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Editorial Today (Hindi)

इस खंड में, हम अपने पाठकों / आकांक्षाओं को राष्ट्रीय दैनिक के चयनित संपादकीय संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। द हिंदू, द लाइवमिंट, द टाइम्सऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द इकोनॉमिक टाइम्स, पीआईबी आदि। यह खंड सिविल सर्विसेज मेन्स (जीएस निबंध), पीसीएस, एचएएस मेन्स (जीएस ,निबंध) की आवश्यकता को पूरा करता है!

1.अपराध के सामने हम गुम हैं

अपराध की वर्णित खबरों का सिलसिला हिमाचल की तासीर को भ्रष्ट तथा निरंकुश साबित कर रहा है। सारे दावों और ख्वाबों के बीच कहीं चीख दब रही है, तो इसका यह अर्थ नहीं कि हिमाचल अब भी भोला भाला है। गगरेट के आश्रम में सेवादार एक महिला का कत्ल करके जमीन में गाड़ देता है या उसके कुछ दिन पूर्व जमीन विवाद में ऊना जिला का ही एक आईटीबीपी जवान की निर्मम हत्या होती है, तो यह प्रदेश कहीं न कहीं खूंखार इरादों की बस्ती में परिवर्तित हो चुका होता है। नादौन की सुबह को नींद से जगाने के लिए यह खबर आतंक से भरी हुई मिलती है कि कुछ नकाबपोश जलशक्ति विभाग के कार्यालय में घुस कर  लूटपाट को अंजाम देते हैं। इसी प्रदेश का एक दूसरा परिदृश्य पर्यटन की संगत में कसौली तक पहुंच कर, सैक्स रैकेट को अपने साथ लेकर चलता है। अपराध की बढ़ती शाखाओं में कहीं कोई गुमनाम है, तो कानून व्यवस्था के इंतजाम को क्या कहेंगे। एक नन्हीं किरण में अगर कोई दिखाई दे जाए, तो हम अपने ऐसे नायकों को नजरअंदाज कर देते हैं।

कानून-व्यवस्था के सन्नाटे में फिर कहीं कोई पुलिस अधीक्षक दिवाकर शर्मा की तरह बिलासपुर के किसी थाने में अपने ही सिपाहियों को ड्यूटी के दौरान शराब के नशे में पकड़ कर लाइन हाजिर कर देता है, तो ठंडी सांसें लेती जनता का विश्वास सलाम भेजता है, वरना किसे खबर है कि व्यवस्था की आंत में क्या-क्या फंसा है। ऐसे अनेक अधिकारी गिने जा सकते हैं, जो खुद को तत्पर करते हैं या कर्त्तव्य की मिसाल में शरीक होते हैं, लेकिन प्रायः ऐसा महसूस होता है कि व्यवस्था विश्राम कर रही है और जनता अपने हिसाब से काम कर रही है। आश्चर्य यह कि हिमाचल का पूरा समाज अपने राजनीतिक गणित में अपना हिसाब रखना ही भूल गया। उसे गांव में सिर्फ पंचायत चुनाव कराने है या इसके भीतर अपनी मंशा, जाति, खुन्नस या प्रत्यक्ष-परोक्ष लाभ का नया गणित तैयार करना है। सरकार और जनता का रिश्ता अब ऐसे लेन देन में समाहित है, जहां दोनों ओर भूख और प्यास है। कौन किसे तृप्त या भूखा रखेगा, इसका फैसला हर दिन और हर घड़ी हो रहा है। इससे न केवल व्यवस्था से पारदर्शिता व जवाबदेही गायब हो रही है, बल्कि हर तरह का अपराध भी सोहबत में शरीक होता प्रतीत होता है। कायदे-कानून अब केवल सजावट के औजार हैं,जबकि जो बच कर निकल रहे हैं वही अंगीकार हैं।

