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Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.मंडी से पालमपुर तक के सबक

न चिराग पूरी तरह जला और न ही इस चिराग तले अंधेरा हुआ। कहीं बरसात हुई तो कहीं सूखा भी रहा। एक अजीब कैफियत में गुजरा हिमाचल और चार नगर निगम चुनावों ने राजनीति की भाषा बदल दी। कुल 64 वार्डों में अगर पार्टी चिन्ह ढूंढें तो भाजपा के 28 और कांग्रेस के 29 विजयी दिखाई देंगे, लेकिन सात निर्दलीयों की जीत की स्पष्टता के बावजूद जो अंधड़ बनकर डटे थे, उन्होंने खेला किया है। भाजपा के जश्न की सबसे बड़ी भूमि मंडी हो सकती है, लेकिन पालमपुर में जो ढहा है, उसको बटोरना मुश्किल है। जाहिर तौर पर कांग्रेस ने जीत के साथ-साथ हैरान भी किया है। पालमपुर में भाजपा दिग्गजों की भीड़ के नीचे से जमीन खींचने का काम अगर पार्टी ने किया, तो सोलन के घमासान में कांग्रेस ने एकजुटता का प्रदर्शन किया है। कांग्रेस के लिए धर्मशाला का सदमा कहीं पार्टी के भीतरी जख्मों को कुरेद रहा है। सही में कहें तो ये चुनाव अपनी संवेदना की गवाही में बहुत कुछ नोच गए। मंडी ने केवल शहर नहीं देखा, बल्कि जिला से मुख्यमंत्री जयराम को देखा है। इसका एक अर्थ पंडित सुखराम की विरासत का सूखापन माना जा सकता है, लेकिन सिपाही अगर मुख्यमंत्री हो तो दारोगा भी क्या करेगा।

 सोलन की जनता ने डा. बिंदल पर तो धर्मशाला के मतदाता ने सुधीर शर्मा पर रहम नहीं किया, लेकिन अगर सत्ता सीधे और बुरी तरह हारी है, तो पालमपुर की दास्तान में कई कब्रें सजी हैं। नए नगर निगमों के नजरिए से यह चुनाव सत्तारूढ़ दल की मलाई चाट गए हैं। कुछ दिन पहले स्थानीय निकाय चुनावों की खिचड़ी पकाकर भाजपा ने जिस तरह मतदाता की नमक हलाली करवाई, उससे कहीं विपरीत नगर निगम की सियासत ने अपने आंकड़े सामने रख दिए हैं। पार्टी चिन्ह पर चुनाव लड़ना एक ऐसी हिमाकत थी, जिससे आमतौर पर कोई भी सत्ता बचना चाहेगी, लेकिन इसके गुणात्मक फलक पर मतदाता को अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने का अवसर मिला। यह दीगर है कि चुनावों का हर पहलू पार्टियों के दायरे में नहीं रहा, लेकिन बिसात पर कई नेताओं के हाथी-घोडे़ मरे जरूर। जाहिर तौर पर ये चुनाव न तो पिछले स्थानीय निकाय चुनावों की तरह रहे और न ही आगामी विधानसभा चुनावों जैसे होंगे। यह अलग दिशा और मंतव्य की कहानी है। मंडी से पालमपुर तक मतदाता का गणित और मूड अलग-अलग रहा और इसमें कोई विशेष ट्रेंड नहीं पनपा, फिर भी सत्ता के लिए सीखने की एक परिपाटी जरूर दिखाई दे रही है। नगर निगम चुनावों में दलगत राजनीति चाहे तो अपने नफे-नुकसान गिन सकती है। कांग्रेस के अपने कवच क्यों टूटे या भाजपा के अपने घर क्यों रुठे, यह दोनों पार्टियों को समझना होगा। चुनावों की स्थानीयता में प्रांतीयता भरने का दोनों पार्टियों ने भरसक प्रयास किया, लेकिन चेहरों के चयन की चूक का पश्चाताप करना पड़़ा। जाहिर तौर पर इन चुनावों के परिप्रेक्ष्य में राजनीति और कठिन हुई है और इसका असर आगामी विधानसभा तथा संसदीय उपचुनावों में फतेहपुर तथा मंडी में देखा जाएगा।

