की पेशगी में चरित्र पिघल रहा है। खरबूजे रंग बदल रहे हैं और कहीं-कहीं छुरी तथा खरबूजे के बीच यह देखा जा रहा है कौन किसके ऊपर गिरता है। यह ख्याल मन बहलाने के लिए अच्छा हो सकता है, लेकिन हिमाचल की राजनीति के लिए ‘यह दाग अच्छा नहीं’ है। नगर निगम चुनावों में  शहरों के दाग जनता देखे या न देखे, लेकिन दागदार होती सियासत के पर्दे हट रहे हैं। यही वजह है कि दो प्रमुख पार्टियां एक-दूसरे को लांछित करने के बजाय अपने-अपने बचाव के उपदेश में अपनों को ही समझा रही हैं। अगर मुख्यमंत्री को मंडी की ग्रामीण जनता को यह कहना पड़ रहा है कि पांच साल नगर निगम में रह कर देखो, तो कायदे से समझना होगा कि किसके हाथ में किसकी तकदीर की रेखा है। ये रेखाएं भ्रमित हैं और चुनाव चिन्हों पर खींची गई बिसात भी। सत्ता के तिलक में भाजपा और भाजपा के तिलक में प्रत्याशी हो सकते हैं,लेकिन ऐसी उम्मीदवारी ने अपने भीतर कई आक्रोश पैदा कर लिए। कांग्रेस की चर्चा उस समर्थन में हो सकती है, जो सत्ता के चौथे साल में विपक्ष की जगह बढ़ा देता है। ऐसे में कभी भाजपा की सबसे बड़ी खोज रहे अनिल शर्मा आज गले की हड्डी बने नजर आ रहे हैं, तो मंडी की सियासत में नई टेंशन का इजहार होता है।

 मंडी को धर्मपुर बनाने चले महेंद्र सिंह के सामने पंडित सुखराम की दीवार पर अनिल शर्मा का चेहरा चिढ़ा रहा है। इसमें दो राय नहीं कि अनिल शर्मा ऐसी जलालत भरी सियासत जी रहे हैं, जो मंडी में उनके प्रभाव को कम आंकना चाहती है। वर्तमान नगर निगम चुनावों में एक मुआयना यह भी है कि जीत के अंश में अपभ्रंश राजनीति के कितने छिलके उतरे। इसमें दो राय नहीं कि मंडी के सफर पर निकली सत्ता के सबसे प्रभावशाली हस्ती बने महेंद्र सिंह के चिन्ह और प्रतीक खड़े हैं, लेकिन पगडंडियां इतनी भी सीधी नहीं कि मंडी शहर अपनी प्रदक्षिणा में अतीत की कृतज्ञता भूल जाए। फैसला यह भी होगा कि मंडी शहर मुख्यमंत्री पद के ताज को पहनकर चलता है या गटर में पहुंची राजनीति को दुरुस्त करने का जरिया बन जाता है। जिस तरह अनिल के बोल महेंद्र सिंह को खोल रहे हैं, उससे भाजपा की मांद में अपनों का शिकार करने की वजह मिल जाती है। खैर इन परिस्थितियों में मुख्यमंत्री के सामने महेंद्र सिंह के प्रभाव की फिरौती किस तरह की कसौटी बनेगी, यह मंडी की जनता का सबसे बड़ा रहस्य है। चारों नगर निगमों में जातियां और वर्ग कुछ सहेज सकते हैं, लेकिन बागियों का एक अद्भुत समाज भी उभर रहा है। ये बागी खुले आसमान के नीचे आवाज बुलंद कर रहे हैं, जबकि पार्टियों के तंबुओं को बाहर की हवा का खतरा है। राजनीतिक संगठन कितने मजबूत हो सकते हैं, इसके तजुर्बे में आहें भरती मर्दानगी कहीं मान मनौअल पर आ गई। जाहिर तौर पर किसी भी पार्टी का कार्यकर्ता केवल चुनाव की दहलीज पर ही नेता बनता है और इस तरह देखें तो कांग्रेस-भाजपा के विक्षुब्ध अपने तौर पर नए नेता हैं।

पालमपुर शहर की खुशखबर ही उसकी राजनीतिक त्रासदी की तरह फिर मुखातिब है। भाजपा के रणनीतिकारों ने जो सपने बुने, उनके विध्वंस की मुनादी में कई योद्धा पार्टी से विमुख हो चुके हैं। ऐसे में यह गौर करना होगा कि क्या एक बार फिर नगर निगम चुनाव के बहाने पालमपुर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का राजनीतिक क्षेत्रफल खुद से लड़ रहा है। करीब आधी सीटों पर अगर टिकटों की कुर्बानियां ली गईं, तो अब चुनाव की गर्दन काटने को आतुर आक्रोश के जलवे हाजिर हैं। कल तक जिन संजीव सोनी, विजय भट्ट, किरण धीमान और संजय राठौर को जोड़ कर भाजपा पालमपुर विधानसभा को जीतना चाहती थी, आज यही पहिए उसकी सवारी नहीं कर रहे। सत्ता के लिए चुनाव चिन्ह की रसीद पर अगर मतैक्य नहीं, तो भाजपा के डेरे में सेंधमारी के लिए विपक्ष पूरी तरह दोषी नहीं होगा। कम से कम मंडी और पालमपुर में भाजपा की अंदरूनी कलह अपनी हद से बाहर हो चुकी है। कांग्रेस भी कमोबेश अपने कांटों से रू-ब-रू है, लेकिन सत्ता के बीच अनुशासनहीनता के ऐसे सबब, कार्य कुशलता तो नहीं हो सकते। अनिल शर्मा जो कुछ महेंद्र सिंह के संदर्भ में कह रहे हैं, उनसे अछूता जयराम ठाकुर मंत्रिमंडल नहीं हो सकता। माना वह भद्र राजनीति नहीं कर रहे, लेकिन अभद्र परंपरा के बीच भाजपा उन्हें अपनाने की भूल कर चुकी है। क्या राजनीति की तमाम गलतियों का प्रायश्चित हमेशा जनता ही करेगी और अगर यह नीयति है, तो फिर कठिन फैसलों के मध्य सारे भ्रम मतदान में परिवर्तित हो सकते हैं।

2.बंदिशों में जीवन की निगरानी

इस बार कोरोना से कहीं अधिक चिंता उन दुश्वारियों की भी है, जो पिछले एक साल की मरम्मत में इनसान की जिल्लत बन गई। ऐसे में राष्ट्रीय सूचनाओं और संदर्भों को चाट रहा कोरोेना अगर हिमाचल की सियाही में फिर सख्त कदमों की हिदायत लिख दे, तो इस सूबेदारी के आलम में तबाही के मंजर को रोक पाना मुश्किल होगा। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के द्वारा ऐसे संकेतों का प्रेषित होना अब स्वाभाविक लगने लगा है, क्योंकि राज्य दर राज्य द्वार बंद होने लगे हैं और पड़ोसी पंजाब को देखें तो हिमाचल को बढ़ते मामलों की शूर्पणखा को पहचान लेना चाहिए। फिर एक्टिव मामलों में लगातार हो रहा इजाफा अगर हर दिन औसतन ढाई सौ भी जोड़ता गया, तो लॉकडाउन की स्थिति से हमें कौन बचाएगा। प्रदंश में कोविड से मरने वालों का आंकड़ा 1014 तक पहुंचकर सुन्न नहीं हो रहा, बल्कि पिछले कुछ दिनों से हर रोज नर कंकाल पहनकर बता रहा है कि संख्या दो-दो मृतक चुनकर बढ़ रही है। यह प्रश्न महज 1654 एक्टिव मरीज होने का नहीं, बल्कि फिर से कितनी चारपाइयां बिछाकर खुद से पूछोगे कि इस बार इंतजाम पहले से बेहतर क्यों नहीं हुआ। आश्चर्य यह कि कोरोना अब सियासी खूंटे पर लटका है। कभी इसे उतार कर सियासी धमाचौकड़ी आगे बढ़ जाती है और जब वक्त पर इसके नाखून नजर आते हैं, तो फिर से कसरतें भयभीत मंजिलों को गिनते हुए कभी बाजार, कभी व्यापार या कभी स्कूल-कालेज के द्वार को बंद करने की नौबत तक आ जाती हैं।