2.पीएम के आश्वासन और आह्वान

कोरोना वायरस की मौजूदा लहर के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी ने देश को आश्वस्त किया है कि अब लॉकडाउन की जरूरत नहीं है। नाइट कर्फ्यू ही पर्याप्त है। उसे ‘कोरोना कर्फ्यू’ का नाम दिया जाए, ताकि कोरोना का एहसास बरकरार रहे। प्रधानमंत्री ने टीके की तुलना में ज्यादा टेस्टिंग और 70 फीसदी आरटी-पीसीआर जांच कराने का आग्रह किया है। उन्होंने बिना लक्षण वाले लोगों की प्राथमिकता स्तर पर जांच कराने का आग्रह किया है। प्रधानमंत्री ने सचेत किया है कि बिना लक्षण वाले लोग परिवार और समाज को संक्रमित करने में भूमिका अदा कर सकते हैं। प्रधानमंत्री ने माइक्रो कंटेनमेंट ज़ोन में कोरोना को बांट कर देखने और उसकी समीक्षा करते रहने का भी सुझाव दिया। महामारी की पहली लहर की तुलना में प्रधानमंत्री अब ज्यादा आशान्वित हैं, क्योंकि अब देश के पास संसाधन और अनुभव हैं। कोरोना के टीके भी हम लगातार लगा रहे हैं और संक्रमण पहली लहर के ‘पीक’ को पार कर चुका है। प्रधानमंत्री ने 2-3 सप्ताह एहतियात बरतने का आग्रह किया। उन्होंने आह्वान किया है कि 11-14 अप्रैल के बीच ‘टीका उत्सव’ मनाया जाए। 11 अप्रैल को ज्योतिबा फुले और 14 अप्रैल को बाबा अंबेडकर की जयंती है। इस संदर्भ में देश के नौजवान एक खास भूमिका निभा सकते हैं। वे पात्र नागरिकों की मदद करें और टीकाकरण केंद्रों तक पहुंचाएं। इससे टीकाकरण अभियान को गति मिलेगी और जागरूकता भी फैलाई जा सकेगी। युवाओं के संदर्भ में दिल्ली एम्स के निदेशक डा. रणदीप गुलेरिया का बयान भी गौरतलब है कि देश के नौजवान पार्टियां मना रहे हैं। उन्हें कोरोना का भय नहीं है। यह खतरनाक प्रवृत्ति है।

बहरहाल प्रधानमंत्री ने दो टूक लहजे में कहा है कि जिन्हें राजनीति करनी है, वे कर रहे हैं और आगे भी करेंगे। वह राजनीति पर कुछ बोलना नहीं चाहते, लेकिन प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा है कि एक ही राज्य को टीके की सभी खुराक नहीं दी जा सकती, क्योंकि उन्हें पूरे देश की चिंता है। उन्होंने आश्वस्त किया कि टीके की कमी नहीं होने दी जाएगी और राज्यों को लगातार आपूर्ति की जाती रहेगी। प्रधानमंत्री के संबोधन, मुख्यमंत्रियों के साथ वर्चुअल संवाद और सुझावों के समानांतर कुछ ‘शर्मनाक सच’ भी सामने आए हैं, जो पूरी व्यवस्था को सवालिया बना रहे हैं और महामारी के खिलाफ  सभी की लड़ाई को अपमानित कर रहे हैं। अमानवीय पक्ष भी उजागर हुआ है। गुरुवार रात्रि तक संक्रमित मामले 1,31,918 हो चुके थे। मौतें 802 हो चुकी हैं, बेशक स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन 780 मौतें बता रहे हैं। बहुत ज्यादा फर्क नहीं है, लेकिन बीती अक्तूबर की लहर के बाद ये सर्वाधिक आंकड़े हैं। प्रधानमंत्री ने इन आंकड़ों से नहीं घबराने का भी आह्वान किया है। विश्व के औसतन 20 फीसदी कोरोना मामले भारत में हैं। मौत का औसत भी बढ़ने लगा है। अकेले महाराष्ट्र में 50,000 से ज्यादा मौतों के साथ विश्व कीर्तिमान स्थापित हुआ है। अस्पतालों में संक्रमित मरीज ज़मीन पर पड़े हैं। श्मशान में एक साथ 8 शवों का दाह-संस्कार किया गया है। गुजरात के सूरत में कूड़ा उठाने वाले वाहन में वेंटिलेटर लाए गए हैं, जो पूरी तरह पैक भी नहीं थे। एक वरिष्ठ डाक्टर को यहां तक सार्वजनिक बयान देना पड़ा कि ऐसा दिन भी आ सकता है, जब सड़कों से लाशें उठानी पड़ें! अस्पतालों में ऑक्सीजन लगभग समाप्त होने के कगार पर है।