 हो सकता है सरकार अपनी खीझ उतारने के लिए इन दोनों उपचुनावों को अभी से रीढ़ पर सवार कर ले या दूसरी तरफ विपक्ष पिछली गलतियों से दुरुस्त होते हुए अपनी बेरोजगारी मिटा दे। जो भी हो भाजपा के लिए अपने कुनबे की हिफाजत करने का सबसे कारण नगर निगम चुनावों में मिलता है। वर्तमान चुनाव में पुराने कई फैक्टर हारे हैं और नए समीकरण उभरे हैं, फिर भी अगर इन्हें उपचुनाव के नजरिए से देखें तो सत्ता के लिए सख्त निर्देश सामने हैं। भले ही पालमपुर की कहानी धर्मशाला नहीं कह पाया, लेकिन दोनों को मिलाकर भाजपा के लिए कांगड़ा के माइनस सामने हैं। हम भले ही सारे प्रदेश को चार शहरों के इंतकाम या आश्रय में नहीं पढ़ सकते, लेकिन जनापेक्षाओं के हवाले से सरकार के कामकाज पर टिप्पणी जरूर हुई है। नगर निगम चुनावों के संदर्भ में सियासत बहुत कुछ लिख गई, लेकिन अब विकास के कोरे कागज पर बहुत कुछ लिखना बाकी है। नगर निगमों की संरचना में राजनीति का उत्तर भले ही मिल गया हो, लेकिन इनके औचित्य का जवाब अब सरकार को देना है। दृष्टि पत्रों के आधार पर यह चुनाव नहीं हुआ है, फिर भी अब सरकार को अपनी शहरी व्यवस्था का विजन जमीन पर उतारना पड़ेगा। बेहतर होगा भाजपा की ओर से जारी चार दृष्टि पत्रों के आधार पर केंद्रित भूमिका में जयराम सरकार अब कार्रवाई के मोड में आकर जनता को अपने रुतबे का भरोसा दिलाए। चुनाव परिणामों के खत का जवाब देते हुए अब सरकार को अपनी नीयत के हस्ताक्षर करने होंगे, क्योंकि फिर यही मतदाता आगामी विधानसभा चुनावों में लौट आएंगे।

2.कोरोना टीके पर भी रार!

कोरोना टीके पर भी सियासत खेली जा सकती है अथवा रार की नौबत आ सकती है! यह हास्यास्पद स्थिति लगती है। केंद्र सरकार का पक्ष सुनें, तो लगता है कि राज्य सरकारें सियासत खेल रही हैं। कुछेक ने तो कोरोना महामारी को पेचीदा और चिंताजनक बना दिया है। वे वायरस को नियंत्रित करने में नाकाम रही हैं, लिहाजा पूरे देश के समीकरण बिगड़ते जा रहे हैं। पहली बार संक्रमित मामले एक ही दिन में 1.26 लाख से अधिक दर्ज किए गए हैं और मौतें 685 तक पहुंच गई हैं। इनमें से करीब 60,000 मामले तो अकेले महाराष्ट्र में हैं और मौतें भी 300 से अधिक हैं। बहरहाल राज्य सरकारों का पक्ष सुनें, तो लगता है कि टीकाकरण अभियान ही रुक जाएगा। सिर्फ महाराष्ट्र ही नहीं, उसके अलावा ओडिशा, आंध्रप्रदेश, पंजाब, राजस्थान, उप्र, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, बिहार और पश्चिम बंगाल में भी टीकों का स्टॉक 3-4 दिन का शेष है। कुछ राज्यों में टीकाकरण केंद्र बंद करने तक की नौबत आ गई है।