 अभी ज्यादा समय नहीं हुआ जब राजनीतिक मंच हर गांव में अपनी जीत का बीड़ा उठाए ये भूल गए थे कि उस दौर में कोरोना के खिलाफ कुछ हिदायतें भी रही थीं। हमने तब यही सुना कि किसके पलड़े में पूरा प्रदेश झुक गया। ऐसे में हम यह क्यों न खोजें कि कोरोना के हर बढ़ते जख्म का ‘सर्वश्रेष्ठ’ कारण राजनीति का निरंकुश व्यवहार है। ऐसे में प्रदेश के चार नगर निगमों की दहलीज पर खड़ी चुनौती में कोरोना शरीक नहीं होगा, इसका क्या इंतजाम है। जिस तरह नामांकन पत्र दाखिल हुए हैं, उसके पीछे सियासी कारवां खड़ा है। पार्टी चुनाव चिन्हों पर दांव पर लगी राजनीतिक प्रतिष्ठा के सदके जो पदचाप सुनाई दे रही है, उसे कैसे नजरअंदाज करेंगे। चुनाव प्रचार की व्यापकता को रोकने की नैतिकता तो किसी दल में नहीं रहेगी और इसी के साथ पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया की अनिवार्यता में शरीक सरकारी अमला कहां तक खुद को अलग व सुरक्षित रख सकता है। यह एक अलग विवरण हैं कि ऐसे मुकाम पर प्रदेश के कितने कर्मचारी पिछले एक साल से अपने दायित्व के कारण  कोरोना पॉजिटिव हुए। मंडी शिवरात्रि या अब तक हुए मेलों की रौनक में सुरक्षा के कितने मानदंड अपनाए गए या वर्तमान परिस्थितियों में किस कद्र अवहेलना हुई। जो मैकेनिजम बना, वह भी ढह गया क्योंकि देश अब चुनाव के लिए जिंदा रहना चाहता है। हिमाचल का सबसे बड़ा संदेश अगर कुछ दिनों तक पंचायती राज संस्थाओं के बहाने जीत व हार का रहा, तो यह दौर फिर सियासत को भरकर यही माप रहा है कि इस बार सेहरा किसके सिर पर सजेगा। पड़ोसी पंजाब में रात्रि नौ बजे से सुबह पांच बजे तक कर्फ्यू ने एक ओर कोरोना के खिलाफ सुरक्षा चक्र बढ़ाया है, तो दूसरी ओर फिर आर्थिकी की नस कटने का डर व्याप्त हो रहा है। यह इसलिए भी कि पेट्रोल-डीजल के दामों का आतताई रुख इस वक्त विध्वंस के राग गा रहा है।

 हिमाचल में टैक्सी मालिकों की हड़ताल को अर्थहीन नहीं किया जा सकता और न ही निजी बसों पर फहराती काली झंडियों का सबूत प्रोत्साहित कर रहा है। सरकार के अपने खजाने खाली हैं और विकल्प की नाउम्मीद राहों पर कड़े फैसलों की अनिवार्यता दर्ज है। ऐसे में राष्ट्र के माहौल में गुजरा साल सिर्फ यादें नहीं, सिसकियों के बीच उजड़ती दरख्वास्तें भी हैं। अब तो कोरोना की आहट भी कितने चूल्हों को ठंडा करने की सजा सरीखी है, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। हिमाचल में ही अगर कोरोना काल ने बैंकों का एनपीए 710 करोड़ बढ़ गया, तो इस दर्द का उल्लेख जिन्न बनकर कितने व्यवसायियों को उजाड़ रहा है, इसे भी समझना होगा। बहरहाल फिर से नौबत सख्त निर्देशों के अनुपालन की एक नई सीमा तय करेगी। कम से कम एक साल के अनुभव की रगड़ यह बताती है कि तकलीफ के पुराने पन्ने पलटने की मजबूरी को नए परिप्रेक्ष्य में देखा जाए।  यानी बाजार, व्यापार, सरकार और राजनीतिक दारोमदार चलाते हुए अंततः जनता को ही सीखना है कि बंदिशें अभी जीवन की निगरानी को मोहलत नहीं दे रहीं। राजनीतिक गतिविधियों पर चाहे सरकार के फैसले धीमी गति से आएं, लेकिन हमें अपने तौर पर धार्मिक, सांस्कृतिक, पारंपरिक, सामुदायिक तथा पारिवारिक समारोहों के पांव में कुछ बेडि़यां पहनाए रखनी हैं।

3.बांग्लादेश के पचास वर्ष

बांग्लादेश निर्माण की पचासवीं वर्षगांठ भारत के साथ ही पूरे दक्षिण एशिया के लिए खुशी का क्षण है। सबसे ज्यादा महत्व इस बात का है कि बांग्लादेश ने ऐसे अहम मौके पर भारत को जिस तरह याद किया है, उसका प्रभाव पूरे क्षेत्र की शांति व तरक्की की बुनियाद मजबूत करेगा। दक्षिण एशिया में यह एक ऐसा देश है, जो कम समय में खुद को एक मुकाम पर पहुंचाकर अपनी सार्थकता सिद्ध कर चुका है। न केवल राजनीतिक, सामाजिक, बल्कि आर्थिक रूप से भी यह दक्षिण एशिया की एक शान है। वह हमारा ऐसा पड़ोसी है, जिसने कभी भारत के प्रति दुर्भाव का प्रदर्शन नहीं किया है। चीन, पाकिस्तान की जुगलबंदी हम जानते हैं और इधर के वर्षों में जब हम नेपाल को भी देखते हैं, तब हमें बांग्लादेश का महत्व ज्यादा बेहतर ढंग से समझ में आता है। शुक्रवार को ढाका के परेड ग्राउंड पर यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ऐतिहासिक घड़ी को गर्व के क्षण बताया है, तो कतई आश्चर्य नहीं।
बांग्लादेश हमारा ऐसा दोस्त पड़ोसी है, जिसके बारे में प्रधानमंत्री मोदी एकाधिक बार ‘पड़ोसी पहले’ की भावना का इजहार कर चुके हैं। सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक संबंधों के आधार पर बांग्लादेश भारत के ऐसे निकटतम सहयोगियों में शुमार है, जो भारतीय हितों के प्रति सदा सचेत रहे हैं। आज पूर्वोत्तर राज्यों में जो शांति है, उसमें भी बांग्लादेश का बड़ा योगदान है। महत्व तो इसका भी है कि बांग्लादेश के बुलावे पर महामारी के समय में अपनी पहली विदेश यात्रा पर प्रधानमंत्री वहां गए हैं। इस यात्रा का फल पूरे क्षेत्र को मिलना चाहिए। दोनों देशों के बीच जो कुछ विवाद हैं, उन्हें जल्द सुलझाने के साथ ही नई दिल्ली और ढाका को विकास अभियान में जुट जाना होगा। बांग्लादेश को 50 वर्ष हो गए, तो आजाद भारत भी अपनी 75वीं वर्षगांठ की ओर बढ़ रहा है। गरीबी और सांप्रदायिक हिंसा ने दोनों देशों को समान रूप से चिंतित कर रखा है, मिलकर प्रयास करने चाहिए, ताकि दोनों देशों में व्याप्त बड़ी कमियों को जल्द से जल्द अलविदा कहा जा सके। बांग्लादेश की असली मुक्ति और भारत की असली आजादी समेकित विकास की तेज राह पर ही संभव है। प्रधानमंत्री ने अपनी यात्रा के अवसर पर बांग्लादेशी अखबार केलिए जो लेख लिखा है, उसे भी याद किया जाएगा। ध्यान रहे, अपने-अपने घरेलू मोर्चे पर अशिक्षा, कट्टरता, सांप्रदायिक हिंसा में भी हमने बहुत कुछ गंवाया है। वाकई, यदि बांग्लादेश के संस्थापक बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की हत्या न हुई होती, तो आज दक्षिण एशिया की तस्वीर अलहदा होती। बंगबंधु उस दर्द को समग्रता में समझते थे, जिससे गुजरकर दुनिया के नक्शे पर बांग्लादेश उभरा। उनके असमय जाने से देश कुछ समय के लिए भटकता दिखा, लेकिन आज वह विकास के लिए जिस तरह प्रतिबद्ध है, उसकी मिसाल पाकिस्तान में भी दी जाती है। प्रधानमंत्री ने सही इशारा किया है कि दोनों देश एक उन्नत एकीकृत आर्थिक क्षेत्र का निर्माण कर सकते हैं, जिससे दोनों के उद्यमों को तेजी से आगे बढ़ने की ताकत मिलेगी। जो देश दहशतगर्दी के पक्ष में रहना चाहते हैं, उन्हें छोड़ आगे बढ़ने का समय आ गया है। अब सार्क या दक्षेस को ज्यादा घसीटा नहीं जा सकता, क्योंकि अभावग्रस्त लोग इंतजार नहीं कर सकते। भारत और बांग्लादेश की मित्रता का भविष्य उज्ज्वल