ऐसी स्थितियां देश भर में दर्ज की गई हैं। किसी एक को आरोपित नहीं किया जा सकता। सवाल है कि लॉकडाउन और कोरोना-काल के बीते एक साल के दौरान क्या हम स्वास्थ्य ढांचा मजबूत नहीं कर पाए? केंद्र बनाम राज्य की क्षुद्र राजनीति खेली जा रही है। अरे, जिंदा रहेंगे, तो खूब राजनीति कर लेना, फिलहाल वैश्विक महामारी के खिलाफ लड़ाई है। ऐसे में प्रधानमंत्री के आश्वासन कितने कारगर साबित होंगे? टेस्ट, टे्रसिंग और ट्रीटमेंट के सुझाव कई बार दिए जा चुके हैं। प्रधानमंत्री और मंत्रियों ने आग्रह भी किए हैं। यदि देश का प्रधानमंत्री बार-बार आश्वासन देता रहे और सड़कों पर गरीब, बेरोज़गार मजदूरों के पलायन के दृश्य चलते रहें, तो उनके क्या लाभ हैं? बेशक समय के साथ इस लहर का भी ‘पीक’ आना है और उसके बाद हालात पहले की तरह सामान्य होने लगेंगे, लेकिन प्रधानमंत्री के आह्वान भी बेमानी हैं क्या? महाराष्ट्र में 5 लाख खुराकें बर्बाद कर दी गईं। कर्नाटक, तेलंगाना, उप्र, गुजरात आदि राज्यों में भी टीकों को खराब किया जा रहा है और कई राज्यों में लोग टीकाकरण की लाइनों में लगे हैं। बहरहाल कोरोना की घातक लहर जारी है। प्रधानमंत्री के कथनों का भी पालन होगा, तो हम उस पर भी टिप्पणी करेंगे।