शायद कुछ केंद्र बंद भी कर दिए गए हों अथवा टीकों की खुराक लेने वाले निराश होकर लौट रहे हों! कई राज्य सरकारों ने मांग जारी रखी है कि टीकाकरण के लिए आयु-वर्ग की सीमा समाप्त की जाए और 18 साल से ऊपर प्रत्येक बालिग नागरिक को टीका लगाया जाए, क्योंकि कोरोना की मौजूदा लहर ने 18-40 उम्रवालों को ज्यादा चपेट में लिया है। अमरीका का उदाहरण दिया जा रहा है कि वहां के राष्ट्रपति बाइडेन ने ऐलान किया है कि सभी बालिगों को कोरोना टीका दिया जाएगा। अमरीका के साथ, किसी भी संदर्भ में और स्तर पर, तुलना करना बेवकूफी और अपरिपक्वता होगी। भारत अपने संसाधन और स्थितियों के मुताबिक फैसला करे। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन कई बार दोहरा चुके हैं कि कोरोना के दोनों टीकों का उत्पादन फिलहाल ‘सीमित’ है, लिहाजा कोरोना की चपेट में आसानी से आने वाले आयु-वर्ग को प्राथमिकता के साथ टीका दिया जाएगा। सभी बालिगों का टीकाकरण अभी संभव नहीं है। केंद्र के स्पष्टीकारण के बावजूद यह सवाल और मांग बार-बार क्यों उठाई जाती रही है? क्या इसमें सियासत के बिम्ब दिखाई नहीं देते? गौरतलब है कि सीरम इंस्टीट्यूट महीने में कोविशील्ड टीके की 5.5 या 6 करोड़ खुराक का उत्पादन कर पा रहा है। दूसरी ओर, भारत बायोटेक कोवैक्सीन की करीब 50 लाख खुराक का ही उत्पादन कर पा रही है। बेशक सीरम की प्राथमिकता भारत सरकार है, लिहाजा उसे निर्यात नहीं करने के आदेश दिए गए हैं।  अलबत्ता भारत सरकार ने 84 देशों को कोरोना टीके सप्लाई किए हैं। कुछ देशों को मुफ़्त में ही टीका मुहैया कराया गया है।

अधिकतर कोविशील्ड टीका ही भारत सरकार ने सप्लाई किया है, लिहाजा टीके का अनुसंधान करने वाली ब्रिटेन की मूल कंपनी-एस्ट्राज़ेनेका-ने सीरम को नोटिस भेजा है कि कोविशील्ड के शिपमेंट में देरी क्यों हो रही है? बहरहाल अब हमारे जीवन-मौत और जन-स्वास्थ्य का सवाल है। महामारी का संकट पूरे देश पर है। ऐसी स्थिति में सौतेलापन या सियासत स्वीकार्य नहीं है। हम नहीं मानते कि केंद्र विरोधी सोच की राज्य सरकारों के साथ कोई खिलवाड़ या भेदभाव कर रहा होगा। यदि केंद्र सरकार ने तय किया है कि कोरोना टीके का नियंत्रण, खरीद और आपूर्ति उसके हाथ में ही रहेंगे, तो उस पर राज्य सरकारों का सवाल करना गलत और अनैतिक है। महामारी के दौरान आपदा प्रबंधन अधिनियम की व्याख्या भी यही कहती है। कानून केंद्र सरकार को कुछ विशेषाधिकार भी देता है। फिर भी राज्य सरकारें चाहें, तो सर्वोच्च न्यायालय में इस व्यवस्था को चुनौती दे सकती हैं। लेकिन यह आपसी टकराव और विरोधाभास का दौर नहीं है। भारत में फिलहाल दो ही टीके हैं। कुछ और टीके विचाराधीन हैं। वे डाटा, परीक्षण और कच्चे माल सरीखे मुद्दों के कारण फंसे हुए हैं। हालांकि रूस के स्पूतनिक टीके को लेकर भारत की डा. रेड्डी लैब के साथ कारोबारी गठबंधन है। उसके अलावा रूस कुछ और कंपनियों के संपर्क में है और संवाद जारी है, ताकि स्पूतनिक टीके को भारत में मंजूरी मिल सके और वह 60 करोड़ खुराक सालाना के उत्पादन का लक्ष्य हासिल कर सकें। बहरहाल टीके पर रार यहीं खत्म होनी चाहिए।