4. निकिता को न्याय

शीघ्र फैसले से जनता का भरोसा बढ़ेगा

फरीदाबाद के बहुचर्चित निकिता तोमर हत्याकांड में ठीक पांच माह बाद फैसला आने व अपराधियों को सजा मिलने से लोगों का कानून व्यवस्था पर भरोसा बढ़ेगा। यह संयोग ही है कि 26 अक्तूबर को निकिता की हत्या हुई थी और 26 मार्च को ही अभियुक्तों को सजा सुनायी गयी। फास्ट ट्रैक अदालत ने शुक्रवार को दोनों दोषियों तौसीफ और रेहान को उम्रकैद की सजा सुनायी और बीस-बीस हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। यह तथ्य देश की न्यायिक प्रक्रिया पर जनता का भरोसा बढ़ाने वाला ही है कि मामले में 151 दिन में न्याय हुआ। हालांकि, मृतक के परिजन दोषियों को मौत की सजा दिये जाने की मांग कर रहे थे। बचाव पक्ष जहां दोषियों की कम उम्र की दुहाई दे रहा था, वहीं पीड़ित पक्ष का मानना था कि यदि ऐसा हुआ तो ये रिहा होकर समाज में दूसरे अपराधों को अंजाम देंेगे। पीड़िता के परिजन फैसले को ठीक तो बताते हैं लेकिन ऊंची अदालत जाने की बात भी करते हैं। हरियाणा में बेहद चर्चित इस मामले में अभियुक्त निकिता से एकतरफा प्यार करते हुए उस पर धर्म परिवर्तन कर शादी के लिये दबाव बना रहा था। वर्ष 2018 में भी अभियुक्त ने युवती का अपहरण किया था और इस मामले में मुकदमा भी दर्ज हुआ था। बाद में दोनों पक्षों में समझौता हो गया था। लेकिन अभियुक्त ने उसे तंग करना नहीं छोड़ा। 26 अक्तूबर, 2020 को उसने अपने मित्र रेहान की मदद से बीकॉम की छात्रा निकिता के अपहरण का प्रयास किया था और असफल रहने पर उसकी गोली मारकर हत्या कर दी थी। यह घटना सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई, जो न्याय के लिये बेहद उपयोगी साबित हुई। कोर्ट ने इसे देखने के साथ ही 55 गवाहों व अन्य सबूतों के आधार पर फैसला सुनाया। वहीं निकिता के परिजन कहते हैं कि इन पांच महीनों में न्याय दिलाने की हमारी लड़ाई अंजाम तक पहुंची है। ये पांच महीने हमने भय, असुरक्षा व दबाव में काटे हैं।

बहरहाल, पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश पर फास्ट ट्रैक कोर्ट में मामले की सुनवाई होने के बाद शीघ्र फैसला आना जहां जनता का भरोसा बढ़ाने वाला है, वहीं अपराधियों को डराने वाला भी है कि राज्य में कानून का राज है। सरकार ने इस मामले में जनाक्रोश को देखते हुए तत्परता दिखाई और एसआईटी को मामला सौंपा। टीम ने अगले पांच घंटे में मुख्य अपराधी तौसीफ को पकड़कर महज ग्यारह दिन में सात सौ पेज की चार्जशीट दाखिल कर दी थी। पहले आशंका थी कि अभियुक्त का राजनीतिक परिवार होने के कारण मामले को प्रभावित करने की कोशिश होगी, लेकिन ऐसा हो न पाया। कोर्ट ने तौसीफ व रेहान को हत्या, अपहरण और आपराधिक षड्यंत्र आदि धाराओं में दोषी करार दिया। बहरहाल, जरूरी है कि राज्य में अन्य अपराधों में भी पुलिस तत्परता से जांच करे और न्यायालयों से शीघ्र न्याय मिले। साथ ही राज्य में लगातार बढ़ते अपराधों पर नियंत्रण के लिये कानून व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने की जरूरत है। उन परिस्थितियों पर नियंत्रण करने की जरूरत है जो अपराध के लिये उर्वरा भूमि उपलब्ध कराती हैं। बृहस्पतिवार को अम्बाला में सरेआम दिनदहाड़े कार सवार दो युवकों की हत्या बताती है कि सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। कोशिश हो कि पुलिस का निगरानी तंत्र मजबूत हो, जांच तंत्र चुस्त-दुरुस्त हो तथा न्यायालय समय पर न्याय दें, ताकि जनता का कानून व्यवस्था पर भरोसा बढ़े। खासकर स्कूल-कालेजों के पास चाक-चौबंद व्यवस्था हो और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर शीघ्र अंकुश लगाया जाये। महिलाओं को सशक्त बनाने की भी जरूरत है। विलंब न्याय की अवधारणा को क्षति पहुंचाता है। अदालतों में मुकदमों का बोझ, फैसलों में देरी व कम सजा दर अपराधियों के हौसले बढ़ाती है। जरूरी है कि निचली अदालतें कुशलता व प्रभावी ढंग से काम करें। जघन्य मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट की प्रक्रिया उम्मीद बढ़ाने वाली है।  निस्संदेह, न्यायिक प्रणाली में जनता का विश्वास अंतत: न्याय देने की क्षमता पर ही निर्भर करता है।

 

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Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.आक्रोश के हाथ तकदीर की रेखा

राजनीतिक बगावत, मिलावट और झंझावात के बीच नगर निगम चुनाव की पेशगी में चरित्र पिघल रहा है। खरबूजे रंग बदल रहे हैं और कहीं-कहीं छुरी तथा खरबूजे के बीच यह देखा जा रहा है कौन किसके ऊपर गिरता है। यह ख्याल मन बहलाने के लिए अच्छा हो सकता है, लेकिन हिमाचल की राजनीति के लिए ‘यह दाग अच्छा नहीं’ है। नगर निगम चुनावों में  शहरों के दाग जनता देखे या न देखे, लेकिन दागदार होती सियासत के पर्दे हट रहे हैं। यही वजह है कि दो प्रमुख पार्टियां एक-दूसरे को लांछित करने के बजाय अपने-अपने बचाव के उपदेश में अपनों को ही समझा रही हैं। अगर मुख्यमंत्री को मंडी की ग्रामीण जनता को यह कहना पड़ रहा है कि पांच साल नगर निगम में रह कर देखो, तो कायदे से समझना होगा कि किसके हाथ में किसकी तकदीर की रेखा है। ये रेखाएं भ्रमित हैं और चुनाव चिन्हों पर खींची गई बिसात भी। सत्ता के तिलक में भाजपा और भाजपा के तिलक में प्रत्याशी हो सकते हैं,लेकिन ऐसी उम्मीदवारी ने अपने भीतर कई आक्रोश पैदा कर लिए। कांग्रेस की चर्चा उस समर्थन में हो सकती है, जो सत्ता के चौथे साल में विपक्ष की जगह बढ़ा देता है। ऐसे में कभी भाजपा की सबसे बड़ी खोज रहे अनिल शर्मा आज गले की हड्डी बने नजर आ रहे हैं, तो मंडी की सियासत में नई टेंशन का इजहार होता है।

