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Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.मुट्ठी भर रंग बहक न जाए

मुट्ठी भर रंग-मिट्टी न हो जाए, रंगीन ख्वाबों पर-कोई परत चढ़ न जाए! लोकतंत्र में भारत का बेहतरीन रंग, भले ही छलके, यूं ही सत्ता में बहक न जाए। इस बार फिर होली वक्त के तालों और बदलते परिदृश्य की मासूमियत में तथा फिर कहीं जश्न को गुनहगार होने की सजा। अब रंग कहीं ऊपर से आते हैं या ऊपर से गिरते हैं। पहले जमीन से मांगे जाते थे, किसान की पैदावार से निकलते थे। क्या इस बार की होली इसलिए रूठ गई कि कहीं खेत अब रंग उगाना भूल गया या किसान की उदासी में वे तमाम फूल अपने रंगों का शृंगार छोड़ रहे हैं, जो कभी मिट्टी की पलकें खुलते ही मुस्कराना जानते थे। देश के हालात कई तरह से संबोधित हैं और कहीं या जब कहीं जरूरत है तो यही रंग कहीं ऊपर से टपकाए जाते हैं। बढ़ते कोरोना संक्रमण के हालात और ठोस हिदायतों के पहरे में होली अपने होने का सबूत कहां ढूंढे, क्योंकि सामाजिक दूरी के पैगाम में कहीं पारंपरिक त्योहार के मुकाबले राजनीतिक उत्सव जीत रहे हैं।

 अब रंग का मुकाबला विवाद से है। विवाद में हर तरह के रंग हैं। समाज, धर्म, जाति, राजनीति और सत्ता के रंग की होली को क्या गुलाल-क्या रंगोली। कोरोना मामलों में भले ही अधिकांश राज्यों की होली हार जाए, लेकिन हर दिन की सौगात में रंग उड़ रहे हैं। किसी का रंग, किसी को बदरंग कर रहा है। ऐसे में कौन जाने देश की सबसे बड़ी होली पश्चिम बंगाल में हो जाए। यह कीचड़ की होली है जो पांच राज्यों के चुनाव में न जाने लट्ठ मार परंपरा से किसे-किसे घायल कर दे, लेकिन बिहार विधानसभा हो या हिमाचल का परिसर, हम संविधान से खेलते मंजर में ऐसे रंगों से भयभीत हैं। भयभीत हैं कि कल कोई अतीत में खेली गई होली को ही फिर से अपने रंग की नुमाइश में खड़ा न कर दे। किसे मालूम हमारी व्यवस्था किस अभिप्राय की होली खेलना शुरू कर दे। अब तो होली का आंगन नहीं, गली है। लोग अपने कारणों से या अकारण भटक रहे हैं। जिन मुट्ठियों में रंग का खजाना भरा होता था, अब वही समाज के भीतर बारूद से भरी हैं। बारूद कभी होली नहीं हो सकता, लेकिन रंग भी तो यूं बिखर नहीं सकता। रंग अब एक पैकेज है, किसी खुली बोरी में उसे बिकना पसंद नहीं। इसलिए भारतीय लोकतंत्र का खुला माहौल, अब कहीं छोटे-छोटे पैकेटों में बंद है। प्रजा को राजा से जुड़ने के लिए होली कभी मायूस नहीं थी, लेकिन अब राजा और प्रजा के बीच होली एक पैकेज है। यह पांच साल की होली है, जो आज भारत की सारी वसंत को पश्चिम बंगाल में छिड़कना चाहती है, तो कल फिर किसी चुनाव में लौट आएगी। कौन जानता है भारत के वित्त मंत्री की मुट्ठी में कितने रंग हैं। भले ही पिछले साल से इस वर्ष की होली तक रंगों के इंतजार में जनता अपने-अपने पैबंदों में जीने का रंग ढूंढ रही है, लेकिन वे तमाम गलियां आज भी बदरंग हैं।