3.समन्वय का समय

भारत में कोरोना संक्रमण के आंकडे़ पुराने तमाम रिकॉर्ड ध्वस्त करते आगे बढ़ रहे हैं, तो यही समय है, हमें परस्पर सहयोग और संवाद की प्रक्रिया तेज कर देनी चाहिए। इसी दिशा में प्रधानमंत्री की ताजा पहल को देखा जाना चाहिए। संवाद के जरिए परस्पर विश्वास बढ़ाते हुए ही संघर्ष की बुनियाद तैयार होती है। कोई ऐसी आपदा नहीं, जिससे इंसानियत जीती न हो, इस आपदा से भी हम मिलकर ही दो-दो हाथ कर सकते हैं। भारत के लिए ये परीक्षा के पल हैं, इसकी सफलता इसी बात पर टिकी है कि सरकारों के बीच समन्वय कैसा है। इस मोर्चे पर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की बैठकों का विशेष महत्व है, जिनसे न सिर्फ कोरोना योद्धाओं, बल्कि आम लोगों का भी मनोबल बढ़ता है। बेशक, ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं, जिसे घुमाते ही कोरोना का लोप हो जाए, लेकिन अगर हम सजग हुए, एक-दूसरे के स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील हुए, तो हम इस जंग को जल्दी जीत लेंगे। इस सप्ताह की शुरुआत में ही प्रधानमंत्री ने देश में कोविड टीकाकरण कार्यक्रम की समीक्षा के लिए एक उच्च-स्तरीय बैठक की अध्यक्षता की थी, अब उन्होंने मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की है, तो समस्या की गंभीरता को समझा जा सकता है। समस्या यह है कि देश में अनेक स्तरों पर बैठे कई लोग समस्या से मुंह चुरा रहे हैं। बढ़ते कोरोना की वजह से कई ऐसे सवाल हैं, जो लोगों के बीच चर्चा में हैं, जिनका जवाब सरकार को सतर्कता के साथ देना चाहिए। एक सवाल तो लोगों के बीच बहुत आम है कि जिन राज्यों में चुनाव हैं, क्या वहां कोरोना नहीं है? क्या चुनाव या चुनाव प्रचार के दौरान मास्क जरूरी नहीं है? क्या पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु में कोरोना नहीं है? प्रधानमंत्री के स्तर पर होने वाली बैठकों में न सही, मंत्री और अधिकारी स्तर की बैठकों में इन सवालों के जवाब खोजना और लोगों तक जवाब पहुंचाना अपरिहार्य हो गया है। जब कोरोना के मामले बढ़ेंगे, तब संवाद और समीक्षा की जरूरत भी बढ़ेगी। सरकारों के बीच मतभेद भी पैदा होंगे, लेकिन सावधान, कहीं भी राजनीति के संकेत नहीं दिखने चाहिए। मांग और शिकायतें तो सही हैं, हर व्यवस्था में होती हैं, लेकिन गंभीर दोषारोपण की देश में बहुत बुरी व्यंजना होगी। समय महामारी से लड़ने का है, किसी सरकार से लड़ने या राजनीति करने का नहीं है। यह अच्छा है कि सरकार सतर्क है कि लोगों के बीच अनावश्यक भय न फैले, लेकिन भय के हालात न पैदा होने देना सभी सरकारों की प्राथमिकता होनी चाहिए। राज्यों को अपनी शिकायत व्यवस्था के तहत उठानी चाहिए और प्रोटोकॉल के तहत केंद्र सरकार को यथोचित जवाब देना चाहिए। यह समय लॉकडाउन या कफ्र्यू से पीड़ित हमारे शहरों के जरूरतमंद लोगों की खोज-खबर लेने का भी है, जिनकी कमाई पर फिर मार पड़ने लगी है। सियासत सूझने-बूझने से पहले भूखे और जरूरतमंद लोगों का ध्यान आना जरूरी है। कोरोना संक्रमण आज जिस स्तर पर है, उसकी कल्पना नहीं की गई थी। विशेष रूप से महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, पंजाब, मध्य प्रदेश और गुजरात में बचाव के कार्य युद्ध स्तर पर चलाने चाहिए। ये ऐसे राज्य हैं, जिन्हें केंद्र के ज्यादा समर्थन-सहयोग की जरूरत है। जान गंवाने वालों की संख्या भी व्यथित करने लगी है। सियासत के लिए तो आगे खूब मौके मिलेंगे, लेकिन अभी महामारी को धूल तो चटा दें।