 मंडी को धर्मपुर बनाने चले महेंद्र सिंह के सामने पंडित सुखराम की दीवार पर अनिल शर्मा का चेहरा चिढ़ा रहा है। इसमें दो राय नहीं कि अनिल शर्मा ऐसी जलालत भरी सियासत जी रहे हैं, जो मंडी में उनके प्रभाव को कम आंकना चाहती है। वर्तमान नगर निगम चुनावों में एक मुआयना यह भी है कि जीत के अंश में अपभ्रंश राजनीति के कितने छिलके उतरे। इसमें दो राय नहीं कि मंडी के सफर पर निकली सत्ता के सबसे प्रभावशाली हस्ती बने महेंद्र सिंह के चिन्ह और प्रतीक खड़े हैं, लेकिन पगडंडियां इतनी भी सीधी नहीं कि मंडी शहर अपनी प्रदक्षिणा में अतीत की कृतज्ञता भूल जाए। फैसला यह भी होगा कि मंडी शहर मुख्यमंत्री पद के ताज को पहनकर चलता है या गटर में पहुंची राजनीति को दुरुस्त करने का जरिया बन जाता है। जिस तरह अनिल के बोल महेंद्र सिंह को खोल रहे हैं, उससे भाजपा की मांद में अपनों का शिकार करने की वजह मिल जाती है। खैर इन परिस्थितियों में मुख्यमंत्री के सामने महेंद्र सिंह के प्रभाव की फिरौती किस तरह की कसौटी बनेगी, यह मंडी की जनता का सबसे बड़ा रहस्य है। चारों नगर निगमों में जातियां और वर्ग कुछ सहेज सकते हैं, लेकिन बागियों का एक अद्भुत समाज भी उभर रहा है। ये बागी खुले आसमान के नीचे आवाज बुलंद कर रहे हैं, जबकि पार्टियों के तंबुओं को बाहर की हवा का खतरा है। राजनीतिक संगठन कितने मजबूत हो सकते हैं, इसके तजुर्बे में आहें भरती मर्दानगी कहीं मान मनौअल पर आ गई। जाहिर तौर पर किसी भी पार्टी का कार्यकर्ता केवल चुनाव की दहलीज पर ही नेता बनता है और इस तरह देखें तो कांग्रेस-भाजपा के विक्षुब्ध अपने तौर पर नए नेता हैं।

पालमपुर शहर की खुशखबर ही उसकी राजनीतिक त्रासदी की तरह फिर मुखातिब है। भाजपा के रणनीतिकारों ने जो सपने बुने, उनके विध्वंस की मुनादी में कई योद्धा पार्टी से विमुख हो चुके हैं। ऐसे में यह गौर करना होगा कि क्या एक बार फिर नगर निगम चुनाव के बहाने पालमपुर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का राजनीतिक क्षेत्रफल खुद से लड़ रहा है। करीब आधी सीटों पर अगर टिकटों की कुर्बानियां ली गईं, तो अब चुनाव की गर्दन काटने को आतुर आक्रोश के जलवे हाजिर हैं। कल तक जिन संजीव सोनी, विजय भट्ट, किरण धीमान और संजय राठौर को जोड़ कर भाजपा पालमपुर विधानसभा को जीतना चाहती थी, आज यही पहिए उसकी सवारी नहीं कर रहे। सत्ता के लिए चुनाव चिन्ह की रसीद पर अगर मतैक्य नहीं, तो भाजपा के डेरे में सेंधमारी के लिए विपक्ष पूरी तरह दोषी नहीं होगा। कम से कम मंडी और पालमपुर में भाजपा की अंदरूनी कलह अपनी हद से बाहर हो चुकी है। कांग्रेस भी कमोबेश अपने कांटों से रू-ब-रू है, लेकिन सत्ता के बीच अनुशासनहीनता के ऐसे सबब, कार्य कुशलता तो नहीं हो सकते। अनिल शर्मा जो कुछ महेंद्र सिंह के संदर्भ में कह रहे हैं, उनसे अछूता जयराम ठाकुर मंत्रिमंडल नहीं हो सकता। माना वह भद्र राजनीति नहीं कर रहे, लेकिन अभद्र परंपरा के बीच भाजपा उन्हें अपनाने की भूल कर चुकी है। क्या राजनीति की तमाम गलतियों का प्रायश्चित हमेशा जनता ही करेगी और अगर यह नीयति है, तो फिर कठिन फैसलों के मध्य सारे भ्रम मतदान में परिवर्तित हो सकते हैं।

2.बंदिशों में जीवन की निगरानी

इस बार कोरोना से कहीं अधिक चिंता उन दुश्वारियों की भी है, जो पिछले एक साल की मरम्मत में इनसान की जिल्लत बन गई। ऐसे में राष्ट्रीय सूचनाओं और संदर्भों को चाट रहा कोरोेना अगर हिमाचल की सियाही में फिर सख्त कदमों की हिदायत लिख दे, तो इस सूबेदारी के आलम में तबाही के मंजर को रोक पाना मुश्किल होगा। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के द्वारा ऐसे संकेतों का प्रेषित होना अब स्वाभाविक लगने लगा है, क्योंकि राज्य दर राज्य द्वार बंद होने लगे हैं और पड़ोसी पंजाब को देखें तो हिमाचल को बढ़ते मामलों की शूर्पणखा को पहचान लेना चाहिए। फिर एक्टिव मामलों में लगातार हो रहा इजाफा अगर हर दिन औसतन ढाई सौ भी जोड़ता गया, तो लॉकडाउन की स्थिति से हमें कौन बचाएगा। प्रदंश में कोविड से मरने वालों का आंकड़ा 1014 तक पहुंचकर सुन्न नहीं हो रहा, बल्कि पिछले कुछ दिनों से हर रोज नर कंकाल पहनकर बता रहा है कि संख्या दो-दो मृतक चुनकर बढ़ रही है। यह प्रश्न महज 1654 एक्टिव मरीज होने का नहीं, बल्कि फिर से कितनी चारपाइयां बिछाकर खुद से पूछोगे कि इस बार इंतजाम पहले से बेहतर क्यों नहीं हुआ। आश्चर्य यह कि कोरोना अब सियासी खूंटे पर लटका है। कभी इसे उतार कर सियासी धमाचौकड़ी आगे बढ़ जाती है और जब वक्त पर इसके नाखून नजर आते हैं, तो फिर से कसरतें भयभीत मंजिलों को गिनते हुए कभी बाजार, कभी व्यापार या कभी स्कूल-कालेज के द्वार को बंद करने की नौबत तक आ जाती हैं।

 अभी ज्यादा समय नहीं हुआ जब राजनीतिक मंच हर गांव में अपनी जीत का बीड़ा उठाए ये भूल गए थे कि उस दौर में कोरोना के खिलाफ कुछ हिदायतें भी रही थीं। हमने तब यही सुना कि किसके पलड़े में पूरा प्रदेश झुक गया। ऐसे में हम यह क्यों न खोजें कि कोरोना के हर बढ़ते जख्म का ‘सर्वश्रेष्ठ’ कारण राजनीति का निरंकुश व्यवहार है। ऐसे में प्रदेश के चार नगर निगमों की दहलीज पर खड़ी चुनौती में कोरोना शरीक नहीं होगा, इसका क्या इंतजाम है। जिस तरह नामांकन पत्र दाखिल हुए हैं, उसके पीछे सियासी कारवां खड़ा है। पार्टी चुनाव चिन्हों पर दांव पर लगी राजनीतिक प्रतिष्ठा के सदके जो पदचाप सुनाई दे रही है, उसे कैसे नजरअंदाज करेंगे। चुनाव प्रचार की व्यापकता को रोकने की नैतिकता तो किसी दल में नहीं रहेगी और इसी के साथ पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया की अनिवार्यता में शरीक सरकारी अमला कहां तक खुद को अलग व सुरक्षित रख सकता है। यह एक अलग विवरण हैं कि ऐसे मुकाम पर प्रदेश के कितने कर्मचारी पिछले एक साल से अपने दायित्व के कारण  कोरोना पॉजिटिव हुए। मंडी शिवरात्रि या अब तक हुए मेलों की रौनक में सुरक्षा के कितने मानदंड अपनाए गए या वर्तमान परिस्थितियों में किस कद्र अवहेलना हुई। जो मैकेनिजम बना, वह भी ढह गया क्योंकि देश अब चुनाव के लिए जिंदा रहना चाहता है। हिमाचल का सबसे बड़ा संदेश अगर कुछ दिनों तक पंचायती राज संस्थाओं के बहाने जीत व हार का रहा, तो यह दौर फिर सियासत को भरकर यही माप रहा है कि इस बार सेहरा किसके सिर पर सजेगा। पड़ोसी पंजाब में रात्रि नौ बजे से सुबह पांच बजे तक कर्फ्यू ने एक ओर कोरोना के खिलाफ सुरक्षा चक्र बढ़ाया है, तो दूसरी ओर फिर आर्थिकी की नस कटने का डर व्याप्त हो रहा है। यह इसलिए भी कि पेट्रोल-डीजल के दामों का आतताई रुख इस वक्त विध्वंस के राग गा रहा है।