3.संप्रभुता की चिंता

भारतीय समुद्री क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना का अभ्यास बड़ी चिंता का विषय है। यह मामला सीधे-सीधे भारत की संप्रभुता से जुड़ा है और सजगता से भी। खुद अमेरिकी नौसैनिक बेडे़ ने माना है कि उसने भारत के ‘एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन’ में अभ्यास किया है। अमेरिकी बेडे़ की ओर से जारी विज्ञप्ति इशारा करती है कि अमेरिकी पहले भी भारतीय समुद्री सीमा में आते रहे हैं। अमेरिका भारत का मित्र देश है और यदा-कदा उसका भारतीय क्षेत्र में आ जाना विशेष गंभीरता की बात नहीं है, लेकिन अगर बिना सूचना भारतीय क्षेत्र में अभ्यास की शुरुआत हो रही है, तो इस गलत परंपरा पर लगाम लगाना जरूरी है। अमेरिका भारत की मंजूरी के साथ आए, कोई हर्ज नहीं, लेकिन भारतीय क्षेत्र में किसी अन्य देश द्वारा सैन्य अभ्यास की सूचना छिपी नहीं रहनी चाहिए। अमेरिका ने अगर छिपाया है, तो दाल में कुछ काला देखना गलत नहीं है। विशेषज्ञों को चिंता हो रही है, तो उस चिंता को दूर करना भारतीय विदेश व रक्षा मंत्रालय के लिए जरूरी है। अमेरिकी नौसेना की सातवीं फ्लीट की टिप्पणी विशेष रूप से सवाल खडे़ कर रही है। क्या अमेरिकी बल भारत-प्रशांत क्षेत्र में हर दिन ऑपरेशन करते हैं? क्या ये सभी ऑपरेशन किन्हीं अंतरराष्ट्रीय कानूनों को ध्यान में रखकर किए जाते हैं? अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है? क्या अमेरिकी सुरक्षा बल कहीं भी उड़, तैर और अभ्यास कर सकते हैं? 
यदि अमेरिकी बेडे़ के जवाब में भारत की परवाह शामिल नहीं है, तो आधिकारिक स्तर पर भारत को अपनी बात रखनी चाहिए। ऐसा ही खतरा जब चीन की ओर से अंडमान निकोबार के पास पैदा हुआ था, तब भारत ने कड़ी आपत्ति की थी, ठीक वैसी ही आपत्ति अमेरिका के साथ भारत भले न जताए, पर इतना दबाव तो बनाना ही चाहिए कि अमेरिकी बेड़ा अपने जवाब में शालीनता और मित्रता के शब्द जरूर रखे। भारत जैसे दूसरे देशों की संप्रभुता की कद्र करता है, ठीक वैसी ही उम्मीद उसका हक है। ऐसा न हो कि कोई देश मित्रता का सहारा लेकर भारत की अवहेलना करे। कतई जरूरी नहीं कि अमेरिका के साथ संबंधों में भारत एक विवाद पैदा कर ले, लेकिन अपनी गरिमा की रक्षा के लिए सजग होना अनिवार्य है। कायदा यह है कि किसी भी तटीय देश के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन की सीमा समुद्र तट से 200 नॉटिकल मील यानी 370 किलोमीटर की दूरी तक होती है। इस क्षेत्र में मौजूद समुद्री संसाधनों पर संबंधित देश का अधिकार होता है। अत: कोई शक नहीं कि अमेरिका को पूछकर ही अभ्यास करना चाहिए था। अगर अमेरिका ने ऐसा नहीं किया है, तो इसके दो अर्थ हो सकते हैं। पहला, भारत से मित्रता का वह लाभ लेना चाहता है और उसे लगता है, चीन की वजह से उलझा भारत आपत्ति नहीं करेगा। दूसरा अर्थ, विगत दिनों अमेरिकी मंत्रियों और विशेष दूत ने भारत दौरा किया है, क्या कोई ऐसी बात है, जो भारत ने नहीं मानी है, या जो अमेरिका को बुरी लगी है, और वह भारत को दबाव में लाना चाहता है। आज जिस दौर में दुनिया है, उसमें किसी भी आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता। हमें अधिकतम पारदर्शिता के साथ चलना चाहिए। अपने स्वभाव के अनुरूप संभावनाओं की तलाश भारत को जारी रखनी चाहिए और यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उदारता किसी भी मोर्चे पर देश के लिए बोझ न बने।

4.वैक्सीनेशन की चुनौती

नये विकल्पों के साथ उत्पादन भी बढ़े

ऐसे वक्त में जब देश में कोरोना संकट की दूसरी लहर गंभीर स्थिति पैदा कर रही है, वैक्सीन ही अंतिम कारगर उपाय नजर आता है। शुक्रवार को संक्रमितों का आंकड़ा 1.30 लाख पार कर जाना चिंता बढ़ाने वाला है। ऐसे में बचाव के परंपरागत उपायों के साथ टीकाकरण अभियान को गति देने की जरूरत है ताकि देश लॉकडाउन जैसे उपायों से परहेज कर सके। पिछली बार सख्ती से जहां देश की आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल असर पड़ा था, वहीं एक बड़ी आबादी को शहरों से गांवों की ओर विस्थापित होना पड़ा था। बड़े पैमाने पर रोजगार का संकट भी पैदा हुआ था। बहरहाल,नयी चुनौती के बीच दिल्ली, महाराष्ट्र और पंजाब समेत कई राज्यों ने रात्रि कर्फ्यू जैसे उपायों को अपनाना शुरू कर भी दिया है। आंशिक बंदी, कन्टेनमेंट जोन बनाने और सार्वजनिक सभाओं पर रोक लगायी जा रही है। ऐसे में टीकाकरण अभियान लक्षित वर्ग विशेष व आयु वर्ग के हिसाब से देश में चल रहा है। स्वास्थ्यकर्मियों, फ्रंटलाइन वर्करों, साठ साल से अधिक आयु वर्ग के लोगों को टीकाकरण का लाभ देने के बाद अब 45 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लोगों को टीका लगाने का कार्य शुरू हो चुका है। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि 45 आयु वर्ग से नीचे के लोगों को भी कोरोना अपना शिकार बनाता रहा है, जिसके लिये भी टीकाकरण की जरूरत महसूस की जा रही है। दरअसल, टीकाकरण अभियान की विसंगतियों को दूर करके इस अभियान में तेजी लाने की जरूरत है। वैक्सीन आपूर्ति को लेकर गैर भाजपा शासित राज्यों की शिकायतों के बाद आरोपों-प्रत्यारोपों का सिलसिला भी जारी है। वहीं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी को अनुचित बताते हैं और कहते हैं कि पर्याप्त मात्रा में वैक्सीन की आपूर्ति की जा रही है। उनका मानना है कि ऐसी बयानबाजी से जहां लोगों का मनोबल प्रभावित होता है, वहीं देश की अंतर्राष्ट्रीय छवि पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