4.किसानों को एमएसपी का सीधा लाभ

किसानों को उनकी उपज का सीधा लाभ पहुंचाने की केंद्र सरकार की डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी डीबीटी योजना कृषि क्षेत्र में एक अभिनव पहल है; जिसके दूरगामी सार्थक परिणाम हो सकते हैं, जिसको लेकर पंजाब सरकार दुविधा में है और इस कदम का विरोध कर रही है। उसे आशंका है कि इससे दशकों पूर्व से स्थापित विपणन व्यवस्था में व्यवधान आ सकता है। निस्संदेह इस कदम को किसानों के दूरगामी हितों के नजरिये से देखना चाहिए। इसे राजनीतिक व चुनावी समीकरणों के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। डीबीटी प्रणाली ने विभिन्न लोककल्याण योजनाओं में सार्थक परिणाम दिये हैं और बिचौलियों की लूट पर लगाम लगाया है। पंजाब सरकार की दलील रही है कि इस बदलाव से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ेगा। दलील है कि दशकों से आढ़ती या कमीशन एजेंट किसानों को सरकारी या निजी एजेंसियों द्वारा इसकी खरीद के लिये मंडी में फसल आवक से लेकर विक्रय के कई चरणों में मदद करते हैं। ये बिचौलिए कृषि से जुड़े सामान की खरीद के लिये उन्हें धन भी उपलब्ध कराते हैं। निस्संदेह किसानों को यह आर्थिक मदद बेहद ऊंची ब्याज दरों में मिलती है। दरअसल, फसल की खरीद करते समय आढ़ती पहले अपना हिसाब चुकता कर लेते हैं। किसान अपनी सालभर की खून-पसीने की कमाई का एक हिस्सा ही घर ले जा पाते हैं। इन विसंगतियों से किसानों को सुरक्षा देने के मकसद से राजग सरकार ने डीबीटी योजना को क्रियान्वित करने का मन बनाया है। पंजाब की कृषि उत्पाद खरीद में आढ़तियों-कमीशन एजेंटों की कितनी बड़ी भूमिका है, यह इनकी संख्या और सक्रियता से पता चलता है। पूरे पंजाब में करीब 47000 पंजीकृत आढ़ती हैं जो किसान की उपज के विक्रय पर अपनी सेवाओं के बदले कमीशन के रूप में 1,500 करोड़ रुपये सालाना कमाते हैं।

विडंबना यह है कि देश में किसानों के नाम पर राजनीति तो खूब होती रही है लेकिन किसान हितों के लिये दूरगामी योजनाओं पर काम नहीं हुआ। उसे तात्कालिक व अस्थायी लाभों के नाम पर स्थायी लाभों से वंचित रखने का प्रयास किया गया। उसे महज वोट के रूप में उपयोग तो किया गया लेकिन उसे जागरूक और विवेकशील करने का प्रयास नहीं किया गया। यही वजह है कि इस अभिनव पहल के बाद लाभार्थी किसान तो जागरूक नहीं हुआ, लेकिन आढ़ती लॉबी इसके खिलाफ सक्रिय हो गई। राजनीतिक-आर्थिक लाभ के लिये राजनेता भी उनकी भाषा बोलने लगे। दरअसल, डीबीटी प्रणाली की शुरुआत कांग्रेस-नीत संप्रग सरकार ने वर्ष 2013 में की थी। इसके जरिये विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थियों को पहुंचाना था ताकि बिचौलियों-दलालों की भूमिका खत्म की जा सके। मकसद यह है कि योजनाओं के लाभार्थियों के खाते में बिना रिश्वत दिये पूरी रकम पहुंच सके। इस योजना का मकसद धोखाधड़ी रोकना भी था। राजग सरकार ने इसे विस्तार ही दिया है और किसानों को एमएसपी का सीधा भुगतान किसानों के खाते में करने की पहल की है। अंतिम उद्देश्य व्यवस्था में सुधार करना ही है ताकि खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। केंद्र सरकार के इस कदम की सराहना की जानी चाहिए। निस्संदेह, पंजाब-हरियाणा, जो हरित क्रांति का नेतृत्व करते हैं, में खरीद की एक मजबूत व विश्वसनीय प्रणाली वर्षों के प्रयासों से स्थापित हुई है जो किसानों तथा देश के लोगों को लाभान्वित करती है। मगर ऐसा मजबूत ढांचा उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे अन्न उत्पादक राज्यों में स्थापित नहीं हो पाया है। यही वजह है कि इन राज्यों के किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम पर अपनी फसल बेचने को मजबूर होना पड़ता है। किसानों को दूसरे राज्यों में अपनी फसल ऊंचे दामों पर बेचने के लिये अनुचित तरीकों व बिचौलियों का सहारा लेना पड़ता है, फिर भी उन्हें न्यायसंगत दाम नहीं मिल पाता। निस्संदेह डीबीटी प्रणाली लागू होने से ऐसे तमाम किसानों को इसका लाभ मिल सकेगा। इससे जहां उत्पादकों को सीधा भुगतान होगा, वहीं बाजार व्यवस्था नियंत्रित रहने से देश के उपभोक्ताओं को उचित लाभ मिल सकेगा।

 

 

 

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