 हिमाचल में टैक्सी मालिकों की हड़ताल को अर्थहीन नहीं किया जा सकता और न ही निजी बसों पर फहराती काली झंडियों का सबूत प्रोत्साहित कर रहा है। सरकार के अपने खजाने खाली हैं और विकल्प की नाउम्मीद राहों पर कड़े फैसलों की अनिवार्यता दर्ज है। ऐसे में राष्ट्र के माहौल में गुजरा साल सिर्फ यादें नहीं, सिसकियों के बीच उजड़ती दरख्वास्तें भी हैं। अब तो कोरोना की आहट भी कितने चूल्हों को ठंडा करने की सजा सरीखी है, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। हिमाचल में ही अगर कोरोना काल ने बैंकों का एनपीए 710 करोड़ बढ़ गया, तो इस दर्द का उल्लेख जिन्न बनकर कितने व्यवसायियों को उजाड़ रहा है, इसे भी समझना होगा। बहरहाल फिर से नौबत सख्त निर्देशों के अनुपालन की एक नई सीमा तय करेगी। कम से कम एक साल के अनुभव की रगड़ यह बताती है कि तकलीफ के पुराने पन्ने पलटने की मजबूरी को नए परिप्रेक्ष्य में देखा जाए।  यानी बाजार, व्यापार, सरकार और राजनीतिक दारोमदार चलाते हुए अंततः जनता को ही सीखना है कि बंदिशें अभी जीवन की निगरानी को मोहलत नहीं दे रहीं। राजनीतिक गतिविधियों पर चाहे सरकार के फैसले धीमी गति से आएं, लेकिन हमें अपने तौर पर धार्मिक, सांस्कृतिक, पारंपरिक, सामुदायिक तथा पारिवारिक समारोहों के पांव में कुछ बेडि़यां पहनाए रखनी हैं।

3.बांग्लादेश के पचास वर्ष

बांग्लादेश निर्माण की पचासवीं वर्षगांठ भारत के साथ ही पूरे दक्षिण एशिया के लिए खुशी का क्षण है। सबसे ज्यादा महत्व इस बात का है कि बांग्लादेश ने ऐसे अहम मौके पर भारत को जिस तरह याद किया है, उसका प्रभाव पूरे क्षेत्र की शांति व तरक्की की बुनियाद मजबूत करेगा। दक्षिण एशिया में यह एक ऐसा देश है, जो कम समय में खुद को एक मुकाम पर पहुंचाकर अपनी सार्थकता सिद्ध कर चुका है। न केवल राजनीतिक, सामाजिक, बल्कि आर्थिक रूप से भी यह दक्षिण एशिया की एक शान है। वह हमारा ऐसा पड़ोसी है, जिसने कभी भारत के प्रति दुर्भाव का प्रदर्शन नहीं किया है। चीन, पाकिस्तान की जुगलबंदी हम जानते हैं और इधर के वर्षों में जब हम नेपाल को भी देखते हैं, तब हमें बांग्लादेश का महत्व ज्यादा बेहतर ढंग से समझ में आता है। शुक्रवार को ढाका के परेड ग्राउंड पर यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ऐतिहासिक घड़ी को गर्व के क्षण बताया है, तो कतई आश्चर्य नहीं।
बांग्लादेश हमारा ऐसा दोस्त पड़ोसी है, जिसके बारे में प्रधानमंत्री मोदी एकाधिक बार ‘पड़ोसी पहले’ की भावना का इजहार कर चुके हैं। सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक संबंधों के आधार पर बांग्लादेश भारत के ऐसे निकटतम सहयोगियों में शुमार है, जो भारतीय हितों के प्रति सदा सचेत रहे हैं। आज पूर्वोत्तर राज्यों में जो शांति है, उसमें भी बांग्लादेश का बड़ा योगदान है। महत्व तो इसका भी है कि बांग्लादेश के बुलावे पर महामारी के समय में अपनी पहली विदेश यात्रा पर प्रधानमंत्री वहां गए हैं। इस यात्रा का फल पूरे क्षेत्र को मिलना चाहिए। दोनों देशों के बीच जो कुछ विवाद हैं, उन्हें जल्द सुलझाने के साथ ही नई दिल्ली और ढाका को विकास अभियान में जुट जाना होगा। बांग्लादेश को 50 वर्ष हो गए, तो आजाद भारत भी अपनी 75वीं वर्षगांठ की ओर बढ़ रहा है। गरीबी और सांप्रदायिक हिंसा ने दोनों देशों को समान रूप से चिंतित कर रखा है, मिलकर प्रयास करने चाहिए, ताकि दोनों देशों में व्याप्त बड़ी कमियों को जल्द से जल्द अलविदा कहा जा सके। बांग्लादेश की असली मुक्ति और भारत की असली आजादी समेकित विकास की तेज राह पर ही संभव है। प्रधानमंत्री ने अपनी यात्रा के अवसर पर बांग्लादेशी अखबार केलिए जो लेख लिखा है, उसे भी याद किया जाएगा। ध्यान रहे, अपने-अपने घरेलू मोर्चे पर अशिक्षा, कट्टरता, सांप्रदायिक हिंसा में भी हमने बहुत कुछ गंवाया है। वाकई, यदि बांग्लादेश के संस्थापक बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की हत्या न हुई होती, तो आज दक्षिण एशिया की तस्वीर अलहदा होती। बंगबंधु उस दर्द को समग्रता में समझते थे, जिससे गुजरकर दुनिया के नक्शे पर बांग्लादेश उभरा। उनके असमय जाने से देश कुछ समय के लिए भटकता दिखा, लेकिन आज वह विकास के लिए जिस तरह प्रतिबद्ध है, उसकी मिसाल पाकिस्तान में भी दी जाती है। प्रधानमंत्री ने सही इशारा किया है कि दोनों देश एक उन्नत एकीकृत आर्थिक क्षेत्र का निर्माण कर सकते हैं, जिससे दोनों के उद्यमों को तेजी से आगे बढ़ने की ताकत मिलेगी। जो देश दहशतगर्दी के पक्ष में रहना चाहते हैं, उन्हें छोड़ आगे बढ़ने का समय आ गया है। अब सार्क या दक्षेस को ज्यादा घसीटा नहीं जा सकता, क्योंकि अभावग्रस्त लोग इंतजार नहीं कर सकते। भारत और बांग्लादेश की मित्रता का भविष्य उज्ज्वल

4. निकिता को न्याय

शीघ्र फैसले से जनता का भरोसा बढ़ेगा

फरीदाबाद के बहुचर्चित निकिता तोमर हत्याकांड में ठीक पांच माह बाद फैसला आने व अपराधियों को सजा मिलने से लोगों का कानून व्यवस्था पर भरोसा बढ़ेगा। यह संयोग ही है कि 26 अक्तूबर को निकिता की हत्या हुई थी और 26 मार्च को ही अभियुक्तों को सजा सुनायी गयी। फास्ट ट्रैक अदालत ने शुक्रवार को दोनों दोषियों तौसीफ और रेहान को उम्रकैद की सजा सुनायी और बीस-बीस हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। यह तथ्य देश की न्यायिक प्रक्रिया पर जनता का भरोसा बढ़ाने वाला ही है कि मामले में 151 दिन में न्याय हुआ। हालांकि, मृतक के परिजन दोषियों को मौत की सजा दिये जाने की मांग कर रहे थे। बचाव पक्ष जहां दोषियों की कम उम्र की दुहाई दे रहा था, वहीं पीड़ित पक्ष का मानना था कि यदि ऐसा हुआ तो ये रिहा होकर समाज में दूसरे अपराधों को अंजाम देंेगे। पीड़िता के परिजन फैसले को ठीक तो बताते हैं लेकिन ऊंची अदालत जाने की बात भी करते हैं। हरियाणा में बेहद चर्चित इस मामले में अभियुक्त निकिता से एकतरफा प्यार करते हुए उस पर धर्म परिवर्तन कर शादी के लिये दबाव बना रहा था। वर्ष 2018 में भी अभियुक्त ने युवती का अपहरण किया था और इस मामले में मुकदमा भी दर्ज हुआ था। बाद में दोनों पक्षों में समझौता हो गया था। लेकिन अभियुक्त ने उसे तंग करना नहीं छोड़ा। 26 अक्तूबर, 2020 को उसने अपने मित्र रेहान की मदद से बीकॉम की छात्रा निकिता के अपहरण का प्रयास किया था और असफल रहने पर उसकी गोली मारकर हत्या कर दी थी। यह घटना सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई, जो न्याय के लिये बेहद उपयोगी साबित हुई। कोर्ट ने इसे देखने के साथ ही 55 गवाहों व अन्य सबूतों के आधार पर फैसला सुनाया। वहीं निकिता के परिजन कहते हैं कि इन पांच महीनों में न्याय दिलाने की हमारी लड़ाई अंजाम तक पहुंची है। ये पांच महीने हमने भय, असुरक्षा व दबाव में काटे हैं।