2.होली घर में

बदले हालात में जीवन की सुरक्षा प्राथमिकता

इस बार होली का आगमन ऐसे वक्त में हो रहा है जब देश में  फिर कोरोना संकट तेजी से पैर पसार रहा है। बीते साल भी होली के बाद कोरोना संक्रमण में तेजी आई थी, इस बार होली से पहले ही तेजी है, तेजी से फैलने वाले विषाणु के रूपांतरण के साथ। वक्त की अजीब दास्तां है कि जो इस पर्व का मर्म है, वही वायरस के लिये उर्वरा भूमि है। पर्व का मकसद सामाजिक समरसता को सींचना और रंगों के जरिये मन के कलुष को धोना रहा है। ऐसा पर्व, जिसमें राजा से रंक तक एक स्थान पर रंगों के जरिये समता का समाज रचते हैं। लेकिन इस त्योहार की जो ताकत है, वह बदले हालात में हमारी कमजोरी साबित हो सकती है। निस्संदेह, रंगों का अपना विज्ञान है और इसका रिश्ता हमारे शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य से है। रंगों की मस्ती में हम कई वर्जनाओं को तोड़कर सहज होते हैं। मन के गुब्बार निकलते हैं। मस्ती के रेले, मेले व सार्वजनिक समारोह, कवि सम्मेलन आदि जीवन की एकरसता को तोड़कर उमंग भरते हैं। लेकिन विशेषज्ञ चुनौती दे रहे हैं कि यदि हम रंगों की मस्ती में डूबे तो कोरोना के सुपरस्प्रैडर बन सकते हैं। वैसे भी कोरोना का नया वैरिएंट पिछले के मुकाबले कई गुना तेजी से फैलता है।  हमें होली भी मनानी है मगर घर की चहारदीवारी में और अपनों के संग। त्योहार को एक व्रत की तरह मनाना है ,जिसमें हम त्याग करते हैं, बेहतरी के लिये। संयम की जरूरत होगी होली के इस व्रत को मनाने के लिये। 

सही भी है, यदि जीवन सुरक्षित रहेगा तो आने वाले समय में कई मौके हमें त्योहार को हर्ष-उल्लास से मनाने के मिलेंगे। ध्यान रहे बीते वर्ष अक्तूबर-नवंबर में नवरात्र-दीवाली आदि के बाद संक्रमण में तेजी आई थी। सतर्कता के साथ होली मनाना हमारी सामाजिक जिम्मेदारी भी है, बुजुर्गों व समाज के संवेदनशील वर्ग की सुरक्षा की दृष्टि से भी। समाज में वर्ग-भेद की दीवारों को तोड़ने वाले पर्व को हमें सतर्कता की दीवारों के बीच मनाना होगा, जो वक्त की मांग भी है। यदि हमने लापरवाही बरती तो कोविड-19 के नये वैरिएंटस के साथ देश के लिये बड़ी चुनौती पैदा हो सकती है। हमारी जरा-सी चूक से वायरस को पैर पसारने का मौका मिल सकता है। दरअसल, होली के समारोहों में लोग मिलते-जुलते हैं और खाना-पीना साथ होता है, जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन नहीं हो पाता। फिर देश के अलग-अलग इलाकों में एक दिन से लेकर सप्ताह तक के आयोजन होते हैं, जिसमें हमें भीड़भाड़ से बचने की जरूरत है। ऐसे में एक संक्रमित व्यक्ति कई लोगों को संक्रमित कर सकता है। यदि पानी से मास्क भीग जाता है तो वह बचाव करना बंद कर देता है। एेसे में जरूरी है कि हम घर में सुरक्षित रह कर होली मनायें। साथ ही उन राज्यों में जाने और वहां के लोगों के संपर्क में आने से बचें जहां कोरोना तेजी से फैल रहा है। यही वजह है कि कई राज्य सरकारों ने क्लब, होटल एवं रेस्तरां में होली के सार्वजनिक समारोहों तथा मेलों व सामूहिक पूजा पर रोक लगायी है।