वहीं दिल्ली सरकार के सभी वर्ग के लोगों के लिये वैक्सीनेशन शुरू करने के सुझाव के बाबत केंद्रीय मंत्री कहते हैं कि अब तक लक्षित समूहों का टीकाकरण का लक्ष्य पूरा न करने वाले राज्य सबके लिये टीकाकरण की मांग कर रहे हैं, जो कि तार्किक नहीं है। निस्संदेह ऐसा कोई टकराव कोरोना के खिलाफ हमारी लड़ाई कमजोर ही करेगा। बहरहाल, कोरोना संकट की भयावहता को देखते हुए कोविड-19 की वैक्सीनों का उत्पादन बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है। दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन उत्पादक कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने वैक्सीन उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिये तीन हजार करोड़ रुपये के अनुदान की मांग की है। निस्संदेह ऐसे मुश्किल वक्त में जीवन रक्षक उद्यम के लिये खजाना खोलने में केंद्र को संकोच नहीं करना चाहिए। प्रयोग की जा रही दो वैक्सीनों के अलावा अन्य वैक्सीनों के उत्पादन पर भी विचार होना चाहिए। इसी क्रम में रूसी वैक्सीन स्पुतनिक को भी आपातकालीन उपयोग के लिये उत्पादन हेतु अनुमति दिये जाने की जरूरत है। इस बाबत रूसी निवेश के जरिये भारतीय कंपनियों के साथ देश में वैक्सीन उत्पादन के लिये करार किया गया है। इस मुहिम के सिरे चढ़ने से वैक्सीनेशन अभियान में तेजी आयेगी। दरअसल, अंतर्राष्ट्रीय अनुबंधों के चलते सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को वैक्सीन की सप्लाई में तेजी लाने में दिक्कत आ रही है। उसका कहना है कि अमेरिका व यूरोपीय देशों द्वारा वैक्सीन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के निर्यात पर रोक लगाने से उत्पादन प्रभावित हुआ है। वहीं अंतर्राष्ट्रीय कोवैक्स कार्यक्रम के तहत वैक्सीन देने के लिये सीरम इंस्टीट्यूट कानूनी रूप से बाध्यकारी है। उसे ग्लोबल अलायंस फॉर वैक्सीन्स एंड इम्युनाइजेशन के तहत विकासशील मुल्कों को वैक्सीन देनी ही होगी। वहीं मांग की जा रही है कि देश में कोरोना संक्रमितों के आंकड़ों में तेजी के बाद वैक्सीन डिप्लोमैसी बंद की जानी चाहिए और पहले घरेलू जरूरतों को पूरा किया जाना चाहिए। वैसे पिछले माह संसद में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री आश्वासन दे चुके हैं कि भारतीयों की कीमत पर वैक्सीन का निर्यात नहीं किया जायेगा।

 

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