बहरहाल, पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश पर फास्ट ट्रैक कोर्ट में मामले की सुनवाई होने के बाद शीघ्र फैसला आना जहां जनता का भरोसा बढ़ाने वाला है, वहीं अपराधियों को डराने वाला भी है कि राज्य में कानून का राज है। सरकार ने इस मामले में जनाक्रोश को देखते हुए तत्परता दिखाई और एसआईटी को मामला सौंपा। टीम ने अगले पांच घंटे में मुख्य अपराधी तौसीफ को पकड़कर महज ग्यारह दिन में सात सौ पेज की चार्जशीट दाखिल कर दी थी। पहले आशंका थी कि अभियुक्त का राजनीतिक परिवार होने के कारण मामले को प्रभावित करने की कोशिश होगी, लेकिन ऐसा हो न पाया। कोर्ट ने तौसीफ व रेहान को हत्या, अपहरण और आपराधिक षड्यंत्र आदि धाराओं में दोषी करार दिया। बहरहाल, जरूरी है कि राज्य में अन्य अपराधों में भी पुलिस तत्परता से जांच करे और न्यायालयों से शीघ्र न्याय मिले। साथ ही राज्य में लगातार बढ़ते अपराधों पर नियंत्रण के लिये कानून व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने की जरूरत है। उन परिस्थितियों पर नियंत्रण करने की जरूरत है जो अपराध के लिये उर्वरा भूमि उपलब्ध कराती हैं। बृहस्पतिवार को अम्बाला में सरेआम दिनदहाड़े कार सवार दो युवकों की हत्या बताती है कि सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। कोशिश हो कि पुलिस का निगरानी तंत्र मजबूत हो, जांच तंत्र चुस्त-दुरुस्त हो तथा न्यायालय समय पर न्याय दें, ताकि जनता का कानून व्यवस्था पर भरोसा बढ़े। खासकर स्कूल-कालेजों के पास चाक-चौबंद व्यवस्था हो और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर शीघ्र अंकुश लगाया जाये। महिलाओं को सशक्त बनाने की भी जरूरत है। विलंब न्याय की अवधारणा को क्षति पहुंचाता है। अदालतों में मुकदमों का बोझ, फैसलों में देरी व कम सजा दर अपराधियों के हौसले बढ़ाती है। जरूरी है कि निचली अदालतें कुशलता व प्रभावी ढंग से काम करें। जघन्य मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट की प्रक्रिया उम्मीद बढ़ाने वाली है।  निस्संदेह, न्यायिक प्रणाली में जनता का विश्वास अंतत: न्याय देने की क्षमता पर ही निर्भर करता है।

 

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Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.आक्रोश के हाथ तकदीर की रेखा

राजनीतिक बगावत, मिलावट और झंझावात के बीच नगर निगम चुनाव की पेशगी में चरित्र पिघल रहा है। खरबूजे रंग बदल रहे हैं और कहीं-कहीं छुरी तथा खरबूजे के बीच यह देखा जा रहा है कौन किसके ऊपर गिरता है। यह ख्याल मन बहलाने के लिए अच्छा हो सकता है, लेकिन हिमाचल की राजनीति के लिए ‘यह दाग अच्छा नहीं’ है। नगर निगम चुनावों में  शहरों के दाग जनता देखे या न देखे, लेकिन दागदार होती सियासत के पर्दे हट रहे हैं। यही वजह है कि दो प्रमुख पार्टियां एक-दूसरे को लांछित करने के बजाय अपने-अपने बचाव के उपदेश में अपनों को ही समझा रही हैं। अगर मुख्यमंत्री को मंडी की ग्रामीण जनता को यह कहना पड़ रहा है कि पांच साल नगर निगम में रह कर देखो, तो कायदे से समझना होगा कि किसके हाथ में किसकी तकदीर की रेखा है। ये रेखाएं भ्रमित हैं और चुनाव चिन्हों पर खींची गई बिसात भी। सत्ता के तिलक में भाजपा और भाजपा के तिलक में प्रत्याशी हो सकते हैं,लेकिन ऐसी उम्मीदवारी ने अपने भीतर कई आक्रोश पैदा कर लिए। कांग्रेस की चर्चा उस समर्थन में हो सकती है, जो सत्ता के चौथे साल में विपक्ष की जगह बढ़ा देता है। ऐसे में कभी भाजपा की सबसे बड़ी खोज रहे अनिल शर्मा आज गले की हड्डी बने नजर आ रहे हैं, तो मंडी की सियासत में नई टेंशन का इजहार होता है।

 मंडी को धर्मपुर बनाने चले महेंद्र सिंह के सामने पंडित सुखराम की दीवार पर अनिल शर्मा का चेहरा चिढ़ा रहा है। इसमें दो राय नहीं कि अनिल शर्मा ऐसी जलालत भरी सियासत जी रहे हैं, जो मंडी में उनके प्रभाव को कम आंकना चाहती है। वर्तमान नगर निगम चुनावों में एक मुआयना यह भी है कि जीत के अंश में अपभ्रंश राजनीति के कितने छिलके उतरे। इसमें दो राय नहीं कि मंडी के सफर पर निकली सत्ता के सबसे प्रभावशाली हस्ती बने महेंद्र सिंह के चिन्ह और प्रतीक खड़े हैं, लेकिन पगडंडियां इतनी भी सीधी नहीं कि मंडी शहर अपनी प्रदक्षिणा में अतीत की कृतज्ञता भूल जाए। फैसला यह भी होगा कि मंडी शहर मुख्यमंत्री पद के ताज को पहनकर चलता है या गटर में पहुंची राजनीति को दुरुस्त करने का जरिया बन जाता है। जिस तरह अनिल के बोल महेंद्र सिंह को खोल रहे हैं, उससे भाजपा की मांद में अपनों का शिकार करने की वजह मिल जाती है। खैर इन परिस्थितियों में मुख्यमंत्री के सामने महेंद्र सिंह के प्रभाव की फिरौती किस तरह की कसौटी बनेगी, यह मंडी की जनता का सबसे बड़ा रहस्य है। चारों नगर निगमों में जातियां और वर्ग कुछ सहेज सकते हैं, लेकिन बागियों का एक अद्भुत समाज भी उभर रहा है। ये बागी खुले आसमान के नीचे आवाज बुलंद कर रहे हैं, जबकि पार्टियों के तंबुओं को बाहर की हवा का खतरा है। राजनीतिक संगठन कितने मजबूत हो सकते हैं, इसके तजुर्बे में आहें भरती मर्दानगी कहीं मान मनौअल पर आ गई। जाहिर तौर पर किसी भी पार्टी का कार्यकर्ता केवल चुनाव की दहलीज पर ही नेता बनता है और इस तरह देखें तो कांग्रेस-भाजपा के विक्षुब्ध अपने तौर पर नए नेता हैं।

पालमपुर शहर की खुशखबर ही उसकी राजनीतिक त्रासदी की तरह फिर मुखातिब है। भाजपा के रणनीतिकारों ने जो सपने बुने, उनके विध्वंस की मुनादी में कई योद्धा पार्टी से विमुख हो चुके हैं। ऐसे में यह गौर करना होगा कि क्या एक बार फिर नगर निगम चुनाव के बहाने पालमपुर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का राजनीतिक क्षेत्रफल खुद से लड़ रहा है। करीब आधी सीटों पर अगर टिकटों की कुर्बानियां ली गईं, तो अब चुनाव की गर्दन काटने को आतुर आक्रोश के जलवे हाजिर हैं। कल तक जिन संजीव सोनी, विजय भट्ट, किरण धीमान और संजय राठौर को जोड़ कर भाजपा पालमपुर विधानसभा को जीतना चाहती थी, आज यही पहिए उसकी सवारी नहीं कर रहे। सत्ता के लिए चुनाव चिन्ह की रसीद पर अगर मतैक्य नहीं, तो भाजपा के डेरे में सेंधमारी के लिए विपक्ष पूरी तरह दोषी नहीं होगा। कम से कम मंडी और पालमपुर में भाजपा की अंदरूनी कलह अपनी हद से बाहर हो चुकी है। कांग्रेस भी कमोबेश अपने कांटों से रू-ब-रू है, लेकिन सत्ता के बीच अनुशासनहीनता के ऐसे सबब, कार्य कुशलता तो नहीं हो सकते। अनिल शर्मा जो कुछ महेंद्र सिंह के संदर्भ में कह रहे हैं, उनसे अछूता जयराम ठाकुर मंत्रिमंडल नहीं हो सकता। माना वह भद्र राजनीति नहीं कर रहे, लेकिन अभद्र परंपरा के बीच भाजपा उन्हें अपनाने की भूल कर चुकी है। क्या राजनीति की तमाम गलतियों का प्रायश्चित हमेशा जनता ही करेगी और अगर यह नीयति है, तो फिर कठिन फैसलों के मध्य सारे भ्रम मतदान में परिवर्तित हो सकते हैं।