3.हमारी होली

आज होली का जितना महत्व है, उतना आधुनिक इतिहास में कभी नहीं रहा होगा। महामारी और लॉकडाउन के समय की यह पहली होली है, जब भय और संशय से रंग में भंग के हालात हैं। देश का एक विशाल क्षेत्र होली के खुले आयोजन से वंचित रहेगा और जहां होली मनेगी, वहां भी दिशा-निर्देशों का साया होगा। जहां लॉकडाउन है, वहां लोग होली को घड़ी के साथ बीतते देखेंगे। यह तो अच्छा है कि प्रौद्योगिकी ने हमें मोबाइल व सोशल मीडिया से लैस कर दिया है, जहां हम होली की खुशी और मंगलकामनाओं का इजहार कर सकते हैं। तो जो लोग आभासी दुनिया के नागरिक हो चुके हैं, उनके लिए होली अवश्य कुछ साकार हो जाएगी। आज होली भी संदेश दे रही है कि आभासी दुनिया हम सबके लिए कितनी उपयोगी बन गई है। जब मास्क अनिवार्य हो, जब बार-बार हाथ धोने का निर्देश हो, जब शारीरिक दूरी बरतने की मजबूरी हो, तब होली का स्वाभाविक जमीनी आयोजन न होना हमें एक अलग अफसोस से भर देता है। इस अफसोस से जीतकर ही हमें इस होली को साकार करना है। दीपावली से लेकर ईद तक और अब होली तक दुश्मन कोरोना हमारे पीछे पड़ा है। दीपावली के समय कोरोना के मामले कम होने लगे थे, लेकिन होली आते-आते फिर चिंता बढ़ी है। 
आज महामारी से जंग के निर्णायक मोड़ पर होली चिंतन और सबक का मौका है। एक-दूसरे के प्रति स्नेहिल, सद्भावी लोग ही सच्चा उत्सव मनाते हैं और उत्सव उनकी सामाजिकता को मजबूत करता है। अब हर जगह न सही, लेकिन भारत में अनेक इलाके ऐसे हैं, जहां इस दिन अनजान लोग भी परस्पर मिलते-जुलते हैं। एक-दूसरे की परवाह, एक-दूसरे को खुश करने का यह मानवीय प्रयास ही किसी उत्सव को वैभवशाली बनाता है। तभी होली जैसा प्राचीन उत्सव भारत में आज भी मनाया जा रहा है। कुछ विद्वानों ने यह साबित करने की कोशिश की है कि यह उत्सव यूनान से आया है, लेकिन भारत रत्न पी वी काणे धर्मशास्त्र का इतिहास  में लिखते हैं कि इन विद्वानों ने भारत के प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन नहीं किया है। ऋषि जैमिनि के समय यह उत्सव होलाका नाम से मनाया जाता था। होलाका को उन बीस क्रीड़ाओं में गिना गया है, जो भारतवर्ष के लोग प्राचीन काल में भी खेलते थे। बसंत से जुड़ा यह उत्सव भारत के अनेक क्षेत्रों में बसंत पंचमी से रंगपंचमी तक मनाया जाता रहा है। बिहार, उत्तर प्रदेश के गांवों में भी होली या फाग गायन कई-कई दिनों तक चलता था। अब एक जगह बैठकर या घर-घर घूमकर होली खेलते हुए गायन-वादन की समृद्ध परंपरा धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। शहरों को छोड़िए, हमारे गांवों का चेहरा क्यों उतर रहा है? लड़ाई-झगड़े, राजनीति और भ्रष्ट आचरण के लिए तो गिरोह आसानी से बन जाते हैं, लेकिन होली गायन-आयोजन के लिए दल बहुत मुश्किल से जुटता है? क्या हमें कोई फाग या होली गीत याद है? ह्वेनसांग ने हमारे पूर्वजों के बारे में गर्व से कहा था कि ये लोग कितना गाते-बजाते हैं। लेकिन अब हममें से कितनों को कुछ बजाना, गाना आता है? क्या उस परंपरा को हम फिर जीवित कर सकते हैं? क्या हमारी आभासी दुनिया के सहारे में उत्सवों की पुरानी रंगीन दुनिया लौट सकती है? यह होली भी एक अवसर है, जब हम अपने और समाज के लिए कोई अच्छी मेल-जोल भरी शुरुआत कर सकते हैं।

 

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