2.बंदिशों में जीवन की निगरानी

इस बार कोरोना से कहीं अधिक चिंता उन दुश्वारियों की भी है, जो पिछले एक साल की मरम्मत में इनसान की जिल्लत बन गई। ऐसे में राष्ट्रीय सूचनाओं और संदर्भों को चाट रहा कोरोेना अगर हिमाचल की सियाही में फिर सख्त कदमों की हिदायत लिख दे, तो इस सूबेदारी के आलम में तबाही के मंजर को रोक पाना मुश्किल होगा। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के द्वारा ऐसे संकेतों का प्रेषित होना अब स्वाभाविक लगने लगा है, क्योंकि राज्य दर राज्य द्वार बंद होने लगे हैं और पड़ोसी पंजाब को देखें तो हिमाचल को बढ़ते मामलों की शूर्पणखा को पहचान लेना चाहिए। फिर एक्टिव मामलों में लगातार हो रहा इजाफा अगर हर दिन औसतन ढाई सौ भी जोड़ता गया, तो लॉकडाउन की स्थिति से हमें कौन बचाएगा। प्रदंश में कोविड से मरने वालों का आंकड़ा 1014 तक पहुंचकर सुन्न नहीं हो रहा, बल्कि पिछले कुछ दिनों से हर रोज नर कंकाल पहनकर बता रहा है कि संख्या दो-दो मृतक चुनकर बढ़ रही है। यह प्रश्न महज 1654 एक्टिव मरीज होने का नहीं, बल्कि फिर से कितनी चारपाइयां बिछाकर खुद से पूछोगे कि इस बार इंतजाम पहले से बेहतर क्यों नहीं हुआ। आश्चर्य यह कि कोरोना अब सियासी खूंटे पर लटका है। कभी इसे उतार कर सियासी धमाचौकड़ी आगे बढ़ जाती है और जब वक्त पर इसके नाखून नजर आते हैं, तो फिर से कसरतें भयभीत मंजिलों को गिनते हुए कभी बाजार, कभी व्यापार या कभी स्कूल-कालेज के द्वार को बंद करने की नौबत तक आ जाती हैं।

 अभी ज्यादा समय नहीं हुआ जब राजनीतिक मंच हर गांव में अपनी जीत का बीड़ा उठाए ये भूल गए थे कि उस दौर में कोरोना के खिलाफ कुछ हिदायतें भी रही थीं। हमने तब यही सुना कि किसके पलड़े में पूरा प्रदेश झुक गया। ऐसे में हम यह क्यों न खोजें कि कोरोना के हर बढ़ते जख्म का ‘सर्वश्रेष्ठ’ कारण राजनीति का निरंकुश व्यवहार है। ऐसे में प्रदेश के चार नगर निगमों की दहलीज पर खड़ी चुनौती में कोरोना शरीक नहीं होगा, इसका क्या इंतजाम है। जिस तरह नामांकन पत्र दाखिल हुए हैं, उसके पीछे सियासी कारवां खड़ा है। पार्टी चुनाव चिन्हों पर दांव पर लगी राजनीतिक प्रतिष्ठा के सदके जो पदचाप सुनाई दे रही है, उसे कैसे नजरअंदाज करेंगे। चुनाव प्रचार की व्यापकता को रोकने की नैतिकता तो किसी दल में नहीं रहेगी और इसी के साथ पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया की अनिवार्यता में शरीक सरकारी अमला कहां तक खुद को अलग व सुरक्षित रख सकता है। यह एक अलग विवरण हैं कि ऐसे मुकाम पर प्रदेश के कितने कर्मचारी पिछले एक साल से अपने दायित्व के कारण  कोरोना पॉजिटिव हुए। मंडी शिवरात्रि या अब तक हुए मेलों की रौनक में सुरक्षा के कितने मानदंड अपनाए गए या वर्तमान परिस्थितियों में किस कद्र अवहेलना हुई। जो मैकेनिजम बना, वह भी ढह गया क्योंकि देश अब चुनाव के लिए जिंदा रहना चाहता है। हिमाचल का सबसे बड़ा संदेश अगर कुछ दिनों तक पंचायती राज संस्थाओं के बहाने जीत व हार का रहा, तो यह दौर फिर सियासत को भरकर यही माप रहा है कि इस बार सेहरा किसके सिर पर सजेगा। पड़ोसी पंजाब में रात्रि नौ बजे से सुबह पांच बजे तक कर्फ्यू ने एक ओर कोरोना के खिलाफ सुरक्षा चक्र बढ़ाया है, तो दूसरी ओर फिर आर्थिकी की नस कटने का डर व्याप्त हो रहा है। यह इसलिए भी कि पेट्रोल-डीजल के दामों का आतताई रुख इस वक्त विध्वंस के राग गा रहा है।

 हिमाचल में टैक्सी मालिकों की हड़ताल को अर्थहीन नहीं किया जा सकता और न ही निजी बसों पर फहराती काली झंडियों का सबूत प्रोत्साहित कर रहा है। सरकार के अपने खजाने खाली हैं और विकल्प की नाउम्मीद राहों पर कड़े फैसलों की अनिवार्यता दर्ज है। ऐसे में राष्ट्र के माहौल में गुजरा साल सिर्फ यादें नहीं, सिसकियों के बीच उजड़ती दरख्वास्तें भी हैं। अब तो कोरोना की आहट भी कितने चूल्हों को ठंडा करने की सजा सरीखी है, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। हिमाचल में ही अगर कोरोना काल ने बैंकों का एनपीए 710 करोड़ बढ़ गया, तो इस दर्द का उल्लेख जिन्न बनकर कितने व्यवसायियों को उजाड़ रहा है, इसे भी समझना होगा। बहरहाल फिर से नौबत सख्त निर्देशों के अनुपालन की एक नई सीमा तय करेगी। कम से कम एक साल के अनुभव की रगड़ यह बताती है कि तकलीफ के पुराने पन्ने पलटने की मजबूरी को नए परिप्रेक्ष्य में देखा जाए।  यानी बाजार, व्यापार, सरकार और राजनीतिक दारोमदार चलाते हुए अंततः जनता को ही सीखना है कि बंदिशें अभी जीवन की निगरानी को मोहलत नहीं दे रहीं। राजनीतिक गतिविधियों पर चाहे सरकार के फैसले धीमी गति से आएं, लेकिन हमें अपने तौर पर धार्मिक, सांस्कृतिक, पारंपरिक, सामुदायिक तथा पारिवारिक समारोहों के पांव में कुछ बेडि़यां पहनाए रखनी हैं।

3.बांग्लादेश के पचास वर्ष

बांग्लादेश निर्माण की पचासवीं वर्षगांठ भारत के साथ ही पूरे दक्षिण एशिया के लिए खुशी का क्षण है। सबसे ज्यादा महत्व इस बात का है कि बांग्लादेश ने ऐसे अहम मौके पर भारत को जिस तरह याद किया है, उसका प्रभाव पूरे क्षेत्र की शांति व तरक्की की बुनियाद मजबूत करेगा। दक्षिण एशिया में यह एक ऐसा देश है, जो कम समय में खुद को एक मुकाम पर पहुंचाकर अपनी सार्थकता सिद्ध कर चुका है। न केवल राजनीतिक, सामाजिक, बल्कि आर्थिक रूप से भी यह दक्षिण एशिया की एक शान है। वह हमारा ऐसा पड़ोसी है, जिसने कभी भारत के प्रति दुर्भाव का प्रदर्शन नहीं किया है। चीन, पाकिस्तान की जुगलबंदी हम जानते हैं और इधर के वर्षों में जब हम नेपाल को भी देखते हैं, तब हमें बांग्लादेश का महत्व ज्यादा बेहतर ढंग से समझ में आता है। शुक्रवार को ढाका के परेड ग्राउंड पर यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ऐतिहासिक घड़ी को गर्व के क्षण बताया है, तो कतई आश्चर्य नहीं।
बांग्लादेश हमारा ऐसा दोस्त पड़ोसी है, जिसके बारे में प्रधानमंत्री मोदी एकाधिक बार ‘पड़ोसी पहले’ की भावना का इजहार कर चुके हैं। सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक संबंधों के आधार पर बांग्लादेश भारत के ऐसे निकटतम सहयोगियों में शुमार है, जो भारतीय हितों के प्रति सदा सचेत रहे हैं। आज पूर्वोत्तर राज्यों में जो शांति है, उसमें भी बांग्लादेश का बड़ा योगदान है। महत्व तो इसका भी है कि बांग्लादेश के बुलावे पर महामारी के समय में अपनी पहली विदेश यात्रा पर प्रधानमंत्री वहां गए हैं। इस यात्रा का फल पूरे क्षेत्र को मिलना चाहिए। दोनों देशों के बीच जो कुछ विवाद हैं, उन्हें जल्द सुलझाने के साथ ही नई दिल्ली और ढाका को विकास अभियान में जुट जाना होगा। बांग्लादेश को 50 वर्ष हो गए, तो आजाद भारत भी अपनी 75वीं वर्षगांठ की ओर बढ़ रहा है। गरीबी और सांप्रदायिक हिंसा ने दोनों देशों को समान रूप से चिंतित कर रखा है, मिलकर प्रयास करने चाहिए, ताकि दोनों देशों में व्याप्त बड़ी कमियों को जल्द से जल्द अलविदा कहा जा सके। बांग्लादेश की असली मुक्ति और भारत की असली आजादी समेकित विकास की तेज राह पर ही संभव है। प्रधानमंत्री ने अपनी यात्रा के अवसर पर बांग्लादेशी अखबार केलिए जो लेख लिखा है, उसे भी याद किया जाएगा। ध्यान रहे, अपने-अपने घरेलू मोर्चे पर अशिक्षा, कट्टरता, सांप्रदायिक हिंसा में भी हमने बहुत कुछ गंवाया है। वाकई, यदि बांग्लादेश के संस्थापक बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की हत्या न हुई होती, तो आज दक्षिण एशिया की तस्वीर अलहदा होती। बंगबंधु उस दर्द को समग्रता में समझते थे, जिससे गुजरकर दुनिया के नक्शे पर बांग्लादेश उभरा। उनके असमय जाने से देश कुछ समय के लिए भटकता दिखा, लेकिन आज वह विकास के लिए जिस तरह प्रतिबद्ध है, उसकी मिसाल पाकिस्तान में भी दी जाती है। प्रधानमंत्री ने सही इशारा किया है कि दोनों देश एक उन्नत एकीकृत आर्थिक क्षेत्र का निर्माण कर सकते हैं, जिससे दोनों के उद्यमों को तेजी से आगे बढ़ने की ताकत मिलेगी। जो देश दहशतगर्दी के पक्ष में रहना चाहते हैं, उन्हें छोड़ आगे बढ़ने का समय आ गया है। अब सार्क या दक्षेस को ज्यादा घसीटा नहीं जा सकता, क्योंकि अभावग्रस्त लोग इंतजार नहीं कर सकते। भारत और बांग्लादेश की मित्रता का भविष्य उज्ज्वल

4. निकिता को न्याय

शीघ्र फैसले से जनता का भरोसा बढ़ेगा

फरीदाबाद के बहुचर्चित निकिता तोमर हत्याकांड में ठीक पांच माह बाद फैसला आने व अपराधियों को सजा मिलने से लोगों का कानून व्यवस्था पर भरोसा बढ़ेगा। यह संयोग ही है कि 26 अक्तूबर को निकिता की हत्या हुई थी और 26 मार्च को ही अभियुक्तों को सजा सुनायी गयी। फास्ट ट्रैक अदालत ने शुक्रवार को दोनों दोषियों तौसीफ और रेहान को उम्रकैद की सजा सुनायी और बीस-बीस हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। यह तथ्य देश की न्यायिक प्रक्रिया पर जनता का भरोसा बढ़ाने वाला ही है कि मामले में 151 दिन में न्याय हुआ। हालांकि, मृतक के परिजन दोषियों को मौत की सजा दिये जाने की मांग कर रहे थे। बचाव पक्ष जहां दोषियों की कम उम्र की दुहाई दे रहा था, वहीं पीड़ित पक्ष का मानना था कि यदि ऐसा हुआ तो ये रिहा होकर समाज में दूसरे अपराधों को अंजाम देंेगे। पीड़िता के परिजन फैसले को ठीक तो बताते हैं लेकिन ऊंची अदालत जाने की बात भी करते हैं। हरियाणा में बेहद चर्चित इस मामले में अभियुक्त निकिता से एकतरफा प्यार करते हुए उस पर धर्म परिवर्तन कर शादी के लिये दबाव बना रहा था। वर्ष 2018 में भी अभियुक्त ने युवती का अपहरण किया था और इस मामले में मुकदमा भी दर्ज हुआ था। बाद में दोनों पक्षों में समझौता हो गया था। लेकिन अभियुक्त ने उसे तंग करना नहीं छोड़ा। 26 अक्तूबर, 2020 को उसने अपने मित्र रेहान की मदद से बीकॉम की छात्रा निकिता के अपहरण का प्रयास किया था और असफल रहने पर उसकी गोली मारकर हत्या कर दी थी। यह घटना सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई, जो न्याय के लिये बेहद उपयोगी साबित हुई। कोर्ट ने इसे देखने के साथ ही 55 गवाहों व अन्य सबूतों के आधार पर फैसला सुनाया। वहीं निकिता के परिजन कहते हैं कि इन पांच महीनों में न्याय दिलाने की हमारी लड़ाई अंजाम तक पहुंची है। ये पांच महीने हमने भय, असुरक्षा व दबाव में काटे हैं।

बहरहाल, पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश पर फास्ट ट्रैक कोर्ट में मामले की सुनवाई होने के बाद शीघ्र फैसला आना जहां जनता का भरोसा बढ़ाने वाला है, वहीं अपराधियों को डराने वाला भी है कि राज्य में कानून का राज है। सरकार ने इस मामले में जनाक्रोश को देखते हुए तत्परता दिखाई और एसआईटी को मामला सौंपा। टीम ने अगले पांच घंटे में मुख्य अपराधी तौसीफ को पकड़कर महज ग्यारह दिन में सात सौ पेज की चार्जशीट दाखिल कर दी थी। पहले आशंका थी कि अभियुक्त का राजनीतिक परिवार होने के कारण मामले को प्रभावित करने की कोशिश होगी, लेकिन ऐसा हो न पाया। कोर्ट ने तौसीफ व रेहान को हत्या, अपहरण और आपराधिक षड्यंत्र आदि धाराओं में दोषी करार दिया। बहरहाल, जरूरी है कि राज्य में अन्य अपराधों में भी पुलिस तत्परता से जांच करे और न्यायालयों से शीघ्र न्याय मिले। साथ ही राज्य में लगातार बढ़ते अपराधों पर नियंत्रण के लिये कानून व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने की जरूरत है। उन परिस्थितियों पर नियंत्रण करने की जरूरत है जो अपराध के लिये उर्वरा भूमि उपलब्ध कराती हैं। बृहस्पतिवार को अम्बाला में सरेआम दिनदहाड़े कार सवार दो युवकों की हत्या बताती है कि सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। कोशिश हो कि पुलिस का निगरानी तंत्र मजबूत हो, जांच तंत्र चुस्त-दुरुस्त हो तथा न्यायालय समय पर न्याय दें, ताकि जनता का कानून व्यवस्था पर भरोसा बढ़े। खासकर स्कूल-कालेजों के पास चाक-चौबंद व्यवस्था हो और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर शीघ्र अंकुश लगाया जाये। महिलाओं को सशक्त बनाने की भी जरूरत है। विलंब न्याय की अवधारणा को क्षति पहुंचाता है। अदालतों में मुकदमों का बोझ, फैसलों में देरी व कम सजा दर अपराधियों के हौसले बढ़ाती है। जरूरी है कि निचली अदालतें कुशलता व प्रभावी ढंग से काम करें। जघन्य मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट की प्रक्रिया उम्मीद बढ़ाने वाली है।  निस्संदेह, न्यायिक प्रणाली में जनता का विश्वास अंतत: न्याय देने की क्षमता पर ही निर्भर करता है।

 

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